हुज़ूर मुफ़्ती आज़म हिन्द का इल्मे ग़ैब और इल्मे ग़ैब की दलील अपनी करामात से दी :- सुल्तानुल मशाइख़ हज़रत सय्यदना ख्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया महबूबे इलाही रादियल्लाहु अन्हु के उर्स शरीफ में शिरकत के लिए हुज़ूर मुफ़्ती आज़म हिन्द दिल्ली तशरीफ़ ले गए तो कूचाए जिलान में क़याम किया वहाँ एक बद अक़ीदा मुल्ला आप से इल्मे ग़ैब के मसले पर उलझ पड़ा साहिबे खाना जनाब अशफ़ाक़ अहमद ने आप से अदब से गुज़ारिश की के हुज़ूर ये कज बहस है इन पर किसी बात का असर नहीं होता आपने अपने मेज़बान से कहा ये इस वक़्त तुम्हारे घर तशरीफ़ लाए हुए हैं इनके मुतअल्लिक़ तुम्हे कोई सख्त बात न कहना चाहिए ये मौलवी साहब ने आज तक किसी की बात सुनी ही नहीं इसलिए असर भी क़ुबूल नहीं किया | ये तो सिर्फ अपनी बात सुनते रहे हे और वो भी अनसुनी कर दी जाती है आज में इनकी बाते तवज्जोह से सुनुँगा हाज़िरीन भी ख़ामोशी से सुने |
(वो बद अक़ीदा) मौलवी सईदुद्दीन अंबालवी ने सवा घंटे तक ये बात साबित करने की कोशिश की के नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को इल्मे ग़ैब नहीं था जब वो थक हार कर खामोश हो गया तो आपने फ़रमाया के अगर कोई दलील तुम अपने मौक़िफ़ के ताईद में बयान करना भूल गए हो तो याद करलो मौलवी साहब फिर जोशे तक़रीर में आ गए और फिर आधे घंटे तक बोलने के बाद कहा के ये बात अच्छी तरह साबित हो गई के हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को इल्मे ग़ैब नहीं था | हज़रत ने फ़रमाया तुम अपने बातिल अकीदे से फ़ौरन तौबा कर लो हुज़ूर रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अल्लाह तआला ने ग़ैब का इल्म अता फ़रमाया था आप उसके रद में वो सब कुछ कह चुके है जो कह सकते थे अब अगर ज़ेहमत न हो तो मेरे दलाइल भी सुनले |मौलवी साहब ने बरहम हो कर कहा के मेने तुम जैसे लोगो की सारी दलीले सुन रखी है मुझे सब मालूम है तुम क्या कहोगे हज़रत ने बड़े तहम्मुल से कहा मौलवी साहब बेवा माँ के हुक़ूक़ बेटे पर क्या है? उन्होंने कहा के गैर मुतअल्लिक़ सवाल का जवाब नहीं दूंगा तेज़ आवाज़ में कहा हज़रत ने फ़रमाया अच्छा तुम मेरे किसी सवाल का जवाब न देना मेरे चंद सवालात सुन तो लो मेने डेढ़ पोने दो घंटे तक तुम्हारे दलाइल सुन हैं | हज़रत की बात सुन कर मौलवी साहब खामोश हो गए तो आपने दूसरा सवाल किया के क्या किसी से क़र्ज़ ले कर रूपोश हो जाना (भाग जाना) जाइज़ हैं? क्या अपने माज़ूर बेटे की किफ़ालत से दस्तकश हो कर उसे भीक मांगने के लिए छोड़ा जा सकता हैं? क्या हज्जे बदल के इख़राजात (रूपया पैसा वगेरा) ले कर हज….अभी सरकार मुफ़्ती आज़म ने अपना सवाल पूरा भी नहीं किया था के मौलवी साहब ने आगे बढ़ कर क़दम पकड़ते हुए कहा के बस कीजिये हज़रत मसला हल हो गया ये बात आज मेरी समझ में आ गई हैं के रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को इल्मे ग़ैब हासिल था और रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास इल्मे ग़ैब होना ही चाहिए वरना मुनाफिक़ीन मुसलमानो की तंज़ीम को बर्बाद कर देते अल्लाह तआला ने जब आपको मेरे मुतअल्लिक़ ऐसी बाते बता दी जो यहाँ कोई नहीं जनता तो बारगाहे अलीम से रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क्या इंकिशाफ़ात न होते होंगे? मौलवी साहब उसी वक़्त ताइब हो कर सरकार मुफ़्ती आज़म हिन्द रदियल्लाहु अन्हु से बैअत हो गए |
फजाईले जुमा हदीस

हदीस न .20 : – मुस्लिम व अबू दाऊद व तिर्मिज़ी वं इब्ने माजा अबू हुरैरह रदियल्लाहु तआला अन्हु से रावी हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं जिसने अच्छी तरह वुजू किया फिर जुमे को आया ( खुतबा सुना और चुप रहा उसके लिए मगफिरत हो जायेगी उन गुनाहों की जो इस जुमे और दूसरे जुमे के दरमियान हैं और तीन दिन और , और जिसने कंकरी छुई उसने लग्व ( बेकार काम ) किया यअनी खुतबा सुनने की हालत में इतना काम भी लव में दाख़िल है कि कंकरी पड़ी हो उसे हटा दे ।
हवाला :- बहारे शरीयत जिल्द 4 सफा 74
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मीज़ान क्या है :-

अल जवाब :- अकीदा : – मीज़ान हक़ है उस पर लोगों के अच्छे बुरे आमाल तौले जायेंगे । दुनिया में पल्ला भारी होने का मतलब यह होता है कि नीचे को पल्ला झुकता है । लेकिन वहाँ उस का उल्टा होगा और जिसका पल्ला भारी होगा ऊपर को उठ जायेंगा ।
हवाला :- बहारे शरीयत जिल्द 1
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हुजूर मुफ्तिये आज़म की ज़िंदगी 8
उलमा व सादाते किराम का एहतिराम :- हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द रहमतुल्लाह अलैह को उलमा व सादात किराम का एहतिराम वरसे में मिला था ऐसी वालिहाना अंदाज़ से इन हज़रात की ताज़ीम व तौक़ीर करते थे के इस का बयान करना मुश्किल है | 1979 का वाक़िया है के गर्मी के दोपहर में एक खातून एक बच्चे के साथ तावीज़ लेने के लिए आयीं लोगों ने बताया के हज़रत आराम कर रहे हैं मगर उन्हें तावीज़ की सख्त ज़रुरत थी उन्होंने कहिल वाया के देख लिया जाए के हज़रत जगे हों और मुझे तावीज़ मिल जाए मगर हज़रत के पास किसी को जाने की हिम्मत न हुई |
बिला आखिर वो खातून अपने बच्चे से बोली चलो बेटे ये क्या मालूम था के अब यहाँ सय्यदों की बातें नहीं सुनी जातीं न मालूम हज़रत ने कैसे सुन लिया और ख़ादिमा को आवाज़ देकर कहा जल्दी बुलाओ शहज़ादी कहीं नाराज़ न हो जाएं उन्हें रोक लिया गया बच्चा हज़रत के पास गया हज़रत ने नाम पूछा उस ने ना बताया सय्यद फुलाँ, हज़रत ने इस बच्चे को इज़्ज़तो मुहब्बतों के साथ बिठाया प्यार से सर पर हाथ फेरा सेब मँगाकर दिया और फिर परदे की आड़ से मुहतरम खातून से हाल मालूम करके उन्हें उसी वक़्त तावीज़ लिख कर दिया और घर में ये कह कर रुकवा लिया के धूप ख़त्म हो जाए तब जाने देना और उनकी ख़ातिरो मदारात में कमी न करना |
उर्से आला हज़रत में जब हज़रत सद रुश्शारिया मौलाना अमजद अली साहब आज़मी रहमतुल्लाह अलैह बरेली शरीफ तशरीफ़ लाए तो हज़रत उन के इस्तक़बाल के लिए इस्टेशन जाते और बेपनाह इज़्ज़त व क़द्रो मन्ज़िलत करते | हाफिज़े मिल्लत हज़रत मौलाना अश्शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिसे मुरादाबादी साहब व शेर बेशाए अहले सुन्नत हज़रत मौलाना हशमत अली खान साहब रही माहुमुल्लाहु तआला अलैह | की बड़ी इज़्ज़त करते थे ख़लीफ़ए आला हज़रत हुजुए बुरहानुल हक़ साहब जबलपुरी रहमतुल्लाह अलैह उन के साहबज़ाद गान से बहुत मुहब्बत फरमाते थे और जब भी ये हज़रात बरैली शरीफ आते तो हज़रत इन की बे इंतिहा क़द्रो मन्ज़िलत करते थे | हुज़ूर मुजाहदे मिल्लत मौलाना शाह हबीबुर रहमान साहब अलैहिर्रहमा की भी बहुत इज़्ज़त करते थे अपने खुलफ़ा, व तलामिज़ा व दुसरे मुरीदीन और पीर ज़ादगान और मारहरा शरीफ का खादिम भी आ जाता तो उन तमाम की इसी अंदाज़ा में इज़्ज़त अफ़ज़ाई करते थे के वो बेचारे खुद शर्मिंदाह हो जाते थे
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हुजूर मुफ्तिये आज़म की ज़िंदगी 7
बारगाहे गौसे आज़म रदियल्लाहु अन्हु में हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द रदियल्लाहु अन्हु की मक़बूलियत :- जनाब अब्दुल क़य्यूम साहब जो हुज़ूर मुफ्तिए आज़मे हिन्द के मुरीद थे एक मर्तबा अपने दोस्त जनाब आशिक़ अली साहब को लेकर हुज़ूर मुफ़्ती आज़म हिन्द की बारगाह में हाज़िर हुए ताके उनको मुरीद करवा दें हज़रत ने बैअत के कलिमात जनाब आशिक़ अली साहब को कहलवाना शुरू किया और जब आखिर में फ़रमाया के कहो के मेने अपना हाथ हुज़ूर गौसे आज़म के हाथ में दिया तो जनाब आशिक़ अली साहब बोले के मेने अपना हाथ मुफ्तिए आज़म के हाथ में दिया हज़रत ने फ़रमाया में जो कहता हूँ वो कहो के हुज़ूर गौसे आज़म के हाथ में दिया तो जनाब आशिक़ अली साहब बोले के अभी आपने मुझ से कहल वाया के झूठ नहीं बोलूंगा और आप कह रहे हो के हुज़ूर गौसे आज़म के हाथ में दिया? इस पर हज़रत ने फ़रमाया के हुज़ूर गौसे आज़म के सिलसिले में इसी तरह दाखिल करते हैं हमारे मशाइख का यही तरीक़ा है तुम्हे हुज़ूर गौसे आज़म तक पहुंचा दिया जाएगा | हज़रत ने फ़रमाया कहो के हुज़ूर गौसे आज़म के हाथ में दिया उन्होंने फिर भी नहीं कहा बस हुज़ूर मुफ़्ती आज़म हिन्द को जलाल आ गया आपने अपना अमामा उतर कर जनाब आशिक़ अली साहब के सर पर रख दिया और बुलंद आवाज़ में जलाल में फ़रमाया के कहता क्यों नहीं के मेने अपना हाथ हुज़ूर गौसे आज़म के हाथ में दिया? बस इतना सुन्ना था के जनाब आशिक़ अली बार बार कहने लगे के मेने अपना हाथ हुज़ूर गौसे आज़म के हाथ में दिया और बेहोश हो गए कुछ देर बाद होश आया तो जनाब अब्दुल क़य्यूम साहब ने अलग ले जा कर पूछा के क्या हुआ था कुछ तो बताओ तो जनाब आशिक़ अली साहब बोले के जैसे ही हज़रत ने अपना अमामा मेरे सर पर रखा मेने देखा के “गौसुसकलैन क़ुत्बुल कौनैन सरकार सय्यदना गौसे आज़म रदियल्लाहु अन्हु जलवा फरमा हैं और कह रहे हैं के “आशिक़ अली मुफ़्ती आज़म का हाथ मेरा हाथ है ये मेरे नायब और मज़हर हैं कहो के मेने अपना हाथ गौस आज़म के हाथ में दिया” बस मेरा हाथ सरकार गौस आज़म के हाथ में था और में बार बार कहते कहते बेहोश हो गया | फ़िदा तुम पे हो जाए नूरी ऐ मुज़्तर, ये है इस की ख्वाइश दिली गौसे आज़म |
हुजुर मुफ्तिये आज़म की ज़िंदगी 6
आप की तवाज़ो इंकिसारी :- आप के अंदर तवाज़ो इंकिसारी कूट कूट कर भरी हुई थी अगर किसी को गैर शरई हरकत पर दांत देते थे या किसी मौक़ पर नाराज़गी का इज़हार करते थे तो बाद में उसे समझाते और उसकी दिल जो फरमाते और दुआओं से नवाज़ते अक्सर लोग हज़रत की शान में मन्क़बत पढ़ते तो उन्हें उससे रोकते और फरमाते के में इस लाइक कहाँ अल्लाह पाक इस लाइक बना दे |
मांगने वाला सब कुछ पाए रोता आए हसंता जाए
ये है उन की अदना करामत मुफती आज़म ज़िंदाबाद
आप के लिए ट्रेन रुक गई :- आप सफ़रों हज़र में भी हमेशा बा जमात नमाज़ वक़्ते मुअय्यना पर अदा फरमाते | एक बार नागपुर से तशरीफ़ ले जा रहे थे रास्ते में मगरिब का वक़्त हो गया आप फ़ौरन गाड़ी से उतर पड़े लोगों ने कहा भी के गाड़ी चलने ही वाली है मगर हज़रत को फ़िक्र नमाज़ दामनगीर थी हज़रत के उतरते ही आप के साथी भी उतर पड़े वुज़ू कर के अभी नमाज़ की नियत बांधी थी के ट्रेन छूट गई हज़रत और उनके साथियों का सारा सामान ट्रेन ही में रह गया ट्रेन के चलते ही कुछ बद अक़ीदह लोगों ने फब्ती भी कसी के मियां की गाड़ी गई लेकिन हज़रत नमाज़ में मसरूफ थे नमाज़ से फारिग हुए तो पेलेट फॉर्म खली था हज़रत के साथी सामान जाने की वजह से परेशान थे मगर हज़रत मुतमइन थे अभी सब सोच ही रहे थे के सामान का क्या होगा इतने में देखा के गॉर्ड साहब भागे चले आरहे हैं और उनके पीछे पचासों मुसाफिर भी दौड़ते आ रहे हैं गॉर्ड ने कहा हुज़ूर गाड़ी रुक गई हज़रत ने फ़रमाया इंजन ख़राब हो गया है आखिर हज़रत डब्बे में बैठे इंजन बदला गया और इस तरह पोन घंटे की देर के बाद गाड़ी चली |
सरकार गौसे आज़म से आप की अक़ीदत व मुहब्बत :-
ये दिल ये जिगर है ये आँखें ये सर है
जहाँ चाहो रखो क़दम गौसे आज़म
हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द रहमतुल्लाह अलैह को गौसे समदानी महबूबे सुब्हानी सरकार गौसे आज़म रदियल्लाहु अन्हु से कितनी अक़ीदत व मुहब्बत थी इस वाक़िये से अंदाजा होता है | एक बार सय्यदना गौसे समदानी महबूबे सुब्हानी सरकार गौसे आज़म रादियल्लाहु अन्हु की औलाद में से नो जवान पीर ताहिर अलाउद्दीन गिलानी साहब क़िब्ला बरैली शरीफ तशरीफ़ लाए तो हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द रहमतुल्लाह अलैह की न्याज़ मंदी और अक़ीदत का ये आलम था के उनके पीछे अदब के साथ नग्गे पाऊँ चलते थे जैसे खादिम अपने आक़ा के पीछे चला करता है | हज़रत गौसे आज़म रादियल्लाहु अन्हु की ज़ात में फनाईयत का ये आलम था के आप का जिस्म व शक्ल व शबाहत हज़रत गौसे आज़म रादियल्लाहु अन्हु के हम शक्ल थीआप का मज़ारे मुबारक :- आप का मज़ारे मुबारक मुक़द्दस खानकाहे रज़विया बरैली शरीफ उत्तर प्रदेश में है इमामे अहले सुन्नत इमाम अहमद रज़ा खान बरेलवी रहमतुल्लाह अलैह के बाएं पहलू में ज़्यारत गाह खासो आम हैं हर साल लाखों अक़ीदत मंद मशाइख व उलमा दानिश्वरान शरीक होते हैं और फुयूज़ व बरकात से मुस्तफ़ीज़ होते हैं |
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हुजुर मुफ्तिये आज़म की जिंदगी 5
हुजुर मुफ्तिये आज़म की ज़िंदगी
पोस्ट 05
आप का पहला फतवा :- आप ने सिर्फ तेहरा 13 साल की क़लील उमर में रज़ाअत का मसला लिखा बादे फरागत आला हज़रत रहमतुल्लाह अलैह की हयाते तय्यबा में ही फतवा नवेसी का काम सौंप दिया गया था जिस की इब्तिदा यानि शुरू का वाक़िअ बड़ा दिल चस्प है
हज़रत अल्लामा ज़फरुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह व हज़रत मौलाना सय्यद अब्दुर रशीद साहब रहीमा हुमुल्लाह दारुल इफ्ता में काम करते थे अभी आप की नो उमरी का आलम था एक दिन दारुल इफ्ता में पहुंचे तो देखा के हज़रत अल्लामा ज़फरुद्दीन बिहारी रहमतुल्लाह अलैह फतवा लिख रहे थे
मराजे के लिए फतावा रज़विया अलमारी से निकलने लगे इस पर हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया क्या फतावा रज़विया देख कर जवाब लिखते हैं |
मौलाना ने फ़रमाया अच्छा तुम बगैर देखो लिखदो तो जाने हज़रत ने कमल बर्दाश्त जवाब लिख दिया जो रज़ाअत का मसला था ये आप का पहला फतवा था जो अपनी ज़िन्दगी में क़लम बंद फ़रमाया इसलाहो तसही के लिए वो जवाब इमामे अहले सुन्नत की ख़िदमात में पेश किया गया सेहत जवाब पर इमामे अहले सुन्नत बहुत खुश हुए और “अल जवाब बी ओनिल्लाहिल अज़ीज़िल वह्हाब” लिख कर दस्त खत फरमाए यही नहीं बल्के इनआम के तौर पर “अबुल बरकात मुहीयुद्दीन जिलानी आले रहमान मुहम्मद उर्फ़ मुहम्मद मुस्तफा रज़ा” की मुहर मौलाना हाफ़िज़ यक़ीनुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह के भाई से बनवा कर अता फ़रमाई ये वाक़िअ 1328 हिजरी का है बाराह 12 साल तक वालिद माजिद की ज़िन्दगी में फतवा नवेसी करते रहे जिस का सिसिला आखरी उमर तक जारी रहा ये मुहर हज़रत के तीसरे हज मौके पर जद्दा में दीगर सामानो के साथ गम हो गई |
आप का अख़लाक़ो किरदार व खुसूसी आदतें :- हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द रहमतुल्लाह अलैह उस खानवादे के चश्मों चिराग हैं जिन्होंने ज़माने के तहज़ीब व अख़लाक़, उख़ुवत मसावाते इस्लामी का दरस दिया जिन का दर हर मांगता के लिए हर वक़्त खुला रहता है आप में खुश अख़लाक़ी शफ़क़त तवाज़ो इंकिसारी और मुहब्बत व इखलास बदर्जाए अतम पाए जाते थे आप ने कभी किसी गरीब की दावत के रद नहीं फ़रमाया अमीरो कबीर और बड़े लोगों से दूर भागते थे और निहायत ही पाकीज़ा और बुलंद किरदार के मालिक थे |
आप की हयाते तय्यबा में एक बार अकबर अली खान साहब जो यूपी के गवर्नर थे जो आप की ज़यरत करना चाहते थे |
मगर हज़रत उन के आने से कुछ देर पहले पुराना शहर बरेली में एक बीमार दम तोड़ते हुए गरीब सुन्नी की इआदत के लिए तशरीफ़ लेगए |
इसी तरह फखरुद्दीन अली अहमद साबिक़ सदर जम्हूरिया जब वज़ीर थे इसी तरह न जाने कितने वज़ीर और अमीर आते रहते थे मगर हज़रत उन से मिलना गवारा नहीं करते थे क्यूंकि हज़रत के सियासत दुनियादारी से क्या लगाओ मेहमान की खातिर दारी में कोई कसर नहीं उठा रखते, हज़रत मेहमान खाने में तसरीफ ले जाकर एक एक मेहमान से दरयाफ्त फरमाते के खाना खाया के नहीं चाय मिली या नहीं अक्सर ये भी देखा गया के आप खुद ही मेहमानो के लिए घर के अंदर से जाकर खाने का तशत लेकर आते थे |
हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द रहमतुल्लाह अलैह हर मुस्लमान को ज़ाहिर व बातिन दोनों हालातों में मुस्लमान देखना चाहते थे हर एक को इस्लामी शिआर अपनाने की तालीम उठते बैठते देते थे दाढ़ी मुंडों नग्गे सर वालों और अंग्रेजी लिबास पहिनने वालों से बेज़ारी का इज़हार फरमाते सर पर टोपी लगाने दाढ़ी रखने और इस्लामी लिबास पहिनने की तलक़ीन करते थे |
ताई बांधने वाले से सख्त बेज़ारी इज़हार करते थे |
और ताई खींच लेते बांधने वालों से तौबा कराते थे और उस पे तज्दीदे बैअत व तज्दीदे निकाह का हुक्म लगते थे हर काम या चीज़ के लेने देने का दाहिने हाथ से एहतिमाम फरमाते गौरमिंट को सरकार कहने और कोर्ट को अदालत कहने से मना फरमाते थे |
क़ुतुब अहादीस पर दूसरी किताबें नहीं रखते थे क़िब्ले की तरफ कबि नहीं थूकते और नहीं क़िब्ले की तरफ पाऊँ करते |
क़ब्रिस्तान में जब भी तशीरफ़ ले जाते तो पूरा पैर रख कर नहीं चलते बल्के हमेशा पंजो लके बल तशरीफ़ ले जाते यहाँ तक के धूप में आधा आधा घंटा इसाले सवाब और फातिहा ख्वानी में मसरूफ रहते लेकिन पंजो के बल ही खड़े रहते |
बद फाल निकलने को हमेशा मना करते उलमा की बहुत इज़्ज़त करते सय्यदों का अदब व एहतिराम इस अंदाज़ से करते जैसे कोई रियाया अपने बादशाह का एहतिराम करती है गैर इस्लामी नाम रखने को मना करते और अंग्रेज़ों और गैर मुस्लिमो के नाम रखने को मना फरमाते सख्त नाराज़ होते और नाम बदल देते |
अब्दुल्लाह, अब्दुर रहमान, मुहम्मद, अहमद नाम को पसंद फरमाते |
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हुजुर मुफ्तिये आज़म 4
#हुजुर_मुफ्तिये_आज़म_की_ज़िंदगी
पोस्ट 4
ख़लीफ़ए आला हज़रत हज़रत अल्लामा शाह ज़ियाउद्दीन अहमद मदनी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं :- हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द वो दर्जाए सिद्दिक़ियत पर फ़ाइज़ हैं |
हज़रत अल्लामा अब्दुल मुस्तफा अज़हरी पाकिस्तान फरमाते हैं :- हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द अमानत दियानत शफ़क़त और तवाज़ो व इंकिसारी का अज़ीम पैकर थे |
हज़रत सय्यद मुख़्तार अशरफ अशरफी जिलानी सज्जादा नशीन किछौछा शरीफ फरमाते हैं: हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द रहमतुल्लाह अलैह बिला शुबा उन्ही अकबिरीन में से थे जो दिनों सुन्नियत को फरोग देने के लिए पैदा होते हैं हज़रत की पूरी ज़िन्दगी पर एक ताइराना निगाही डालिए तो ये हक़ीक़त निख़र कर सामने आजाती है के खुलूसु लिल्लाहि हिलियत उनकी शख्सियत का ट्रेड मार्क था |
उन का कोई क़ौल या अमल मेरी निगाह में ऐसा नहीं है जो खुलूसु लिल्लाहि हिलियत से आरी हो वो अगर एक तरफ मुताबाहिर आलिम, मुस्तनद, और मोतबर फ़क़ीह, मुख्तलिफ उलूम व फुनून के माहिर शेरे अदब के मिजाज़ आशना थे तो दूसरी जानिब रियाज़त इबादत, मुकाशिफ़ा व मुजाहिदा और असरार बातनि के भी मेराम थे और हर मैदान में उन के खुलूसु लिल्लाहि हिलियत की जलवागरी नुमाया तौर पर दिखाई देती थी वो एक ऐसी शमा थे जिस के गिर्द लाखों परवाने इक्तिसाबे फैज़ नूर की खातिर ज़िन्दगियों को दाओ पर चढ़ा रहे रहते थे मेरे घराने के बुज़ुर्गों से उन के देरीना और गहरे तअल्लुक़ात थे इस पस मंज़र में मुझे उनका क़ुरबे ख़ास हासिल था |
आप की तालीम व तरबियत :- हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द रहमतुल्लाह अलैह एक ऐसे इल्मी व रूहानी खनवादे के चश्मों चिराग हैं जहाँ का पूरा माहौल इल्म व नूर के सच्चे में ढाला हुआ है फिर आप इससे मुतअस्सिर न हो ये कैसे हो सकता है चुनाचे खूब खूब इक्तिसाबे फैज़ किया और जहाँ भी मौक़ा मिला शोक से हासिल किया चुनाचे आप ने हज़रत मौलाना शाह रहम इलाही मंगलोरी व मौलाना बशीर अहमद अलीगढ़ अलैहिर्रहमा से खुसूसी दरस हासिल किया उस के | बाद उलूम व फुनून सरकार अला हज़रत रहमतुल्लाह अलैह की आग़ोशे तरबियत में जुमला उलूम व फुनून को पाए तकमील तक पहुँचाया |
तफ़्सीर, फ़िक़्ह, उसूले फ़िक़हा, सरफो नहो, के अलावा तजवीद, अदब, फलसफा, मंतिक, रियाज़ी, इल्मे जफर व तकसीर, इल्मे तौक़ीत, और फन्ने तारिख गोई में भी कमाल हासिल किया |
बैअत व खिलाफत :- आप को बैअत का शरफ़ क़ुत्बे आलम शैख़े तरीक़त हज़रत शाह अबुल हुसैन अहमदे नूरी मारेहरवी रहमतुल्लाह अलैह से था और छेह 6 साल की उमर शरीफ में आप के शैख़े तरीक़त ने बैअत करने के बाद जुमला सलासिल मसलन क़दीरिया, चिश्तिया, नक्शबंदिया, सोहरवर्दिया, मदारिया वगैरह की इजाज़त से भी नवाज़ा था अपने शैख़े तरीक़त के अलावा वालिद माजिद इमामे अहले सुन्नत फाज़ले बरेलवी रहमतुल्लाह अलैह से भी खिलाफत व इजाज़त हासिल थी |
25 सफर 1340 हिजरी मुताबिक़ 28 अक्टूबर 1921 ईस्वी बरोज़ जुमा के वालिद माजिद इमामे अहले सुन्नत फाज़ले बरेलवी रहमतुल्लाह अलैह का विसाल हुआ खलफ़े अकबर हुज़ूर हुज्जतुल इस्लाम मौलाना शाह हामिद रज़ा खान रहमतुल्लाह अलैह के मंसबे सज्जादगी और खानकाहे आलिया क़दीरिया बरकातिया रज़विया और मन्ज़रे इस्लाम के तमाम उमूर व फ़राइज़ की ज़िम्मेदारी आप के सौंप दी गई हुज़ूर हुज्जतुल इस्लाम के विसाल के बाद बा इत्तिफ़ाक़े राए हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द रहमतुल्लाह अलैह खानकाहे आलिया क़दीरिया बरकातिया रज़विया और मन्ज़रे इस्लाम की सज्जादगी और तमाम उमूरे दीनिया के फ़राइज़ की ज़िम्मेदारी आप के सुपुर्द की गई |
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हुजुर मुफ्तिये आज़म पोस्ट 3
हुजुर मुफ्तिये आज़म की जिंदगी
क़िस्त – 3
हज़रत अल्लामा मुफ़्ती अब्दुर रशीद साहिब फतेहपुरी :- हज़रत मौलाना मुफ़्ती गुलाम मुहम्मद खान साहब शैखुल हदीस जामिया अमजदिया नागपुर किसी से मुरीद नहीं हुए थे किसी भी सिलसिले में व बस्ता होने के लिए बेचैन थे आखिर कार एक दिन हिंदुस्तान के मशहूर आलिम हज़रत अल्लामा मुफ़्ती अब्दुर रशीद साहिब (बानी जामिया अमजदिया नागपुर) से पूछा के हुज़ूर मुरीद होने के लिए बेचैन हूँ किसी से मुरीद होना चाहिए? तो हज़रत ने इरशाद फ़रमाया मौलाना अब कहाँ ऐसे लोग रह गए हैं जो शरीअत व तरीक़त में कामिल हों सिवाए “मुफ्तिए आज़म हिन्द” के |
हुज़ूर हाफिज़े मिल्लत रहमतुल्लाह अलैह :- हुज़ूर हाफिज़े मिल्लत रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं के अपने शहर में किसी को इज़्ज़त व मक़बूलियत नहीं मिलती लेकिन हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द को अपने दयार में जो इज़्ज़तो मक़बूलियत हासिल है इस की मिसाल कहीं नहीं मिलती ये उनकी करामत विलायत की खुली दलील है मज़ीद फरमाते हैं के हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द शहंशा हैं शहंशा यानि हज़रत के साथ शहंशा जैसा बर्ताव करना चाहिए |
हुज़ूर मुजाहिदे मिल्लत रहमतुल्लाह अलैह :- हुज़ूर मुजाहिदे मिल्लत रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं इस दौर में इनकी (हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द रहमतुल्लाह अलैह) हस्ती फ़क़ीदुल मिसाल है खुसूसियत के साथ बाबे इफ्ता में बल्के रोज़ मर्रा की गुफ्तुगू में जिस क़द्र मुहतात और मौज़ू अलफ़ाज़ और कियूद इरशाद फरमाते हैं अहले इल्म ही उनकी मंज़िल से लुत्फ़ अन्दोज़ होते हैं |
ग़ज़ालिए दौरां हज़रत अल्लामा सईद अहमद काज़मी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं :- के सय्यदी मुफ्तिए आज़म हिन्द रहमतुल्लाह अलैह की शान इस हकीकत से ज़ाहिर है के हज़रत ममदूह इमामे अहले सुन्नत मुजद्दिदे दिनों मिल्लत मौलान शाह इमाम अहमद रज़ा खान साहब बरेलवी रहमतुल्लाह अलैह के लख्ते जिगर और सही जानशीन हैं |
हज़रत कारी मुसलीहुद्दीन साहब फरमाते हैं :- हज़रत सय्यदी व मुर्शिदी सद रुश्शरिया बद रुत्तरीका के विसाल के बाद मेरी तमन्नाओं और आरज़ू का मरकज़ हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द ही की ज़ात है और वो मेरे ही क्या तमाम सुन्नियों की तमन्नाओं का मर्कज़ हैं |
हुज़ूर शम्सुल उलमा क़ज़िए मिल्लत हज़रत अल्लामा शम्सुद्दीन रज़वी जौनपुर फरमाते हैं :- फ़िक़ह का इतना बड़ा माहिर इस ज़माने में कोई दूसरा नहीं में उनकी खिदमत में जब हाज़िर होता हूँ तो सर झुका कर बैठा रहता हूँ और ख़ामोशी के साथ उनकी बातें सुनता हूँ उन से ज़्यादा बात करने की हिम्मत नहीं पढ़ती |
हज़रत मौलाना शाह अहमद नूरी सदर जमीअतुल उलमा पाकिस्तान फरमाते हैं :- मुफ्तिए आज़म हिन्द इल्मों फ़ज़ल और फ़िक़्ही बसीरत के एतिबार से “ला सानी” थे इस्लाम और आलमे इस्लाम के लिए आप की अज़ीम ख़िदमात नाक़ाबिले फरामोश हैं |
अदीबे शहीद हज़रत मुहम्मद मियां सहिसरामी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं :- एहदे हाज़िर की लाइक सद तकरीम ज़ात और क़दम क़दम पर अक़ीदतों के फूल निछावर किए जाने वाली शख्सियत है हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द जिनकी ज़िन्दगी का एक एक लम्हा और हयात की एक एक घड़ी सरमाए सआदत और दौलते इफ्तिखार है जिन की सारी उमर शरीअत की तालीम फ़ैलाने और तरीक़त की राह बताने गुज़री और जिन की ज़िन्दगी का एक एक अमल शरीअत की मीज़ान और तरिकक़्त की तराज़ू पर तौला हुआ है इस दौर में ममदूह की शख्सियत मुसलमानाने हिन्द की सरमदी सआदतों की ज़मानत है |
अगली कलम जारी है…………..
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महफिलेजमालेमिल्लत
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मुजद्दीद इब्ने मुजद्दीद हुजूर मुफ्तिये आज़म
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हुजुर मुफ्तिये आज़म 2
हुजुर मुफ्तिये आज़म की ज़िंदगी
आप सिलसिलए आलिया क़दीरिया रज़विया के 41 इकतालीस वे इमाम व शैख़े तरीक़त व पीरे कामिल हैं :- आफ़ताबे इल्म व मारफत, माहिताबे रुश्दो हिदायत, वाक़िफ़े असरारे शरीअत दानाए रुमूज़ो हक़ीक़त ताजदारे अहले सुन्नत, जामे माक़ूलात व मन्क़ूलात, शमशुल आरफीन, नाइबे सय्यदुल मुर्सलीन, मुहद्दिसे अकमल, फकीहे अजल, मुक़्तदाए आलम, शहज़ादए मुजद्दिदे आज़म हुज़ूर सय्यदी व मुर्शीदी मुफ्तिए आज़म हिन्द मौलाना अल्हाज अश्शाह अबुल बरकात मुहीयुद्दीन जिलानी आले रहमान मुहम्मद मुस्तफा रज़ा खान नूरी बरेलवी रहमतुल्लाह अलैह | “आप सिलसिलए आलिया क़दीरिया रज़विया के 41 इकतालीस वे इमाम व शैख़े तरीक़त व पीरे कामिल हैं” |
हुज़ूर मुहद्दिसे आज़म हिन्द किछौछवी अशफ़री आप के तअल्लुक़ से क्या फरमाते हैं? :- मुहद्दिसे आज़म हिन्द किछौछवी अशफ़री रहमतुल्लाह अलैह ने मुंबई में फ़रमाया था आज कल दुनिया में जनका फतवा से बढ़ कर तक़वा है | एक शख्सियत मुजद्दिदे हाज़िरा के फ़रज़न्दे दिल बंद का प्यारा नाम “मुस्तफा रज़ा” है जो बेसाख्ता ज़बान पर आता है और ज़बान बेशुमार बरकतें लेती है | नूर चश्म आला हज़रत राहते दिल मुफ्ती आज़म बनाम मुस्तफा शाहे ज़मन और हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द के एक शरई फतवा पर मुहद्दिसे आज़म हिन्द किछौछवी अशफ़री रहमतुल्लाह अलैह लिखतें हैं “ये एक ऐसे आलिम का क़ौल है जिनकी इताअत लाज़िम व ज़रूरी है
हुजुर मुफ्तिये आज़म 1
हुजूरमुफ्तिये आज़मकी जिंदगी
आप की विलादत बा सआदत :- आप की विलादत बा सआदत 22, ज़िल्हिज्जा 1310, हिजरी मुताबिक़ 18, जुलाई 1893, ईस्वी बरोज़ पीर बरैली शरीफ में हुई |
आप का इसमें गिरामी :- जिस वक़्त आप की पैदाइश हुई उस वक़्त आप के वालिद माजिद सरकार आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान रहमतुल्लाह अलैह मारहरा शरीफ में जलवा अफ़रोज़ थे वहीं रात में ख्वाब देखा के लड़के की पैदाइश हुई है | ख्वाब ही में “आले रहमान” नाम रखा | हज़रत मखदूम शाह अबुल हुसैन अहमदे नूरी मियां रहमतुल्लाह अलैह ने “अबुल बरकात मुहीयुद्दीन जिलानी” नाम तजवीज़ फ़रमाया | बाद में “मुस्तफा रज़ा” खान उर्फ़ क़रार फ़रमाया और खानदान की रस्म के मताबिक़ “मुहम्मद” के नाम पर अक़ीक़ा हुआ |
आप के पीरो मुर्शिद की बशारत :- हज़रत मखदूम शाह अबुल हुसैन अहमदे नूरी मियां रहमतुल्लाह अलैह ने इमामे अहले सुन्नत फाज़ले बरेलवी रहमतुल्लाह अलैह से फ़रमाया, मौलाना जब में बरेली आऊँगा तो इस इस बच्चे को ज़रूर देखूंगा वो बहुत ही मुबारक है चुनाचे जब आप बरेली शरीफ रौनक अफ़रोज़ हुए उस वक़्त सरकार मुफ्तिए आज़म हिन्द मुहम्मद मुस्तफा रज़ा खान नूरी रहमतुल्लाह अलैह की उमर शरीफ छह 6 महीने की थी ख्वाइश के मुताबिक़ बच्चे को देखा और इस नेमत के हुसूल पर इमामे अहले सुन्नत फाज़ले बरेलवी रहमतुल्लाह अलैह को मुबारक बाद दी और फ़रमाया ये बच्चा दीनो मिल्लत की बड़ी खिदमत करेगा |
और मख़लूक़े खुदा को इस की ज़ात से बहुत फैज़ पहुंचेगा ये बच्चा “वली” है इस की निगाहों से लाखों गुमराह इंसान दीने हक़ पर होंगें ये फैज़ का दरिया बहाएगा ये फरमाते हुए हज़रत नूरी मियां रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी मुबारक उंगलियाँ बुलंद इक़बाल बच्चे के दहन (मुँह) मुबारक में डाल कर मुरीद किया और इसी वक़्त तमाम सलासिल की इजाज़त व खिलाफत भी अता फ़रमाई |
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इन्ना अहसनल हदीसे किताबुल्लाही
और ऐ ईमान वालो होशियारी से काम लो ( ७ ) फिर दुश्मन की तरफ़ थोड़े थोड़े होकर निकलो या इकट्ठे चलो (७१)
तुम में कोई वह है कि ज़रूर देर लगाएगा ( २ ) फिर अगर तुमपर कोई मुसीबत पड़े तो कहे खुदा का मुझपर एहसान था कि मैं उनके साथ हाज़िर न था (७२)
और अगर तुम्हें अल्लाह का फ़ज़्ल मिले ( ३ ) तो ज़रूर कहे ( ४ ) गोया तुममें उसमें कोई दोस्ती न थी ऐ काश मैं उनके साथ होता तो बड़ी मुराद पाता ७३ )
तो उन्हें अल्लाह की राह में लड़ना चाहिये जो दुनिया की ज़िन्दगी बेचकर आख़िरत लेते हैं और जो अल्लाह की राह में ( ५ ) लड़े फिर मारा जाए या ग़ालिब ( विजयी ) आए तो जल्द ही हम उसे बड़ा सवाब देंगे ( ७४ )
, और तुम्हें क्या हुआ कि न लड़ो अल्लाह की राह में और कमज़ोर मर्दों और औरतों और बच्चों के वास्ते यह दुआ कर रहे हैं कि ऐ हमारे रब हमें इस बस्ती से निकाल जिसके लोग ज़ालिम हैं और हमें अपने पास से कोई हिमायती दे दे और हमें अपने पास से कोई मददगार दे दे ( ७५ )
ईमान वाले अल्लाह की राह में लड़ते हैं ( ६ ) और काफ़िर शैतान की राह में लड़ते हैं तो शैतान के दोस्तों से ( ७ ) ( लड़ो बेशक शैतान का दाव कमज़ोर है (८){७६}
अल क़ुरआन सुरह निसा आयत 71 से 76
ईद मिलादुन्नबी पोस्ट 3
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🇨🇨ईद मिलाद-उन-नबी ﷺ पोस्ट नं.➪:③
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🌟 اَلصَّــلٰوةُوَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَارَسُوْلَ اللّٰهﷺ
🌸👉 सवाल 3 :- क्या सहाबा किराम रिदवानुल्लाहि अन्हुम ने भी कभी मीलाद की महफ़िल मुन्अकिद की है ..?
🌹👉 जवाब 3 : – जी हाँ ! इमाम बुखारी के उस्ताद इमाम अह़मद बिन हम्बल लिखते हैं : सय्यिदुना अमीर मुआ़विया रदियल्लाहु अ़न्हु फ़रमाते हैं : एक रोज़ रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम का अपने असहाब के ह़लके से गुज़र हुआ ,आप सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम ने फरमायाः क्यों बैठे हो ? उन्होंने कहाः हम अल्लाह तआ़ला का जिक्र करने और उसने हमें जो इस्लाम की हिदायत अ़ता फरमाई उस पर हम्द व सना ( तारीफ ) बयान करने और उसने आप सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम को भेज कर हम पर जो एहसान किया है उसका शुक्र अदा करने के लिये बैठे थे । आपने फ़रमायाः अल्लाह की क़सम ! क्या तुम इसी के लिये बैठे थे ? सहाबा ने अर्ज़ कियाः अल्लाह की क़सम ! हम सब इसी के लिये बैठे थे । इस पर आप सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम ने फ़रमायाः अभी मेरे पास जिबरईल अ़लैहिस्सलाम आए थे , उन्होंने कहा कि अल्लाह तुम्हारी वजह से फ़रिश्तों पर फख्र कर रहा है ।
📓सुनने नसई , हृदीस : 5443 , अल – मोजमुल कबीर : तिबरानी , हदीसः 16057
👉🏻इस हदीस से साबित हुआ कि सहाबा हुजूर सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम की मीलाद ( पैदाइश ) पर शुक्र अदा करते थे । यहाँ ये बात भी काबिले ज़िक्र है कि जो लोग हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम की मीलाद की महफ़िल सजाते हैं और उसमें शरीक होते हैं , अल्लाह ऐसे बन्दों पर फ़रिश्तों की जमाअ़त में फख्र फ़रमाता है और हाँ ! हुजूरे अक़दस सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम का ज़िक्र अल्लाह ही का जिक्र है इस पर कुर्आन और हुजूर की हदीसें गवाह हैं ।
📓ईद मिलाद-उन-नबी सवाल वह जवाब की रोशनी में , सफा 9/10
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ईद मिलादुन्नबी पोस्ट 2
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🇨🇨ईद मिलाद-उन-नबी ﷺ पोस्ट नं.➪:②
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🌹👉 सवाल 2 : – क्या आप साबित कर सकते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी मीलाद मनाई ?
🌸👉 जवाब 2 : – जी हाँ ! हदीस मुलाहज़ा फ़रमाएँ : हज़रत अबू क़तादा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूले अकरम सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम से पीर ( सोमवार ) के दिन रोज़ा रखने के बारे में पूछा गया तो आप सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम ने इरशाद फरमायाः ” इसी रोज़ मेरी विलादत हुई , इसी रोज़ मेरी बिअ़स़त हुई और इसी रोज़ मेरे ऊपर कुर्आन नाज़िल किया गया
📓सहीह मुस्लिम , हदीसः 2807 , सुनने अबू दाऊद , हदीसः 2428 , मुस्नद इमाम अहमद बिन हम्बल , हदीस 23215
👉 इस ह़दीस से साबित हुआ कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम ने हर पीर के दिन रोज़ा रख कर अपनी मीलाद का खुद एहतेमाम किया है । लिहाज़ा साबित हुआ कि दिन मुकर्रर करके यादगार मनाना सुन्नत है । (अलहम्दु’लिल्लाह)
📓ईद मिलाद-उन-नबी सवाल वह जवाब की रोशनी में , सफा 9
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ईद मिलादुन्नबी पोस्ट 1
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🇨🇨ईद मिलाद-उन-नबी ﷺ पोस्ट नं.➪:①
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🇨🇨 ईद मीलादुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सवाल व जवाब की रोशनी में मीलादुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर किये गए सवालात और उनके जवाबात👇🏻
🌹👉 सवाल 1 : – क्या आप कुर्आन मजीद से रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की आमद पर खुशी मनाने की दलील दे सकते हैं.?
🌸👉 जवाब 1 : – ‘जी हाँ ! अल्लाह तआ़ला कुर्आन मजीद में इरशाद फ़रमाता है :-
👉🏻तर्जमाः- “ऐ हबीब आप फरमा दीजिये कि अल्लाह के फज्ल और उसकी रह़मत मिलने पर मुसलमानों को चाहिये कि खुशियाँ मनाएँ।
📓सूर-ए-यूनुस, आयतः 58
👉🏻इस आयत में ये हुक्म दिया गया कि जब अल्लाह का फज्ल और उसकी रह़मत नाज़िल हो तो मोमिनों को उस पर खुशियाँ मनानी चाहिये । अब किसी जहन में ये सवाल आ सकता है कि क्या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम अल्लाह की रह़मत हैं ? जो हम उनकी आमद पर खुशियाँ मनाएँ । इसका जवाब भी खुद कुर्आन दे रहा है । मुलाहज़ा करें :-👇🏻
👉 तर्जमा:- हमने तुम्हें नहीं भेजा मगर रह़मत सारे जहान के लिये!
📓सूर-ए-अम्बिया, आयतः 107
👉 अलहम्दुलिल्लाह रसूले अरबी सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम का इस दुनिया में तशरीफ़ लाना रह़मत है और पहली आयत में अल्लाह तआ़ला हमें रहमत मिलने पर खुशियाँ मनाने का हुक्म दे रहा है । अब बताओ मुसलमानो ! रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम की ज़ाते मुबारक से बढ़ के रह़मत कौन हो सकता है ! तो मीलादुन्नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम पर खुशियाँ क्यों न मनाया जाए ?
👉 अलहम्दु लिल्लाह कुर्आन की इन आयतों से आमदे रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम पर खुशियाँ मनाना साबित हुआ ।
📓ईद मिलाद-उन-नबी सवाल वह जवाब की रोशनी में , सफा 8
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मुहर्रम 1 कूफियो के खत
शहर की बुनिया उस वक्त पड़ी जबकि 14 हिजरी से 16 हिं 0 तक कादसिया वगैरा में फुतूहात के बाद मुसलमानों की फौज ने इराक में सुकूनत इख्तियार की और मदाइन की आबो – हवा उन के मुवाफिक न हुई तो सहाबिए रसूल हज़रत सअद बिन वकास रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के हुक्म से यह जगह तलाश की गई और मुसलमानों के लिये मकानात की तामीर हुई ।
फिर आप 17 हिजरी में अपनी फौज के साथ मदाइन से मुन्तकिल होकर यहां मुकीम हुए । इस तरह कूफा शहर वुजूद में आया । हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के ज़माना ही से कूफा आप के शियओं और महबूबों का मरकज़ था , वहां के लोग हज़रत अमीरे मुआविया के अहदे ख़िलाफत ही में हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की ख़िदमत में तशरीफ आवुरी की अरज़ियां भेज चुके थे मगर आप ने साफ इनकार कर दिया था । अब जबकि कूफा वालों को मालूम हुआ
कि अमीरे मुआविया का इन्तेकाल हो गया और इमामे आली मक़ाम ने यजीद की बैअत से इनकार कर दिया तो बरिवायत तारीख तबरी सुलैमान बिन सुरद के मकान में वहां के शिया जमा हुए , हज़रत अमीरे मुआविया के इन्तेकाल का ज़िक करके सब ने खुदा का शुक अदा किया , फिर सुलैमान ने सब से कहा कि मुआविया का इन्तेकाल हो गया है . और हज़रत इमाम हुसैन ने यज़ीद की बैअत से इनकार कर दिया है और मक्का चले गए हैं , आप लोग उनके और उनके बाप के शिया हैं , अगर उनके मददगार बन सकते हैं और उनके दुश्मनों से जंग कर सकते हैं तो उन को तशरीफ आवुरी के लिये ख़त लिखें और अगर कमज़ोरी या बुज़दिली का अंदेशा हो तो धोका देकर उन की जान को खतरे में न डालें । सब ने बयक ज़बान कहा कि हम – उन को धोका न देंगे बल्कि हम उनके दुश्मनों से लड़ेंगे और अपनी जानें उन पर कुर्बान कर देंगे । ( तबरी : 2/176 )
चुनांचे पहला ख़त जो उन लोगों की तरफ से लिखा गया उस में हज़रत अमीरे मुआविया के इन्तेकाल और यज़ीद की वली अहदी का ज़िक करने के बाद तहरीरं किया गया कि हमारे सर पर कोई इमाम नहीं है , आप तशरीफ लाइये , खुदाए तआला आप की बरकत से हमें हक़ की हिमायत नसीब फरमाए । दमिश्क का गवर्नर नोमान बिन बशीर यहां मौजूद है मगर हम उस के साथ नमाजे जुमा में शरीक नहीं होते और न उस के साथ ईदगाह जाते हैं । जब हमें मालूम हो जाएगा कि आप तशरीफ ला रहे हैं तो हम उस को यहां से निकाल कर मुल्के शाम जाने पर मजबूर कर देंगे । ( तबरी : 2/177 )
यह पहला ख़त अब्दुल्लाह बिन सुबैय हमदानी और अब्दुल्लाह बिन दाल के बदस्त रवाना किया गया जो , इमामे आली मक़ाम की खिदमत में 10 रमज़ान 60 हिजरी को मक्का मुअज्जमा पहुंचा । इस ख़त की रवांगी के बाद दो ही दिन के अरसे में 53 अरज़ियां और तैयार हो गई जो एक दो तीन और चार आदमियों के दस्तख़त से थीं , यह सारे खुतूत तीन आदमियों के हाथ इरसाल किये गए । इस के बाद फिर कुछ मख्सूस लोगों ने अरज़ियां भेजीं और यह सब यके बाद दीगर थोड़े वक्फे से हज़रत की ख़िदमत में पहुंच गई । ( तबरी : 2/177 )
हवाला ख़ुत्बाते मुहर्रम
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अल्लाह तआ़ला ﷻ अपने ह़बीब ﷺ के वसीले से तमाम सुन्नी मुसलमानों को इ़ल्मे दीन सीखने और सिखाने की तौफ़ीक़ अ़त़ा फ़रमाये, और अ़मल करने की भी तौफ़ीक़ अ़त़ा फ़रमाये, और ख़ातिमः ईमान पर फ़रमाये, आमीन
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शहीद की कितनी किस्में है ??
शहीद की किस्में शहीद की तीन किस्में हैं : 1- शहीदे हक़ीकी , 2- शहीदे फिकही और 3- शहीदे हुक्मी ।
1. जो अल्लाह की राह में कत्ल किया जाए वह शहीदे हकीकी है
2. शहीदे फिकही उसे कहते हैं कि आकिल बालिग मुसलमान जिस पर गुस्ल फर्ज न हो वह तलवार व बंदूक वगैरा आलए जारिहार जुल्मन कत्ल किया जाए और कत्ल के सबब माल न वाजिब हुआ हो और न ज़ख्मी होने के बाद कोई फायदा दुनिया से हासिल किया हो और न ज़िन्दों के अहकाम में से कोई हुकम उस पर साबित हुआ हो । यानी अगर पागल , ना बालिग या हैज़ व निफास वाली औरतें और जुनुब शहीद किये जाएं तो वह शहीदे फिक्ही नहीं । और अगर कत्ल से माल वाजिब हुआ हो जैसे कि लाठी से मारा गया या कल्ले ख़ता कि मार रहा था शिकार को और लग गया किसी मुसलमान को , या ज़ख्मी होने के बाद खाया पिया , इलाज किया , नमाज़ का पूरा वक़्त होश में गुज़रा और वह नमाज़ पर कादिर था या किसी बात की वसिय्यत की तो वह शहीदे फिक्ही नहीं । मगर शहीदे फिक़्ही न होने का यह मञ्ना नहीं कि वह शहीद होने का सवाब भी नहीं पाएगा बल्कि इस का मतलब सिर्फ इतना है कि उसे गुस्ल दिया जाएगा और शहीदे फिक़्ही नमाज़े जनाज़ा तो पढ़ी जाएगी मगर उसे गुस्ल नहीं दिया जाएगा वैसे ही खून के साथ दफन कर दिया जाएगा । और जो चीजें कि अज़ किस्म कफन नहीं होंगी उन्हें उतार लिया जाएगा जैसे जिरह , टोपी और हथियार वगैरा । और कफन मस्नून में अगर कमी होगी तो उसे पूरा किया जाएगा । पाजामा नहीं उतारा जाएगा और सारे कपड़े उतार कर नए कपड़े नहीं दिये जाएंगे कि मकरुह है ।
3. शहीदे हुक्मी वह है कि जो जुल्मन नहीं कत्ल किया गया मगर कियामत के दिन वह शहीदों के गिरोह में उठाया जाएगा ।
हदीस शरीफ में है कि सरकारे अक्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि खुदाए तआला की राह में शहीद किये जाने के अलावा सात शहादतें और हैं , जो ताऊन में मरे शहीद है , जो डूब कर मर जाए शहीद है , जो ज़ातुल जुनब ( नमूनिया ) में मरे शहीद है , जो पेट की बीमारी में मर शहीद है , जो आग में जाए शहीद है , जो इमारत के नीचे दब कर मर जाए वह शहीद है और जो औरत बच्चे की पैदाइश के वक्त मर जाए वह भी शहीद है । ( मिश्कात शरीफः 136 )
हवाला :- ख़ुत्बाते मुहर्रम सफा 20-21
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*अल्लाह तआ़ला ﷻ अपने ह़बीब ﷺ के वसीले से तमाम सुन्नी मुसलमानों को इ़ल्मे दीन सीखने और सिखाने की तौफ़ीक़ अ़त़ा फ़रमाये, और अ़मल करने की भी तौफ़ीक़ अ़त़ा फ़रमाये, और ख़ातिमः ईमान पर फ़रमाये, आमीन*
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राहे ख़ुदा में ख़र्च करने के बारे क़ुरआन की आयते मुबारका
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“तुम हरगिज़ भलाई को न पहुँचोगे जब तक राहे ख़ुदा में अपनी प्यारी चीज़ ना खर्च करो और तुम जो कुछ ख़र्च करो अल्लाह को मालूम है”
(सुरः आले इमरान आयत नं.92)
“हज़रत अबु तल्हा अंसारी मदीने में बड़े मालदार थे उन्हें अपनी चीज़ों में बयरूहा बाग़ (एक बाग़ का नाम है) बहुत पसदं था जब ये आयत नाज़िल हुई तो आपने बारगाहे रिसालत में खड़े होकर अर्ज़ की : मुझे अपने अमवाल में बाग़ सबसे प्यारा है मैं इसी को राहे ख़ुदा में सदक़ा करता हूँ हुज़ूरे अक़दस ने इस पर मुसर्रत (ख़ुशी) का इज़हार फ़रमाया”
(सही बुख़ारी और मुस्लिम शरीफ़)
हर इंसान को कोई ना कोई चीज़ बहुत प्यारी होती है किसी को दिरहमो दिनार (माल), किसी को औलाद, किसी को बीवी, किसी को कपड़े, किसी को खाने की कोई चीज़, तो किसी को और कुछ, इस आयते मुबारका का जो दूसरा हिस्सा है “और तुम जो कुछ ख़र्च करो अल्लाह को मालूम है” इसके तहत फ़रमाया गया है की “बेशक़ अल्लाह पाक जानता है की तुम उसकी राह में उम्दा, नफ़ीस और अपनी पसंदीदा चीज़ ख़र्च कर रहे हो
या रद्दी, नागवारा, ना पसंदीदा चीज़ ख़र्च कर रहे हो, तो जैसी चीज़ तुम ख़र्च करोगे उसी के मुताबिक़ अल्लाह तुम्हें जज़ा (बदला) अता फ़रमाएगा”
असरा फाउंडेशन धमतरी (छ. ग.) आपसे मोअद्दबाना गुज़ारिश करती है कि अल्लाहो रसूल को राज़ी करने के लिए और दोनों जहाँ में बेहतरीन अज्र हासिल करने के लिए आप अपना प्यारा और क़ीमती माल फाउंडेशन को ज़्यादा से ज़्यादा डोनेट करें
नोट : अपनी क़ीमती ज़कात, सदक़ात, डोनेशन (₹365,₹500,₹1000) देने के लिए इस नंबर पर राब्ता क़ाइम करे
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इस खैर के काम मे कोई कमीशन नही है इस लिए ज्यादा से ज्यादा जकात सदका इसाले सवाब भेजे जिससे जरूरत मंदो की मदद जारी रहे
माले जकात किन लोगों में सर्फ (तकसीम) की जाए ???
मसला : – ज़कात के मसारिफ सात हैं यअनी सात किस्म के लोगों को ज़कात दे सकते हैं 1. फकीर 2. मिस्कीन 3. आमिल 4. रिकाब 5. गारिम 6. फीसबीलिल्लाह 7. इनुस्सबील ।
मसला : – फकीर वह शख्स है जिस के पास कुछ हो मगर न इतना कि निसाब को पहुँच जाये या निसाब की कद्र हो तो उसकी हाजते अस्लिया में मुस्तगरक ( घिरा हुआ ) हो मसलन रहने का मकान पहनने के कपड़े खिदमत के लिये लौंडी , गुलाम । इल्मी शुग्ल रखने वाले को दीनी कितायें जो उसकी जरूरत से ज़्यादा न हो जिसका बयान गुज़रा यूँही अगर मदयून ( कर्जदार है और दैन निकालने के बद निसाब बाकी न रहे तो फकीर है अगर्चे उसके पास एक तो क्या कई निसाबें हो ।
मसाला : – फकीर अगर आलिम हो तो उसे देना जाहिल को देने से अफज़ल है । ( आलमगीरी ) मगर आलिम को दे तो इसका लिहाज़ रखे कि उसकी इज्जत मद्देनज़र हो अदब के साथ दे जैसे छोटे बड़ों को नज़र देते हैं । और मआजल्लाह आलिमे दीन की हिकारत ( जिल्लत ) अगर दिल में आई तो यह हलाकत और बहुत सख्त हलाकत है ।
मसला : – मिस्कीन वह है जिसके पास कुछ न हो यहाँ तक कि खाने और बदन छुपाने के लिये उसका मुहताज है कि लोगों से सवाल करे और उसे सवाल हलाल है फकीर को सवाल नाजाइज़ कि जिसके पास खाने और बदन छुपाने को हो उसे बगैर जरूरत व मजबूरी सवाल हराम है । आलमगीरी )
मसअला : – आमिल वह है जिसे बादशाहे इस्लाम ने ज़कात और उन दुसूल कर ने के लिए मुकर्रर किया उसे काम के लिहाज से इतना दिया जाये कि उसको और उसके मददगारों मुतवस्सित ( दरमियानी ) तौर पर काफी हो मगर इतना न दिया जाये कि जो वुसूल कर लाया है उस के निस्फ से ज्यादा हो जाये ।
मसला : -आमिल अगचे गनी हो अपने काम की उजरत ले सकता है और हाशिमी हो तो उसको जकात के माल में से देना भी नाजाइज और उसे लेना भी नाजाइज़ हाँ अगर किसी और मद से दें तो लेने में हरज नहीं । ( आलमगीरी )
मसला : – ज़कात का माल आमिल के पास से जाता रहा तो अब उसे कुछ न मिलेगा मगर देने वालों की ज़कातें अदा हो गयीं । र मुगार रहुल मुहतार ) मसअला : – कोई शख्स अपने माल की ज़कात खुद ले जाकर बैतुलमाल में दे आया तो उसका मुआवज़ा आमिल नहीं पायेगा । ( आलमगीरी )
मसअला : – वक्त से पहले मुआवज़ा ले लिया या काज़ी ने दे दिया यह जाइज़ है मगर बेहतर यह है कि पहले न दें और अगर पहले ले लिया और वुसूल किया हुआ माल हलाक हो गया तो ज़ाहिर यह कि वापस न लेंगे । हुल मुहवार ) मसअला : – रिकाब से मुराद मुकातिब गुलाम ( मुकातिब गुलाम वह कि मालिक ने उससे यह कह दिया हो कि रुपया दे दो तो तुम आजाद हो ) को देना कि उस ज़कात के माल से बदले किताबत यअनी वही रूपया जो आज़ाद होने के लिए मालिक को देना है , अदा करे और गुलामी से अपनी गर्दन रिहा करे ।
मसला : – ग़नी के मुकातिब को भी माले जकात दे सकते हैं अगर्चे मलूम है कि यह गनी का मुकातिब है । मुकातिब पूरा बुदले किताबत अदा करने से आजिज़ हो गया और फिर ब – दस्तूर गुलाम हो गया तो जो कुछ इसने माले ज़कात लिया है उसका मौला खर्च में ला सकता है अगर्चे गनी हो ।
मसला : – मुकातिब को जो ज़कात दी गयी वह गुलामी से रिहाई के लिये है मगर अब इसे इख्तियार है कि दूसरी जगह खर्च कर सकता है अगर मुकातिब के पास ब – कद्रे निसाब माल है और बदले किताबत से भी ज़्यादा है जब भी ज़कात दे सकते हैं मगर हाशिमी के मुकातिब को जकात नहीं दे सकते ( आलमगीरी )
मसला : – गारिम से मुराद मदयून है यअनी उस पर इतना दैन हो कि उसे निकालने के बअद निसाब बाकी न रहे अगर्चे उसका औरों पर बाकी हो मगर लेने पर कादिर न हो मगर शर्त यह है कि मदयून हाशिमी न हो ।
मसअला : – फीसबीलिल्लाह यअनी राहे खुदा में खर्च करना इसकी चन्द सूरतें हैं मसलन कोई शख्स मुहताज है कि जिहाद में जाना चाहता है सवारी और सफर का सामान उसके पास नहीं तो उसे माले जकात दे सकते हैं कि वह राहे खुदा में देना है अगर्चे वह कमाने पर कादिर हो या कोई हज को जाना चाहता है और उसके पास माल नहीं उस को ज़कात दे सकते हैं मगर उसे हज के लिये सवाल करना जाइज़ नहीं या तालिबे इल्म कि इल्मे दीन पढ़ता या पढ़ाना चाहता है उसे दे सकते हैं कि यह भी राहे खुदा में देना है बल्कि तालिबे इल्म सवाल करके भी माले जकात ले सकता है जबकि उसने अपने आप को इसी काम के लिये फारिग कर रखा हो अगचे कसब ( कमाने ) पर कादिर हो यूँही हर नेक बात में ज़कात सर्फ करना फीसबीलिल्लाह है जबकि ब – तौरे तमलीक ( मालिक बना देने के तौर ) हो कि बगैर तमलीक ज़कात अदा नहीं हो सकती ( )
हवाला :- बहारे शरीयत जिल्द 05
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सोने ,चांदी व तिजारत के माल की जकात का बयान 03
मसला : – सोने की निसाब बीस मिस्काल है यअनी साढ़े सात तोले ( 87 ग्राम 480 मिलीग्राम ) और चाँदी को दो सौ दिरहम यअनी साढ़े बावन तोले ( -612 ग्राम 360 मिलीग्राम ) यानी वह तोला जिससे यह राइज रुपया सवा ग्यारह माशे है । सोने चाँदी की ज़कात में वज़न का एअतिबार है कीमत का लिहाज़ नहीं , मसलन सात तोले सोने या कम का ज़ेवर या बर्तन बना हो कि उसकी कारीगरी की वजह से दो सौ दिरहम से जाइद कीमत हो जाये या सोना गिरौं हो कि साढ़े सात तोले से कम की कीमत दो सौ दिरहम से बढ़ जाये जैसे आज कल कि साढ़े सात तोले सोने की कीमत चाँदी की कई निसाबें होंगी । गरज़ यह कि वजन में ब – कद्रे निसाब न हो तो . ज़कात वाजिब नहीं , कीमत जो कुछ भी हो । यूँही सोने की जकात में सोने और चाँदी की ज़कात में चाँदी की कोई चीज़ दी तो कादरी उसकी कीमत का एअतिबार न होगा बल्कि वज़न का अगर्चे उसमें बहुत कुछ सनअत ( कारीगरी ) हो जिस की वजह से कीमत बढ़ गयी या फर्ज करो दस आने भर चाँदी बिक रही है और ज़कात में एक रुपया दिया जो सोलह आने का करार दिया जाता है तो ज़कात अदा करने में वह यही समझा जायेगा कि सवा ग्यारह माशे चाँदी दी यह छह आने बल्कि कुछ ऊपर जो उसकी कीमत में जाइद हैं लाव ( बेकार ) हैं ।
मसला : – यह जो कहा गया कि अदाए जकात में कीमत का एअतिबार नहीं यह उसी सूरत में है कि उस जिन्स की जकात उसी जिन्स से अदा की जाये और अगर सोने की ज़कात चाँदी से या चाँदी की सोने से अदा की तो कीमत का एअतिबार होगा मसलन सोने की जकात में चाँदी की कोई चीज़ दी जिसकी कीमत एक अशर्फी है तो एक अशर्फी देना करार पायेगा अगचे वजन में इसकी चाँदी पन्द्रह रुपये भर भी न हो ।
मसअला : – सोना चाँदी जबकि ब – कद्रे निसाब हों तो इन की ज़कात चालीसवाँ हिस्सा है ख्वाह वह वैसे ही हों या इनके सिक्के जैसे रुपये अशर्फियाँ या इनकी कोई चीज़ बनी हुई हो ख्वाह उसका इस्तेमाल जाइज़ हो जैसे औरत के लिये जेवर मर्द के लिये चाँदी की एक नग की एक अँगूठी साढ़े चार माशे से कम की या सोने चाँदी के बिला जन्जीर के बटन , या इस्तेमाल नाजाइज हो जैसे चाँदी सोने के बर्तन , घड़ी , सुर्मे दानी , सलाई कि इनका इस्तेमाल मर्द औरत सब के लिये हराम है या मर्द के लिये सोने चाँदी का छल्ला या जेवर या सोने की अंगूठी या साढ़े चार माशे से ज़्यादा चाँदी की अंगूठी या बन्द अंगूठियाँ या कई नग की एक अँगूठी गरज जो कुछ हो जकात सब की वाजिब है मसलन सात तोला सोना है तो दो माशा ज़कात वाजिब है या बावन तोला छह माशा चाँदी है तो एक तोलो तीन माशा छह रत्ती जकात वाजिब है । )
मसला : – सोना चाँदी के अलावा तिजारत की कोई चीज़ हो जिसकी कीमत सोने चाँदी की निसाब को पहुँचे तो उस पर भी ज़कात वाजिब है यअनी कीमत का चालीसवाँ हिस्सा , और अगर असबाब की कीमत तो निसाब को नहीं पहुँचती मगर उसके पास इनके अलावा सोना चाँदी भी है तो इनकी कीमत सोने चाँदी के साथ मिला कर मजमूआ करें ( यअनी टोटल करें ) अगर मजमूआ निसाब को पहुँचा जकात वाजिब है और असबाबे तिजारत की कीमत उस सिक्के से लगायें जिसका रिवाज वहाँ ज्यादा हो जैसे , हिन्दुस्तान में रुपये का ज्यादा चलन है इसी से कीमत लगाई जाये और अगर कहीं सोने – चाँदी दोनों के सिक्कों का यकसौं चलन हो तो इख्तियार है जिससे चाहें कीमत लगायें मगर जबकि रुपये से कीमत लगायें तो निसाब नहीं होती और अशर्फी से हो जाती है या बिल अक्स ( यअनी इसका उल्टा ) तो उसी से कीमत लगाई जाये जिससे निसाब पूरी हो और अगर दोनों से निसाब पूरी होती है मगर एक से निसाब के अलावा निसाब का पाँचवा हिस्सा ज्यादा होता है दूसरे से नहीं तो उस से कीमत लगायें जिस से एक निसाब और निसाब का पाँचवाँ हिस्सा हो । दुई मुखशार वगैरा )
मसला – निसाब से ज्यादा माल है तो अगर यह ज्यादती निसाब का पाँचौं हिस्सा है तो इसकी जकात भी वाजिब है मसलन दो सौ चालीस दिरहम यअनी 63 तोला चाँदी हो तो ज़कात में छह दिरहम वाजिब यनी एक तोला छह माशा । रत्ती यानी बावन तोला छह माशा के बद हर 10 तोला माशा पर 3 माशा – रत्ती बढ़ायें और सोना नौ तोला हो तो 2 भाशा रत्ती यनी । तोला 6 माशा के बद हर एक तोला 6 माशा पर रत्ती बढ़ायें और पाँचवाँ हिस्सा न हो तो माफ यानी मसलन नौ तोला से एक रत्ती कम अगर सोना है तो ज़कात वही 7 तोला 6 माशा की वाजिब है यअनी दो माशा यूँही चाँदी अगर 63. तोला से एक रत्ती भी कम है तो जकात वही 52 तोला 6 माशा की एक तोला 3 माशा 6 रत्ती वाजिब यूँही पाँचवें हिस्से के बअद जो ज्यादती है अगर वह भी पाँचवाँ हिस्सा है तो उसका चालीसवाँ हिस्सा वाजिब वरना मुआफ और इसी तरह आगे समझ लें । माले तिजारत का भी यही हुक्म है ।
मसअला : – जो माल किसी पर दैन हो उसकी ज़कात कब वाजिब होती है और अदा कब वाजिब है इस में तीन सूरतें हैं अगर दैन कवी हो जैसे कर्ज जिसे उर्फ में दस्तगरदाँ ( कर्ज ही के मअना में आया है ) कहते हैं और माले तिजारत का समन मसलन कोई माल इसने ब – नियते तिजारत खरीदा उसे किसी के हाथ उधार बेच डाला या माले तिजारत का किराया मसलन कोई मकान या जमीन ब – नियते तिजारत खरीदी उसे किसी को सुकूनत या खेती के लिए किराये पर दे दिया यह किराया अगर उस पर दैन है तो देने कवी होगा और देने कवी की ज़कात ब – हालते दैन ही साल – ब – साल वाजिब होती रहेगी मगर वाजिबुल अदा उस वक्त है जब पाँचवाँ हिस्सा निसाब का उसूल हो जाये मगर जितना उसूल हुआ उतने ही की वाजिबुल अदा है यअनी चालीस दिरहम होने से एक दिरहम देना वाजिब होगा और अस्सी वुसूल हुए तो दो और इसी तरह आगे समझ लें दूसरे दैने मुतवस्सित कि किसी माले गैरे तिजारती का बदल हो मसलन घर का गल्ला या सवारी का घोड़ा या खिदमत का गुलाम या और कोई शय हाजते असलिया की बेच डाली और दाम खरीदार पर बाकी हैं इस सूरत में ज़कात देना उस वक़्त लाज़िम आयेगा कि दो सौ दिरहम पर कब्जा हो जाये । यूँही अगर मूरिस ( वह मरने वाला जो माल और वारिस छोड़ जाये ) का दैन इसे तर्के में मिला अगचे माले तिजारत का एवज़ ( बदल ) हो मगर वारिस को दो सौ दिरहम वुसूल होने और मूरिस की मौत को साल गुज़रने पर ज़कात देना लाज़िम आयेगा । तीसरे दैने जईफ जो गैरे माल का बदल हो जैसे महरे बदल , खुला ( तलाक पर मिला रुपया ) दियत ( कत्ल के बदले मिला जुर्माना ) बदले किताबत ( गुलामी से आजाद करने पर मिला रुपया ) या मकान या दुकान कि ब – नियते तिजारत खरीदी न थी उसका किराया किरायेदार पर चढ़ा इसमें ज़कात देना उस वक़्त वाजिब है कि निसाब पर कब्जा करने के बद साल गुजर जाये या इसके पास कोई निसाब उस जिन्स की है और उसका साल पूरा हो जाये तो ज़कात वाजिब है फिर अगर दैन या मुतवस्सित कई साल के बद वुसूल हो तो अगले साल की जकात जो इसके ज़िम्मे दैन होती रही वह पिछले साल के हिसाब में इसी रकम पर डाली जायेगी मसलन उम्र पर जैद के तीन सौ दिरहम दैने कवी थे पाँच बरस बद चालीस दिरहम से कम वुसूल हुए तो कुछ नहीं और चालीस वुसूल हुए तो एक दिरहम देना वाजिब हुआ अब उन्तालीस बाकी रहे कि निसाब के पाँचवें हिस्स से कम हैं लिहाजा बाकी बरसों की अभी वाजिब नहीं और अगर तीन सौ दिरहम देने मुतवस्सित थे तो जब तक दो सौ दिरहम तुसूल न हों कुछ नहीं और पाँच बरस बाद दो सौ वुसूल हुए तो इक्कीस वाजिब होंगे । साले अब्बल के पाँच अब साले दोम में एक सौ पचानवे रहे , इनमें से पैंतीस कि पाँचवें हिस्से से कम हैं माफ हो गये एक सौ साठ रहे.इसके चार दिरहम वाजिब । लिहाज़ा तीसरे साल । एक सौ इक्यानवे रहे इनमें भी चार दिरहम वाजिब चहारुम में एक सौ सतासी रहे पन्जुम में एक सौ तिरासी रहे इनमें भी चार – चार दिरहम वाजिब लिहाज़ा कुल इक्कीस दिरहम वाजिबुल अदा हुए ।
मसअला : – अगर दैन से पहले साले निसाब रवाँ था यअनी जारी था तो जो दैन अस्नाए साल में यअनी साल के बीच में किसी पर लाजिम आया इसका साल भी वही करार दिया जायेगा जो पहले से चल रहा है वक्ते दैन से नहीं और अगर दैन से पहले इस जिन्स की निसाब का साले रवी नहीं तो वक्त दैन से शुमार होगा ।
मसअला : – किसी पर दैन कवी या मुतवस्सित है और कर्ज ख्वाह का इन्तेकाल हो गया तो मरते वक़्त इस दैन की ज़कात की वसीयत ज़रूरी नहीं कि इसकी ज़कात वाजिबुल अदा थी ही नहीं और वारिस पर ज़कात उस वक्त होगी जब मूरिस की मौत को एक साल गुज़र जाये और चालीस दिरहम देने कवी में और दो सौ दिरहम देने मुतवस्सित में उसूल हो जायें ।
मसअला : – साल पूरा होने के बाद दाइन ( कर्ज देने वाले ) ने दैन माफ कर दिया या साल पूरा होने से पहले ज़कात का माल हिबा कर दिया तो ज़कात साकित हो गयी । दुई नुसार ) मसमला : – औरत ने महर का रुपया वुसूल कर लिया साल गुजरने के बाद शौहर ने कब्ले दुखूल ( जिमा से पहले ) तलाक दे दी तो निस्फ महर वापस करना होगा और ज़कात पूरे की वाजिब है और शौहर पर वापसी के बाद से साल का एअतिबार है ।
मसअला : – एक शख्स ने यह इकरार किया कि फलाँ का मुझ पर दैन है और उसे दे भी दिया फिर साल भर बाद दोनों ने कहा दैन न था तो किसी पर ज़कात वाजिब न हुई ( आलमगीरी ) मगर जाहिर यह है कि यह उस सूरत में है जबकि इसके ख्याल में दैन हो वरना अगर महज ज़कात साकित करने के लिये यह हीला ( बहाना किया तो इन्दल्लाह यअनी अल्लाह के नज़दीक मुआखज़ा ( पकड़ ) का मुस्तहक है । मसअला : – माले तिजारत में साल गुज़रने पर जो कीमत होगी उसका एअतिबार है मगर शर्त यह है कि शुरूअ साल में उसकी कीमत दो सौ दिरहम से कम न हो और अगर मुख़्तलिफ किस्म के असबाब हों तो सब की कीमतों का मजमूआ साढ़े बावन तोले चाँदी या साढ़े सात तोले सोने की कद्र हो । ( आलमगीरी ) यअनी जबकि उसके पास यही माल हो और अगर उसके पास सोने चाँदी इसके अलावा हो तो उसे मिला लेंगे । मसला : – गल्ला या कोई माले तिजारत साल पूरा होने पर दो सौ दिरहम का है फिर नर्ख ( भाव ) बढ़ – घट गया तो अगर इसी में से ज़कात देना चाहें तो जितना उस दिन यअनी घटने – बढ़ने के दिन था उसका चालीसवाँ हिस्सा दे दें और अगर इस कीमत की कोई और चीज़ देना चाहे तो वह कीमत ली जाये जो साल पूरा होने के दिन थी और अगर वह चीज़ साल पूरा होने के दिन तर यअनी गीली थी अब खुश्क हो गयी जब भी वही कीमत लगायें जो उस दिन थी यअनी साल पूरा होने के दिन और अगर उस रोज़ खुश्क थी अब भीग गयी तो आज की कीमत लगायें । ( आलमगीरी )
मसअला : -कीमत उस जगह की होनी चाहिये जहाँ माल है और अगर माल जंगल में हो तो उस के करीब जो आबादी है वहाँ जो कीमत हो उस का एअतिबार है । ( आलमगीरी ) जाहिर यह है कि यह उस माल में है जिस की जंगल में खरीदारी न होती हो और अगर जंगल में खरीदा जाता हो जैसे लकड़ी और वह चीजें जो वहाँ पैदा होती हैं तो जब तक माल वहाँ पड़ा है वहीं की कीमत लगाई जाये ।
मसअला : – मसाला : – किराये पर उठाने के लिए देते हों उनकी ज़कात नहीं । यूँही किराये के मकान की रक्षामनगौरी ) घोड़े की तिजारत करता है झूल और लगाम और रस्सियाँ वगैरा इसलिये ख़रीदीं कि घोड़ों की हिफाजत में काम आयेंगी तो इनकी जकात नहीं और अगर इसलिये खरीदीं कि घोड़े इनके समेत बेचे जायेंगे तो इनकी भी जकात दे । नानबाई ने रोटी पकाने के लिये लकड़ियाँ खरीदी या रोटी में डालने को नमक खरीदा तो इनकी जकात नहीं और रोटी पर छिड़कने को तिल खरीदे तो तिलों की जकात वाजिब है ।
मसला : – एक शख्स ने अपना मकान तीन साल के लिए तीन सौ दिरहम साल के किराये पर दिया और उसके पास कुछ नहीं है और जो किराये में आता है सब को महफूज रखता है तो आठ महीने गुजरने पर निसाब का मालिक हो गया कि आठ माह में दो सौ दिरहम किराये के हुए । लिहाज़ा आज से जकात का साल शुरू होगा और साल पूरा होने पर पाँच सौ दिरहम की ज़कात दे कि बीस माह का किराया पाँच सौ हुआ अब उसके बाद एक साल और गुजरा तो आठ सौ की जकात दे मगर पहले साल की ज़कात के साढ़े बारह दिरहम कम किये जायें ( आलमगीरी ) बल्कि आठ सौ में चालीस कम की ज़कात वाजिब होगी कि चालीस से कम की ज़कात नहीं बल्कि अफ्व ( माफ ) है ।
मसअला — एक शख्स के पास सिर्फ एक हजार दिरहम हैं और कुछ माल नहीं । उसने सौ दिरहम सालाना किराये पर दस साल के लिये मकान लिया और वह कुल रुपये मालिके मकान को दे दिए तो पहले साल में तो नौ सौ की ज़कात दे कि सौ किराये में गए । दूसरे साल आठ सौ की बल्कि पहले साल की जकात के साढ़े बाइस दिरहम आठ सौ में से कम कर के बाकी की ज़कात दे । इसी तरह हर साल में सौ रुपये और पिछले साल की ज़कात के रुपये कम कर के बाकी की जकात इसके ज़िम्मे है और . मालिके मकान के पास भी अगर इस किराये के हजार के सिवा कुछ न हो तो दो साल तक कुछ नहीं । दो साल गुज़रने पर अब दो सौ का मालिक हुआ । तीन बरस पर तीन सौ की ज़कात दे । यूँही हर साल सौ दिरहम की जकात बढ़ती जायेगी मगर अगली बरसों की ज़कात की मिकदार कम करने के बाद बाकी की ज़कात वाजिब होगी । सूरते मजकूरा में अगर उस कीमत की कनीज़ किराए में दी तो किरायेदार पर कुछ वाजिब नहीं और मालिके मकान पर उसी तरह वुजूब है जो दिरहम की सूरत में है । ( आलमगीरी )
मसअला : – तिजारत के लिए गुलाम कीमती दो सौ दिरहम का दो सौ में खरीदा और कीमत बेचने वाले को दे दी मगर गुलाम पर कब्जा न किया यहाँ तक कि एक साल गुज़र गया अब वह बेचने वाले के यहाँ मर गया तो बेचने वाले और खरीदार दोनों पर दो – दो सौ की ज़कात वाजिब है और अगर गुलाम दो सौ दिरहम से कम कीमत का था और खरीदार ने दो सौ पर लिया तो बेचने वाला दो सौ की ज़कात दे और खरीदार पर कुछ नहीं । ( आलमगीरी )
मसअला : – खिदमत का गुलाम हज़ार रुपये में बेचा और कीमत पर कब्जा कर लिया साल भर बअद वह गुलाम ऐबदार निकला इस बिना पर वापस हुआ काज़ी ने वापसी का हुक्म दिया हो या इसने खुद अपनी खुशी से वापस ले लिया हो हज़ार की ज़कात दे । ( आलमगीरी )
मसला : – रुपये के एवज़ खाना गल्ला कपड़ा वगैरा फकीर को देकर मालिक कर दिया तो जकात अदा हो जायेगी मगर उस चीज़ की कीमत जो बाजार भाव से होगी वह जकात में समझी जायेगी बाहरी खर्चे मसलन बाज़ार से लाने में जो मजदूर को दिया है या गाँव से मंगवाया तो किराया और चुंगी कम न करेंगे या पकवा कर दिया तो पकवाई या लकड़ियों की कीमत मुजरा न करें । बल्कि इस पकी हुई चीज की जो कीमत बाजार में हो उस का एअतिबार है । ( आलमगीरी )
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