हुजुर मुफ्तिये आज़म की ज़िंदगी
पोस्ट 05
आप का पहला फतवा :- आप ने सिर्फ तेहरा 13 साल की क़लील उमर में रज़ाअत का मसला लिखा बादे फरागत आला हज़रत रहमतुल्लाह अलैह की हयाते तय्यबा में ही फतवा नवेसी का काम सौंप दिया गया था जिस की इब्तिदा यानि शुरू का वाक़िअ बड़ा दिल चस्प है
हज़रत अल्लामा ज़फरुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह व हज़रत मौलाना सय्यद अब्दुर रशीद साहब रहीमा हुमुल्लाह दारुल इफ्ता में काम करते थे अभी आप की नो उमरी का आलम था एक दिन दारुल इफ्ता में पहुंचे तो देखा के हज़रत अल्लामा ज़फरुद्दीन बिहारी रहमतुल्लाह अलैह फतवा लिख रहे थे
मराजे के लिए फतावा रज़विया अलमारी से निकलने लगे इस पर हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया क्या फतावा रज़विया देख कर जवाब लिखते हैं |
मौलाना ने फ़रमाया अच्छा तुम बगैर देखो लिखदो तो जाने हज़रत ने कमल बर्दाश्त जवाब लिख दिया जो रज़ाअत का मसला था ये आप का पहला फतवा था जो अपनी ज़िन्दगी में क़लम बंद फ़रमाया इसलाहो तसही के लिए वो जवाब इमामे अहले सुन्नत की ख़िदमात में पेश किया गया सेहत जवाब पर इमामे अहले सुन्नत बहुत खुश हुए और “अल जवाब बी ओनिल्लाहिल अज़ीज़िल वह्हाब” लिख कर दस्त खत फरमाए यही नहीं बल्के इनआम के तौर पर “अबुल बरकात मुहीयुद्दीन जिलानी आले रहमान मुहम्मद उर्फ़ मुहम्मद मुस्तफा रज़ा” की मुहर मौलाना हाफ़िज़ यक़ीनुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह के भाई से बनवा कर अता फ़रमाई ये वाक़िअ 1328 हिजरी का है बाराह 12 साल तक वालिद माजिद की ज़िन्दगी में फतवा नवेसी करते रहे जिस का सिसिला आखरी उमर तक जारी रहा ये मुहर हज़रत के तीसरे हज मौके पर जद्दा में दीगर सामानो के साथ गम हो गई |
आप का अख़लाक़ो किरदार व खुसूसी आदतें :- हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द रहमतुल्लाह अलैह उस खानवादे के चश्मों चिराग हैं जिन्होंने ज़माने के तहज़ीब व अख़लाक़, उख़ुवत मसावाते इस्लामी का दरस दिया जिन का दर हर मांगता के लिए हर वक़्त खुला रहता है आप में खुश अख़लाक़ी शफ़क़त तवाज़ो इंकिसारी और मुहब्बत व इखलास बदर्जाए अतम पाए जाते थे आप ने कभी किसी गरीब की दावत के रद नहीं फ़रमाया अमीरो कबीर और बड़े लोगों से दूर भागते थे और निहायत ही पाकीज़ा और बुलंद किरदार के मालिक थे |
आप की हयाते तय्यबा में एक बार अकबर अली खान साहब जो यूपी के गवर्नर थे जो आप की ज़यरत करना चाहते थे |
मगर हज़रत उन के आने से कुछ देर पहले पुराना शहर बरेली में एक बीमार दम तोड़ते हुए गरीब सुन्नी की इआदत के लिए तशरीफ़ लेगए |
इसी तरह फखरुद्दीन अली अहमद साबिक़ सदर जम्हूरिया जब वज़ीर थे इसी तरह न जाने कितने वज़ीर और अमीर आते रहते थे मगर हज़रत उन से मिलना गवारा नहीं करते थे क्यूंकि हज़रत के सियासत दुनियादारी से क्या लगाओ मेहमान की खातिर दारी में कोई कसर नहीं उठा रखते, हज़रत मेहमान खाने में तसरीफ ले जाकर एक एक मेहमान से दरयाफ्त फरमाते के खाना खाया के नहीं चाय मिली या नहीं अक्सर ये भी देखा गया के आप खुद ही मेहमानो के लिए घर के अंदर से जाकर खाने का तशत लेकर आते थे |
हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द रहमतुल्लाह अलैह हर मुस्लमान को ज़ाहिर व बातिन दोनों हालातों में मुस्लमान देखना चाहते थे हर एक को इस्लामी शिआर अपनाने की तालीम उठते बैठते देते थे दाढ़ी मुंडों नग्गे सर वालों और अंग्रेजी लिबास पहिनने वालों से बेज़ारी का इज़हार फरमाते सर पर टोपी लगाने दाढ़ी रखने और इस्लामी लिबास पहिनने की तलक़ीन करते थे |
ताई बांधने वाले से सख्त बेज़ारी इज़हार करते थे |
और ताई खींच लेते बांधने वालों से तौबा कराते थे और उस पे तज्दीदे बैअत व तज्दीदे निकाह का हुक्म लगते थे हर काम या चीज़ के लेने देने का दाहिने हाथ से एहतिमाम फरमाते गौरमिंट को सरकार कहने और कोर्ट को अदालत कहने से मना फरमाते थे |
क़ुतुब अहादीस पर दूसरी किताबें नहीं रखते थे क़िब्ले की तरफ कबि नहीं थूकते और नहीं क़िब्ले की तरफ पाऊँ करते |
क़ब्रिस्तान में जब भी तशीरफ़ ले जाते तो पूरा पैर रख कर नहीं चलते बल्के हमेशा पंजो लके बल तशरीफ़ ले जाते यहाँ तक के धूप में आधा आधा घंटा इसाले सवाब और फातिहा ख्वानी में मसरूफ रहते लेकिन पंजो के बल ही खड़े रहते |
बद फाल निकलने को हमेशा मना करते उलमा की बहुत इज़्ज़त करते सय्यदों का अदब व एहतिराम इस अंदाज़ से करते जैसे कोई रियाया अपने बादशाह का एहतिराम करती है गैर इस्लामी नाम रखने को मना करते और अंग्रेज़ों और गैर मुस्लिमो के नाम रखने को मना फरमाते सख्त नाराज़ होते और नाम बदल देते |
अब्दुल्लाह, अब्दुर रहमान, मुहम्मद, अहमद नाम को पसंद फरमाते |
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