जकात के अहम मसायल #02

मसअला : – ज़कात का रुपया मुर्दे की तजहीज़ व तकफीन यअनी कफन – दफन या मस्जिद की तामीर में नहीं सर्फ ( खच ) कर सकते कि तमलीके फकीर नहीं पायी गई यशुनी यहाँ पर फकीर को मालिक बनाना न पाया गया और इन कामों में सर्फ करना चाहें तो उसका तरीका यह है कि फकीर को मालिक कर दें और वह सर्फ करे सवाब दोनों को होगा बल्कि हदीस में आया अगर सौ हाथों में सदका गुज़रा तो सब को वैसा ही सवाब मिलेगा जैसा देने वाले के लिए और उसके अन्ज में कुछ कमी न होगी । दुल मुहतार )

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मसअला : – ज़कात अलानिया और जाहिर तौर पर देना अफज़ल है और नपल सदका छिपा कर देना अफज़ल है । ( आलमगीरी ) ज़कात में ऐलान . इस वजह से है कि छिपा कर देने में लोगों को तोहमत और बदगुमानी का मौका मिलेगा और एलान करने से लोगों को तरगीद होगी कि उसको देख कर और लोग भी देंगे मगर यह ज़रूर है कि रिया न आने पाये यअनी दिखावा न हो सवाब जाता रहेगा बल्कि गुनाह व अज़ाब का मुस्तहक होगा ।

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मसला : – ज़कात देने में इसकी ज़रूरत नहीं कि फकीर को ज़कात कह कर दे बल्कि सिर्फ ज़कात की नियत कर लेना काफी है यहाँ तक कि अगर हिबा या . कर्ज कह कर दे और नियत ज़कात की हो अदा हो गई । ( आलमगीरी ) यूँही नज़र या हदया या पान खाने या बच्चों के मिठाई खाने या ईदी के नाम से दी अदा हो गयी । बाज़ मुहताज़ जरूरतमन्द ज़कात का रुपया नहीं लेना चाहते उन्हें ज़कात का कह कर दिया जायेगा तो नहीं लेंगे लिहाज़ा जकात का लफ्ज़ न कहें ।

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मसाला – जकात अदा नहीं की थी और अब बीमार है तो अब वारिसों से छुपा कर दे और अगर न दी थी और अब देना चाहता है मगर माल नहीं जिससे अदा करे और यह चाहता है कि कर्ज लेकर अदा करे तो अगर गालिब गुमान कर्ज़ अदा हो जाने का है तो बेहतर यह है कि कर्ज लेकर अदा करे वरना नहीं कि हुकूकुल इबाद हुकूकुल्लाह से बहुत सख्त हैं । ( हुल नुकतार )

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मसअला : – मालिके निसाब साल पूरा होने से भी पहले अदा कर सकता है ब – शर्ते कि साल पूरा होने पर भी उस निसाब का मालिक रहे और अगर साल खत्म होने पर एक निसाब न रहा या साल के दरमियान में वह माले निसाब बिल्कुल हलाक हो गया तो जो कुछ दिया नफ्ल है और जो शख्स निसाब का मालिक न हो वह जकात नहीं दे सकता यअनी अगर आइन्दा निसाब का मालिक हो गया तो जो कुछ पहले दिया है वह उसकी ज़कात में शुमार न होगा । ( आलमगीरी )

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मसला : – मालिके निसाब अगर पहले से चन्द निसाबों की ज़कात देना चाहता है तो दे सकता है यअनी शुरू साल में एक निसाब का मालिक है और दो या तीन निसाबों की ज़कात- दे दी और साल खत्म होने तक एक ही निसाब का मालिक रहा साल के बाद और हासिल किया तो जकात उसमें शुमार न होगी । ( आलमगीरी ) मसअला : – मालिके निसाब पहले से चन्द साल की भी जकात दे सकता है । ( आलमगीरी ) लिहाजा मुनासिब है कि थोड़ा – थोड़ा ज़कात में देता रहे और साल खत्म होने पर हिसाब करे और अगर जकात पूरी हो गयी तो बहुत अच्छा और कुछ कमी है तो अब वह फौरन दे दे , देर करना जाइज़ नहीं न इसकी इजाज़त है कि अब थोड़ा – थोड़ा कर के अदा करे बल्कि जो कुछ बाकी है कुल फौरन अदा कर दे और ज्यादती को जकात में जोड़ ले ।

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मसअला : – एक हजार का मालिक है और दो हज़ार की ज़कात दी और नियत यह है कि साल खत्म होने पर अगर एक हज़ार और हो , गये तो यह उसकी है वरना आइन्दा साल में शुमार होगी यह जाइज़ है । ( आलमगीरी )

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मसअला : – यह गुमान करके कि पाँच सौ रुपये हैं पाँच सौ की जकात दी फिर मझुलूम हुआ कि चार ही सौ थे तो जो ज़्यादा दिया है आइन्दा साल में शुमार कर सकता है । ( जानिया )

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मसअला : – किसी के पास सोना चाँदी दोनों हैं और साल खत्म होने से पहले एक की ज़कात दे दी तो वह दोनों की ज़कात है यअनी दरमियाने साल में उनमें से एक हलाक हो गया अगर्चे वही जिसकी नियत से ज़कात दी है तो जो रह गया है उसकी ज़कात यह हो गई और अगर उसके पास गाय , बकरी ऊँट सब ब – कद्रे निसाब हैं और पहले से उनमें एक की ज़कात दी तो जिसकी जकात दी उसी की है दूसरे की नहीं यअनी जिसकी ज़कात दी है अगर दरमियाने साल में उसकी निसाब जाती रही तो वह बाकियों की ज़कात नहीं करार दी जायेगी । ( आलमगीरी )

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मसअला : – साल के दरमियान जिस फकीर को ज़कात दी थी साल खत्म होने पर वह मालदार हो गया या मर गया या मआजल्लाह मुरतद हो गया तो ज़कात पर उस का कुछ असर नहीं वह अदा हो गई , जिस शख्स पर ज़कात वाजिब है अगर वह मर गया तो साकित हो गयी यअनी उसके माल से ज़कात देना जरूर नहीं , हाँ अगर वसीयत कर गया तो तिहाई माल तक वसीयत नाफिज़ ( जारी ) है और अगर आकिल बालिग दुरसा इजाज़त दे दें तो कुल माल से जकात अदा की जाये । ( दुरै मुरझार )

जकात के अहम मसाइल #1

मसाला : – शयए मरहून ( गिरवी रखी हुई चीज ) की ज़कात न मुरतहिन ( जिस के पास गिरवी रखी गयी ) पर है न राहिन ( गिरवी रखने वाले ) पर । मुरतहिन तो मालिक ही नहीं और राहिन की मिल्के ताम ( यानी पूरा कब्जा ) नहीं कि उसके कब्जे में नहीं और रहन छुड़ाने के बाद भी इन बरसों की जकात वाजिब नहीं । ( दुरै मुख्तार वगैरा )

मसअला :- जो माल तिजारत के लिए खरीदा और साल भर तक उस पर कब्ज़ा न किया तो कब्जे से पहले मुश्तरी ( खरीदार ) पर जकात वाजिब नहीं और कब्जे के बद उस साल की भी ज़कात वाजिब है । दुरै मुद्रतार रहुल मुहतार ) निसाब का दैन से फारिग होना ।

मसला : – निसाब का मालिक है मगर उस पर दैन है कि अदा करने के बाद निसाब नहीं रहती तो ज़कात वाजिब नहीं वाह वह दैन बन्दे का हो जैसे कर्ज ज़रे समन ( कीमत में देने वाला रुपया या सामान ) किसी चीज़ का तावान या अल्लाह तआला का दैन हो जैसे ज़काते खिराज मसलन कोई शख्स सिर्फ एक निसाब का मालिक है और दो साल गुज़र गये कि ज़कात नहीं दी तो सिर्फ पहले साल की ज़कात वाजिब है दूसरे साल की नहीं कि पहले साल की ज़कात इस पर दैन है इसके निकालने के बअद निसाब बाकी नहीं रहती , लिहाज़ा दूसरे साल की ज़कात वाजिब नहीं । यूँ ही अगर तीन साल गुज़र गये मगर तीसरे में एक साल की बाकी थी कि पाँच दिरहम और हासिल हुये जब भी पहले ही साल की ज़कात वाजिब है कि दूसरे और तीसरे साल में ज़कात निकालने के बअद निसाब बाकी नहीं , हाँ जिस दिन कि वह पाँच दिरहम हासिल हुए उस दिन से एक साल तक अगर निसाब बाकी रह जाये तो अब इस साल के पूरे होने पर ज़कात न दी फिर सारे माल को हलाक कर दिया फिर और माल . हासिल किया कि यह बकद्रे निसाब है मगर साले अब्बल की ज़कात जो इसके ज़िम्मे दैन है उसमें से निकालें तो निसाब बाकी नहीं रहती तो इस नये साल की जकात वाजिब नहीं और अगर उस पहले माल को इसने कस्दन ( जानबुझ कर ) हलाक न किया बल्कि बिला कस्द हलाक हो गया तो उसकी ज़कात जाती रही । लिहाज़ा उसकी ज़कात दैन नहीं तो उस सूरत में इस नये साल की ज़कात वाजिब है । ( आलमगीरी , दुल मुहतार )

मसअला : – अगर खुद मदयून ( कर्जदार ) नहीं मगर मदयून का कफील ( ज़मानती ) है और कफालत यानी अगर ज़ैद रुपया नहीं देगा तो मैं ज़िम्मेदार हूँ जिसे जमानत में लेना कहते हैं तो ज़मानत के रुपये निकालने के बाद निसाब बाकी नहीं रहती ज़कात वाजिब नहीं मसलन जैद के पास हज़ार रुयये हैं और अम्र ने किसी से हज़ार कर्ज लिये और ज़ैद ने उसकी कफालत की तो जैद पर इस सूरत में ज़कात वाजिब नहीं कि जैद के पास अगर्चे रुपये हैं मगर अम्र के कर्ज में मुस्तगरक ( घिरे हुए ) हैं कि कर्जख्वाह को इख्तियार है ज़ैद से मुतालबा करे और रुपये न मिलने पर यह इख़्तियार है कि ज़ैद को कैद करा दे तो यह रुपये दैन में मुसतगरक हैं । लिहाज़ा ज़कात वाजिब नहीं और अगर अम्र की दस शख्सों ने कफालत की और सब के पास हज़ार – हज़ार रुएये हैं जब भी उनमें से किसी पर ज़कात वाजिब नहीं कि कर्जख्वाह हर एक से मुतालबा कर सकता है और न मिलने की सूरत में जिस को चाहे कैद करा I ( दुल मुहतार )

मसअला : जो दैन मिआदी हो वह मज़हबे सही में वुजूबे ज़कात का माने नहीं यअनी ऐसा दैन होने पर ज़कात वाजिब रहती है ( रहुल मुहतार ) चूँकि आदतन दैन महर का मुतालबा नहीं होता

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रोज़े की वह सूरते जिनमे कफ़्फ़ारा लाज़िम हो जाता है

उन सूरतों का बयान जिन में कफ्फारा भी लाज़िम है

मसाला : – रमज़ान में रोज़ादार मुकल्लफ मुकीम ने कि अदाए रमज़ान के रोजे की नियत से रोज़ा रखा और किसी आदमी के साथ जो काबिले शहवत है उसके आगे – पीछे के मकाम में जिमा किया इन्जाल हुआ हो या नहीं या उस रोज़ादार के साथ जिमा किया गया या कोई गिजा या दवा खाई या पानी पिया या कोई चीज लज्जत के लिए खाई या पी या कोई ऐसा फेल ( काम ) किया जिससे इफ्तार का गुमान न होता हो और उसने गुमान कर लिया कि रोज़ा जाता रहा फिर जानबूझ कर खा पी लिया मसलन फस्द या पछना लिया या सुर्मा लगाया या . जानवर से वती की या औरत को छुआ या बोसा लिया या साथ लिटाया या मुबाशरते फाहिशा की मगर इन सब सूरतों में इन्जाल न हुआ या पाखाने के मकाम मे अन्दर खुश्क उंगली रखी अब इन अफआल ( कामों ) के बाद कस्दन खा लिया तो इन सब सूरतों में रोजे की कजा और कफ्फारा दोनों लाज़िम है और अगर उन सूरतों में कि इफ्तार का गुमान न था और उसने गुमान कर लिया अगर किसी मुफ्ती ने फतवा दे दिया था कि रोज़ा जाता रहा और मुफ्ती ऐसा हो कि अहले शहर का उस पर एअतिमाद हो उसके फतवा देने पर उसने कस्दन खा लिया या उसने कोई हदीस सुनी थी जिसके सही मना न समझ सका और उस गलत मना के लिहाज से जान लिया कि रोज़ा जाता रहा और कस्दन खा लिया तो अब कफ्फारा लाजिम नहीं अगर्चे मुफ्ती ने गलत फतवा दिया या जो हदीस उसने सुनी साबित न हो । ( दुई मुगार मगरा )

मसाला : – जिस जगह रोजा तोड़ने से कफ्फारा लाज़िम आता है उसमें शर्त यह है कि रात ही से रमज़ान के रोजे की नियत की हो अगर दिन में नियत की और तोड़ दिया तो कफ्फारा लाज़िम नहीं ।

मसअला : – मुसाफिर सुबहे सादिक के बद जहवए कुबरा से पहले वतन को आया और रोजे की नियत कर ली फिर तोड़ दिया या मजनून इस वक़्त होश में आया और रोजे की नियत कर के फिर तोड़ दिया तो कफ्फारा नहीं । ( आलमगीरी )

मसअला : – कफ्फारा लाज़िम होने के लिए यह भी ज़रूरी है कि रोज़ा तोड़ने के बाद कोई ऐसा काम न हुआ हो जो रोजे के मुनाफी खिलाफ हो या बगैर इख्तियार ऐसा काम न पाया गया हो जिसकी वजह से रोजा इफ्तार करने ( तोड़न ) की रुखसत होती मसलन औरत को उसी दिन हैज़ या निफास आ गया या रोजा तोड़ने के बअद उसी दिन ऐसा बीमार हो गया जिसमें रोजा न रखने की इजाज़त है तो कफ्फारा साकित है और सफर से साकित न होगा कि यह इख्तियारी अम्र ( काम ) है यअनी अगर कोई जानबूझ कर रमज़ान शरीफ का रोज़ा रख कर बिला वजहे शरई तोड़ दे फिर ख्याल करके मुझ पर कफ्फारा फर्ज़ न हो शरई सफर में चला जाये मसलन बरेली शरीफ से मारहरा शरीफ सफर करे बीच में कहीं न रुके जब भी कफ्फारा फर्ज़ है इसलिए कि उस शख्स ने यह सफर खुद से इख्तियार किया ताकि अपनी . हरामकारी पर सज़ा पाने से बच जाये मगर बचेगा हरगिज़ नहीं । यूँही अगर अपने को ज़ख्मी कर लिया और हालत यह हो गई कि रोज़ा नहीं रख सकता कपफारा साकित न होगा । ( जौहरा )

मसला : – वह काम किया जिससे कफ्फारा वाजिब होता है फिर बादशाह ने उसे सफर पर मजबूर किया कफ्फारा न होगा । ( आलमगीरी ) मसला : – मर्द को मजबूर करके जिमा कराया या औरत को मर्द ने मजबूर किया फिर जिमा ही के दरमियान में अपनी खुशी से मशगूल रहा या रही तो कफ्फारा लाज़िम नहीं कि रोज़ा तो पहले ही – टूट चुका है । ( जौहरा ) मजबूरी से मुराद इकराहे शरई है जिसमें कत्ल या उज्व काट डालने या ज़र्वे शदीद ( बहुत सख्त मार ) की सही धमकी दी जाये और रोज़ादार भी समझे कि अगर मैं इस का कहना न मानूँगा तो जो कहता है कर गुजरेगा ।

मसअला : -कफ्फारा लाज़िम होने के लिए भर पेट खाना ज़रूरी नहीं थोड़ा सा खाने से भी वाजिब हो जायेगा । ( जौहरा )

मसअला : – तेल लगाया या गीबत की फिर यह गुमान कर लिया कि रोज़ा जाता रहा या किसी आलिम ही ने रोज़ा जाने का फतवा दे दिया अब उसने खा पी लिया जब भी कफ्फारा लाज़िम है । दुरै मुखतार ) मसला : – ” के ” आयी या भूलकर खाया पिया या जिमा किया और इन सब सूरतों में उसे मलूम था कि रोजा न गया फिर उसके बाद खा लिया तो कफ्फारा लाज़िम नहीं और अगर एहतिलाम हुआ और उसे मलूम था कि रोज़ा न गया फिर उसके बाद खा लिया तो कफ्फारा लाज़िम है । ( हुल मुहतार )

मसला : – जिन सूरतों में रोज़ा तोड़ने पर कफ्फारा लाज़िम नहीं उनमें शर्त है कि एक ही बार ऐसा हुआ हो और मअसीयत ( गुनाह ) का इरादा न किया हो वरना उनमें कफ्फारा देना होगा ( दुरै मुरार )

मसला : – कच्चा गोश्त खाया अगर्चे मुदीर का हो तो कफ्फारा लाज़िम है मगर जबकि सड़ा हो या उसमें कीड़े पड़ गये हों , तो कफ्फारा नहीं । ( हुल मुहतार )

हवाला :- बहारे शरीयत जिल्द 05

रोज़ा तोड़ने वाली चीजों का बयान ??

मसअला : – खाने – पीने जिमा करने से रोज़ा जाता रहता जबकि रोज़ादार होना याद हो । ( आम्लए कुतुब )

मसला : – हुक्का सिगार , सिगरेट , चर्स पीने से रोज़ा जाता रहता है अगर्चे अपने ख्याल में हल्क तक धूआँ न पहुँचाता हो बल्कि पान या सिर्फ तम्बाकू खाने से भी रोज़ा जाता रहेगा अगर्चे पीक थूक दी हो कि उसके बारीक अजज़ा ज़रूर हल्क में पहुंचते हैं ।

मसला : – शकर वगैरा ऐसी चीजें जो मुँह में रखने से घुल जाती हैं मुँह में रखीं और निगल गया रोज़ा जाता रहा । यूँही दाँतों के दरमियान कोई चीज़ चने के बराबर या ज्यादा थी उसे खा गया या कम ही थी , मगर मुँह से निकाल कर फिर खा ली या दाँतों से खून निकल कर हल्क से नीचे उतरा और खून थूक से ज़्यादा या बराबर था या कम था मगर उसका मज़ा हल्क में महसूस हुआ तो इन सब सूरतों में रोज़ा जाता रहा और अगर कम था और मज़ा भी महसूस न हुआ तो नहीं । दरमुकार )

मसअला : – रोजे में दाँत उखड़वाया और खून निकल कर हल्क से नीचे उतरा अगर सोते में ऐसा हुआ तो रोजे की कजा वाजिब है । ( हुल मुहतार

मसला : – कोई चीज़ पाखाने के मकाम में रखी अगर उसका दूसरा सिरा बाहर रहा तो नहीं टूटा वरना जाता रहा , लेकिन अगर वह तर है और उसकी रुतूबत ( तरी ) अन्दर पहुँची तो मुतलकन जाता रहा यही हुक्म औरत की शर्मगाह का है । शर्मगाह से मुराद इस बाब में फर्जे दाखिल है , यूँही अगर डोरे में बोटी बाँधकर निगल ली और डोरे का दूसरा किनारा बाहर रहा और जल्द निकाल ली कि गलने न पाई तो नहीं गया और अगर दूसरा . किनारा भी अन्दर चला गया या बोटी का कुछ हिस्सा अन्दर रह गया तो रोज़ा जाता रहा । ( आलमगीरी )

मसला : – औरत ने पेशाब के मकाम में रूई या कपड़ा रखा और बिल्कुल बाहर न रहा रोज़ा जाता रहा , और खुश्क उंगली पाखाने के मकाम में रखी या औरत ने शर्मगाह में तो रोज़ा न गया और भीगी थी या उस पर कुछ लगा था तो जाता रहा बशर्ते कि पाखाने के मकाम में उस जगह रखी हो जहाँ अमल देते यअनी पाखाने के मकाम में दवा डालते वक्त हुकना का सिरा रखते हैं । कादरी दारुल शाबत 548 )

मसला : – मुबालगें के साथ इस्तिन्जा किया यहाँ तक कि हुकना रखने की जगह तक पानी पहुँच पाँची हिस्सा गया रोजा जाता रहा और इतना मुबालगा चाहिए भी नहीं कि इससे सखा बीमारी का अन्देशा है । मुनगार ) मसला : – मर्द ने पेशाब के सूराख में पानी या तेल डाला तो रोज़ा न गया अगर्चे मसाने तक पहुँच गया हो और औरत ने शर्मगाह में टपकाया तो जाता रहा । ( आलमगीरी )

मसला : – दिमाग या शिकम ( पेट ) की झिल्ली तक जखम है उसमें दवा डाली अगर दिमाग या शिकम तक पहुंच गई रोज़ा जाता रहा ख्वाह वह दवा तर हो या खुश्क और अगर मझुलूम न हो कि दिमाग या शिकम तक पहुँची या नहीं और दवा तर थी जब भी जाता रहा और खुश्क थी तो नहीं मिलनीस

मसला : – हुकना लिया या नथनों से दवा चढ़ाई या कान में तेल डाला या तेल चला गया रोज़ा जाता रहा और पानी कान में चला गया या डाला तो नहीं । ( आलमगीरी )

मसाला : – कुल्ली कर रहा था कि बिलाकस्द पानी हल्क से उतर गया या नाक में पानी चढ़ाया और दिमाग को चढ़ गया रोज़ा जाता रहा मगर जब कि सेज़ा होना भूल गया हो तो न टूटेगा अगर्चे कस्दन ( जानबूझ कर ) हो । यूही किसी ने रोज़ादार की तरफ कोई चीज़ फेंकी वह उसके हल्क में चली गयी रोज़ा जाता रहा । ( आलमगीरी )

मसअला : – सोते में पानी पी लिया या कुछ खा लिया या मुँह खुला था और पानी का कतरा या ओला हल्क में जा रहा रोज़ा जाता रहा । जौढरा , मालमगीरी ) मसअला : – दूसरे का थूक निगल गया या अपना ही थूक हाथ पर लेकर निगल गया रोज़ा जाता रहा । ( आलमगीरी )

मसला : – डोरा बटा उसे तर करने के लिए मुँह पर गुजारा फिर दोबारा व तिबारा यूँही किया रोज़ा न जायेगा मगर जबकि डोरे से कुछ रुतूबत जुदा होकर मुँह में रही और धूक निगल गया तो रोजा जाता रहा । ( जोहरा )

मसअला : – आँसू में चला गया और निगल लिया अगर कतरा दो कतरा है तो रोज़ा न गया और ज्यादा था कि उसकी नमकीनी पूरे मुँह में महसूस हुई तो जाता रहा । पसीना का भी यही हुक्म है । ( आलमगीरी )

मसला : – पाखाने का मकाम बाहर निकल पड़ा तो हुक्म है कि कपड़े से खूब पोंछकर उठे कि तरी बिल्कुल बाकी न रहे और अगर पानी उस पर बाकी था और खड़ा हो गया कि पानी अन्दर चला गया तो रोज़ा फासिद हो गया । इसी वजह से फुकहाए किराम फरमाते हैं रोज़ादार इस्तिन्जा करने में साँस न ले । ( आलमगीरी )

मसअला : -औरत का बोसा लिया या छूआ या मुबाशरत ( यहाँ मुबाशरत से मुराद चूमना वगैरा है ) की या गले लगाया और इन्जाल हो गया यानी मनी बाहर हो गई तो रोज़ा जाता रहा । और औरत ने मर्द को छुआ और मर्द को इन्जाल हो गया तो रोज़ा न गया । औरत को कपड़े के ऊपर से छुआ और कपड़ा इतना मोटा है कि बदन की गर्मी महसूस नहीं होती तो फासिद न हुआ अगर्चे इन्जाल हो गया । ( आलमगीरी )

नोट :- हमारे प्यारे नबी की अज़मत पर पहरा देना हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है । अगर आज हम हुजूर की अज़मत पर पहरा ना दे सके तो हमारा मर जाना ही बेहतर है। हदीस में जब तक कोई अपनी जान से ज्यादा मोहब्बत ना करे वो कामिल मुस्लिम हो नही सकता । आज अगर हमारे बाप माँ भाई रिश्तेदार या दोस्त को कोई बुरा भला कह दे तो हम उसकी जान के दुश्मन बन जाते है लेकिन जब बात हुजूर की अज़मत की है तो आज क्यो हमारी जुबान बन्द है याद रखो मुसलमानों अगर आज हम खामोश रह गए तो ये तश्दूद करने वाले जालिम हमारे घरों में घुस जाएंगे वो दिन दूर नही । इस लिए आवाज़ उठाओ हुजूर की अज़मत के लिए आवाज़ बुलंद करो हुजूर की शान के लिए ये मत देखो की कौन आवाज़ उठा रहा है और कौन नही हम को अपना फर्ज अदा करना है । मौत तो यकीनन आनी ही है अब हम को तय करना है कि हम कैसे मरेंगे बुजदिल की तरह चुप रह कर या हुजूर की अज़मत पर पहरा देते हुए अल्लाह तमाम मुसलमानों की ईमान की हिफाज़त करे और तमाम को हुजूर की अज़मत पर पहरेदारी करने की तौफीक व अफिक अता करे आमीन

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रोज़ा के अहम मसाइल #5??

ऐ मुसलमानों अल्लाह और रसूल के लिए अपने आप को अपने खानदान और मालोज़र को कुर्बान करने हमेशा तैयार रहो

मसअला :- गुस्ल किया और पानी की खुनकी अन्दर महसूस हुई या कुल्ली की और पानी बिल्कुल फेंक दिया सिर्फ कुछ तरी मुँह में बाकी रह गयी थी थूक के साथ उसे निगल गया या दवा कूटी और हल्क में उसका मज़ा महसूस हुआ या हड़ चूसी और थूक निगल गया मगर थूक के साथ हड़ का कोई जुज़ हल्क में न पहुँचा या कान में पानी चला गया या तिनके से कान खुजाया और उस पर कान का मैल लग गया फिर वही मैल लगा हुआ तिनका कान में डाला अगषे चन्द बार किया कादरी दारुल इशाबत

मक्खी हल्क वहारे शरीअत पाँचवा हिस्सा हो या दाँत या मुँह में खफीफ ( बहुत थोड़ी ) चीज़ मअमूली सी रह गई कि लुआब के साथ खुद ही उतर जायेगी और वह उतर गई या दाँतों में खून निकलकर हल्क तक पहुँचा मगर हल्क से नीचे न उतरा तो उन सब सूरतों में रोज़ा न गया । ( दुरै मुखतार फतहुल कदीर )

मसमला : रोज़ादार के पेट में किसी ने नेज़ा या तीर भोंक दिया अगर्चे उसकी भाल या पैकान ( फल ) पेट के अन्दर रह गई , या उसके पेट में झिल्ली तक ज़ख़्म था किसी ने कंकरी मारी कि अन्दर चली गयी तो रोज़ा नहीं टूटा और अगर खुद उसने यह सब किया और भाल या पैकान या कंकरी अन्दर रह गयी तो जाता रहा । ( दुरै मुख्तर रहुल मुहतार )

मसला : – बात करने में थूक से होंट तर हो गये और उसे पी गया , मुँह से राल टपकी मगर तार टूटा न था उसे चढ़ा कर पी गया नाक में रेठ आ गयी बल्कि नाक से बाहर हो गई मगर मुनकता ( अलग ) न हुई थी कि उसे चढ़ा कर निगल गया या खंकार मुँह में आया और खा गया अगर्चे कितना ही हो रोज़ा न जायेगा मगर इन बातों से एहतियात चाहिये । ( आलमगीरी , दुरै मुरार रहुल मुहतार )

मसअला चली गयी रोजा न गया और कस्दन निगली तो जाता रहा । ( आलमगीरी ) मसअला :- गैरे सबीलैन में जिमा किया ( शर्म गाहों के अलावा मज़ा हासिल किया ) तो जब तक इन्जाल न हो रोज़ा न टूटेगा । यूँही हाथ से मनी निकालने में अगर्चे यह सख्त हराम हैं कि हदीस में उसे मलऊन फ़रमाया । ( दुर मख्तार )

मसअला : चौपाया या मुर्दा से जिमा किया और इन्जाल न हुआ तो रोज़ा न गया और इन्जाल हुआ तो जाता रहा मादा जानवर का बोसा लिया या उसकी फर्ज ( फर्ज पेशाब की जगह ) को छुआ तो रोज़ा न गया अगर्चे इन्ज़ाल हो गया । ( दुरे मुख़्तार ) ( अगर्चे यह काम गैर इस्लामी व नाजाइज़ हैं ( कादरी )

मसला : – एहातेलाम हुआ या गीबत की तो रोज़ा न गया अगर्चे गीबत बहुत सख्त कबीरा गुनाह है कुआन मजीद में गीबत करने की निस्बत ग़ीबत ज़िना से भी सख्त तर है अगर्चे गीबत की वजह से रोज़े की नूरानियत जाती रहती है । ( दुरै मुख्तार वगैरा )

मसअला : – जनाबत की हालत में सुबह की बल्कि अगर्चे सारे दिन जुनुब रहा रोज़ा न गया मगर इतनी देर तक कस्दन ( जान बूझ कर ) गुस्ल न करना कि नमाज़ कज़ा हो जाये गुनाह व हराम है । हदीस में फरमाया कि जुनुब ( वे – गुस्ला ) जिस घर में होता है उसमें रहमत के फ़रिश्ते नहीं आते । ( दुरै मुखवार ) मसला : – जिन्न यअनी परी से जिमा किया तो जब तक इन्जाल न हो रोज़ा न टूटेगा । ( रडुल मुहतार ) यअनी जबकि इन्सानी शक्ल में न हो और इन्सानी शक्ल में हो तो वही हुक्म है जो इन्सान से जिमा करने का है ।

मसला : – तिल या तिल के बराबर कोई चीज़ चबाई और थूक के साथ हल्क से उतर गई तो रोजा न गया मगर जबकि उसका मज़ा हल्क में महसूस होता हो तो रोज़ा जाता रहा ! ( फतहुल कदीर )

हवाला बहारे शरीयत जिल्द 5

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किन काम से रोज़ा नही जाता ??

हदीस न .1 : – सही बुख़ारी मुस्लिम में अबू हुरैरा रदियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं रोज़ादार ने भूलकर खाया या पिया वह अपने रोज़े को पूरा करे कि उसे अल्लाह ने खिलाया और पिलाया । हवाला बहारे शरीयत

तम्बीह : – इस बाब में उन चीजों का बयान है जिन से रोज़ा नहीं टूटता रहा यह अम्र ( बात ) कि उनसे रोज़ा मकरूह भी होता है या नहीं उससे इस बाब को तअल्लुक नहीं न यह कि फेल जाइज़ है या नाजाइज़ ।

मसअला : – भूलकर खाया या पिया या जिमा किया रोज़ा फासिद न हुआ ख़्वाह वह रोज़ा फ़र्ज़ हो या नफल और रोज़े की नियत से पहले यह चीजें पाई गयीं या बअद में मगर जब याद दिलाने पर भी याद न आया कि रोज़ादार है तो अब फासिद हो जायेगा ब – शर्ते कि याद दिलाने के बअद यह अफआल वाके हुए हों मगर इस सूरत में कफ्फारा लाज़िम नहीं । ( दुरै मुतार , रहुल मुहतार )

मसअला : – किसी रोज़ादार को इन अफआल में देखे तो याद दिलाना वाजिब है याद न दिलाया तो गुनाहगार होगा मगर जबकि वह रोज़ादार बहुत कमज़ोर हो कि याद दिलायेगा तो वह खाना छोड़ देगा और कमज़ोरी इतनी बढ़ जायेगी कि रोज़ा रखना दुश्वार होगा और खा लेगा तो रोज़ा भी अच्छी तरह पूरा कर लेगा और दीगर इबादतें भी ब – खूबी अदा कर लेगा तो इस सूरत में याद न दिलाना बेहतर है । बाज़ मशाइख ने कहा जवान को देखे तो याद दिला दे और बूढ़े को देखे तो याद न दिलाने में हरज नहीं मगर यह हुक्म अकसर के लिहाज़ से है कि जवान अकसर कवी होते हैं और बूढ़े अक्सर कमज़ोर और अस्ल हुक्म यह है कि जवानी और बुढ़ापे को कोई दखल नहीं बल्कि कुब्बत व जुअफ ( कमज़ोरी ) का लिहाज़ है । लिहाज़ा अपर जवान इस कद्र कमजोर हो तो याद न दिलाने में हुरज नहीं और बूढ़ा कवी हो तो याद दिलाना वाजिब । ( रदुल मुहतार )

मसअला : – मक्खी या धूल या गुबार हल्क में जाने से रोज़ा नहीं टूटता ख्वाह वह गुबार आटे का हो कि चक्की पीसने या आटा छानने में उड़ता है या गल्ले का गुबार हो या हवा से ख़ाक उड़ी या जानवरों के खुर या टाप से गुबार उड़ कर हल्क में पहुँचा अगर्चे रोज़ादार होना याद था और अगर खुद कस्दन धुआँ पहुँचाया तो फासिद हो गया जबकि रोज़ादार होना याद हो ख़्वाह वह किसी चीज़ का धुआँ हो और किसी तरह पहुँचाया हो यहाँ तक कि अगर की बत्ती वगैरा खुशबू सुलगती थी उसने मुँह करीब करके धुंए को नाक से खींचा रोज़ा जाता रहा । यूँही हुक्का पीने से भी रोज़ा टूट जाता है अगर रोज़ा याद हो और हुक्का पीने वाला अगर पीये तो कफ्फारा भी लाज़िम आयेगा ।

मसअला :- भरी सिंगी लगवायी या तेल या सुर्मा लगाया तो रोज़ा न गया अगर्चे तेल या सुमें का मज़ा हल्क में महसूस होता ‘ हो बल्कि थूक में सुर्मे का रंग भी दिखाई देता हो जब भी नहीं टूटा । मसला : – बोसा लिया मगर इन्जाल न हुआ तो रोज़ा नहीं । टूटा यूही औरत की तरफ बल्कि उसकी शर्मगाह की तरफ नज़र की मगर हाथ न लगाया और इन्जाल हो गया अगर्चे बार – बार नज़र करने या जिमा वगैरा के ख्याल करने से इन्जाल हुआ अगर्चे देर तक ख्याल जमाने से ऐसा हुआ हो उन सब सूरतों में रोज़ा नहीं टूटा । ( जौहरा , दुरै मुखार )

बहारे शरीयत जिल्द 5

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रोज़े के मुताल्लिक जानकारी और मसले

हदीस :- इने माजा हज़रते अनस रदियल्लाहु तआला अन्हु से रावी कहते हैं रमज़ान आया तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया यह महीना आया इसमें एक रात हज़ार महीनों से बेहतर है जो इससे महरूम रहा हर चीज़ से महरूम रहा और उसकी खैर से वही महरूम होगा जो पूरा महरूम है ।

मसअला : – दिन में नियत करे तो यह ज़रूर है क यह नियत करे कि मैं सुबहे सादिक से रोज़ादार हूँ और अगर यह नियत है कि अब से रोज़ादार हूँ सुबह से नहीं तो रोज़ा न हुआ । ( जौहरा , रदुल मुहतार )

मसअला :- अगर्चे उन तीन किस्म के रोज़े की नियत दिन में भी हो सकती है मगर रात में नियत कर लेना मुसतहब है । ( जौहरा ) यूँ नियत की कि कल कहीं दवत हुई तो रोज़ा नहीं और न हुई तो रोज़ा है यह नियत सही नहीं बहरहाल वह रोज़ादार नहीं । ( आलमगीरी )

मसला : — रमज़ान के दिन में न रोजे की नियत है न यह कि रोज़ा नहीं अगर्चे मालूम है कि यह महीना रमज़ान का है तो रोज़ा न हुआ । ( आलमगीरी )

मसअला : – रात में नियत की और फिर उसके बअद रात ही में खाया पिया तो नियत जाती न रही वही पहली काफ़ी है फिर से नियत करना ज़रूरी नहीं । ( जौहरा ) मसअला : – हैज व निफास वाली थी उसने रात में कल रोज़ा रखने की नियत की और सुबहे सादिक से पहले हैजे व निफास से पाक हो गई तो रोज़ा सही हो गया । ( जौहरा )

मसअला :- दिन में वह नियत काम की . है कि सुबहे सादिक से नियत करते वक़्त तक रोज़े के खिलाफ कोई अम्र ( काम ) न पाया गया हो । लिहाज़ा अगर सुबहे सादिक़ के बअद भूलकर पी लिया हो या जिमा ( हमबिस्तरी ) कर लिया तो अब नियत नहीं हो सकती । ( जौहरा ) मगर मोअतमद . यह है कि भूलने की हालत में अब भी नीयत सही है । ( रदुल मुहतार )

मसअला : – जिस तरह नमाज़ में कलाम की नियत की मगर बात न की तो नमाज़ फ़ासिद न होगी यूँही रोज़ा में तोड़ने की नियत से रोज़ा नहीं टूटेगा जब तक तोड़ने वाली चीज़ न करे । ( जौहरा )

मसअला : – अगर रात में रोज़े की नियत की फिर पक्का इरादा कर लिया कि नहीं रखेगा तो वह नियत जाती रही अगर नई नियत न की और दिन भर भूका प्यासा रहा और जिमा ( हमबिस्तरी ) से बचा तो रोज़ा न हुआ । ( दुरै मुखयार रहुल मुहतार )

मसअला :- सहरी खाना भी नियत है ख्वाह रमज़ान के रोज़े के लिए हो या किसी और रोजे के लिए मगर जब सहरी खाते वक़्त यह इरादा है कि सुबह को रोज़ा न होगा तो सहरी खाना नियत नहीं । ( जौहरा रहुलमुहतार )

मसअला : – रमज़ान के हर रोज़े के लिए नई नियत की ज़रूरत है पहली या किसी तारीख में पूरे रमज़ान के रोजे की नियत कर ली तो यह नियत सिर्फ उसी एक दिन के हक में है बाकी दिनों के लिए नहीं । ( जौहरा )

मसअला : – यह तीनों यअनी रमज़ान के अदा और नफ्ल व नज़रे मुअय्यन मुतलकन रोजे की नियत से हो जाते हैं खास इन्हीं की नियत ज़रूरी नहीं । यूँही नफ़्ल की नियत से भी अदा हो जाते हैं बल्कि गैरे मरीज़ व गैरे मुसाफ़िर ने रमज़ान में किसी और वाजिब की नियत की जब भी उसी रमज़ान का होगा । ( दुरै मुख्तार वगैरा )

हवाला बहारे शरीयत हिंदी जिल्द 05 पेज 74

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ईमान व अक़ीदे से ज्यादा अमल को अहमियत देना ???

हमारे काफी अवाम भाई किसी की ज़ाहिरदारी कोई अच्छा काम देखकर उसकी तारीफ करने लगते हैं और (प्रभावित) हो’ जाते हैं जबकि इस्लामी नुक़्तए नज़र से कोई नेकी उस वक़्त तक कारआमद नही जब तक कि उसका ईमान व अक़ीदा दुरूस्त न हो।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जब ऐलाने नवुब्बत फ़रमाया था तो पहले नमाज, जकात ,रोजा, हज और अहकाम व आमाल का हुक्म नहीं दिया था बल्कि यह फ़रमाया था कि अल्लाह तआला को एक मानो, बुतों की पूजा व परस्तिश से बाज आओ और मुझको अल्लाह का रसूल मानो I आज भी जब किसी गैर मुस्लिम को मुसलमान करते है तो सबसे पहले उसको नमाज रोजे अदा करने अच्छाईयाँ करने और बुराईयाँ छोडने का हुक्म नहीं दिया जाता बल्कि पहले कलिमा पढा कर मुसलमान किया जाता है फिर बाद में अच्छाईयाँ बुराईयॉऔर अहकाम ए इस्लाम से उसको आगाह किया जाता है I
हदीस शरीफ़ में है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि अगर कोई शख्स उहद पहाड़ के बराबर भी सोना राहे खुदा में खर्च करे,खुदाए तआला कबूल नही फरमायेगा,जब तक कि वह तकदीर पर ईमान न लाये। (मिश्कात शरीफ सफा २३)
इस हदीस से खूब वाजेह हो गया कि जो इस्लाम के लिए जरूरी अकाइद न रखता हो उसकी कोई नेकी, नेकी नहीं ।
क़ुरान करीम मे भी फरमाने खुदावन्दी है ‘”यह क़ुरान हिदायत है मुत्तकिन(तक़वे वालों) के लिए जो बगैर देखे ईमान लाये है, और नमाज़ अदा करते और हमारे दिये हुए माल मे से (हमारी राह में) खर्च करते हैं'”।
इस आयते करीमा में भी अल्लाह तआला ने नमाज़ राहे ख़ुदा में खर्च करने से पहले ईमान का ज़िक्र फ़रमाया है।
खुलासा यह है कि जिस शख्स का ईमान व अक़ीदा दुरूस्त न हो या वह गैर इस्लामी ख्यालात व अक़ाइद रखता हो उससे कभी मुतास्सिर (प्रभावित) नही होना चाहिये न उसकी तारीफ करना चाहिये चाहे वह कितने ही अच्छे काम करे ।
क़ुरान करीम में गैर इस्लामी अक़ाइद रखने वाले की नेकियां और उनके कारनामो को बेकार व फ़ुज़ूल फ़रमाया गया है और इस की मिसाल उस गुबार से दी गई है जो किसी चट्टान पर लग जाती है फिर उसे बारिश धोकर बहा देती है और उसका नाम व निशान तक बाकी नही रहता ।

क्या रमजान की रातों में शौहर और बीवी का हमबिस्तर होना गुनाह है?

अपने माल की पूरी जकात अदा जरूर करे ।

अवाम में कुछ लोग ऐसा ख्याल करते हैं हालांकि यह उनकी गलतफहमी है । माहे रमज़ान में इफ़्तार के वक़्त से सहरी तक रात में जिस तरह खाना पीना जाइज़ है , उसी तरह बीवी और शौहर का हमबिस्तर होना और सुहबत व मुजामअत बिला शक जाइज़ है और बकसरत अहादीस से साबित है बल्कि कुरआन शरीफ में खास इसकी  इजाज़त के लिए आयते करीमा नाज़िल फरमाए गई ।

इरशादे बारी तआला है ::-

तर्जमा >तुम्हारे लिए रोज़े की रातों में  औरतों से सुहबत हलाल की गई वह तुम्हारे लिए लिबास है तुम उनके लिए लिबास ।
( पारा 2 , रूकू 7)

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क्या नापाक रहने से रोजा नहीं होता / टूट जाता है

क्या नापाक रहने से रोज़ा टूट जाता है?

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अगर कोई शख्स रोज़ा रखकर दिन में नापाक रहें और इस नापाकी की वजह से उसकी नमाज़ छुटती है तो उसके ऊपर नमाज़ छोड़ने का गुनाहे अज़ीम होगा क्योंकि फ़र्ज़ नमाज़ छोड़ना इस्लाम में बड़ा गुनाह और जहन्नम का रास्ता है ।
       लेकिन इस नापाकी का उसके रोज़े पर कोई असर नहीं पड़ेगा यानी रोज़ा हो जायेगा । यह ख्याल रखना की नापाकी की हालत में रोज़ा नहीं होगा गलतफहमी है ।  पाक  रहना नमाज़ के लिए शर्त है और रोज़े के लिए नहीं चाहे दिन भर नापाक रहे तब भी रोज़ा बाकी रहेगा लेकिन यह नापाक रहना मोमिन की शान नहीं क्योंकि इस तरह नमाजें कज़ा  होंगी ।

अहदीसे करीमा की रोशनी में इस मसअले की तहक़ीक़ व तफ़सील जिसे देखना हो वह फतावा रज़विया ,  जिल्द न• 4, सफहा 615 को देखें ।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 72)

जिस औरत के ज़िना का हमल हो उससे निकाहजाइज़ है⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬ज़ानिया हामिला यानी वह औरत जो बिना निकाह किए ही गर्भवती हो गई हो उससे निकाह को कुछ लोग नाजायज़ समझते हैं हालांकि वह जाइज़ है । ज़िना इस्लाम में बहुत बड़ा गुनाह है और इसकी सज़ा बहुत सख्त है लेकिन अगर किसी औरत से ज़िनाकारी सरज़द हुई , उससे निकाह किया जाये तो निकाह सही हो जाएगा,ख्वाह वह ज़िना से हामला हो गई हो जबकि वह औरत शौहर वाली न हो और निकाह अगर उसी शख्स से हो जिसका हमल है तो निकाह के बाद वह दोनों साथ रह सकते हैं , सुहबत व हमबिस्तरी भी कर सकते हैं और किसी दूसरे से निकाह हो तो जब तक बच्चा पैदा न हो जाए दोनों लोगों को अलग रखा जाए और उनके लिए हमबिस्तरी जाएज़ नहीं ।⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵इमामे अहले सुन्नत सय्यिदी आला हजरत फरमाते हैं⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇जो औरत मआज़ल्लाह ज़िना से हामिला हो उससे निकाह सही है ख्वाह उस ज़ानी से हो या गैर से फ़र्क़ इतना है अगर ज़ानी से निकाह हो तो वह बादे निकाह उससे कुर्बत भी कर सकता है और गैर ज़ानी से हो तो वज़ए हमल तक( बच्चा पैदा होने तक) कुर्बत न करे।( फतावा रज़विया जिल्द 5 ,सफ़हा 199, फतावा अफ्रीका ,सफ़हा 15)

जवान लड़के लड़कियों की शादी में देर करना⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬आजकल जवान लड़के लड़कियों को घर में बिठाए रखना और उनकी शादी में ताखीर करना आम हो गया है इस्लामी नुक़्तए नज़र से यह गलत बात है ।हदीसे पाक में है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम इरशाद फरमाते हैंजिस की लड़की 12 बरस की उम्र को पहुंचे और वह उसका निकाह ना करें फिर वह लड़की गुनाह में मुब्तला हो तो वह गुनाह उस शख्स पर है (मिश्कात शरीफ सफहा 271)ऐसी ही हदीस लड़कों के बारे में भी आई हैआजकल की फुज़ूल रस्मो और बेजा ख़र्चों ने भी शादियों को मुश्किल कर दिया है जिसकी वजह से भी बहुत सी जवान लड़कियां अपने घरों में बैठी हुई है और लड़के मालदारो की लड़कियों की तलाश में बूढ़े हुए जा रहे हैं इन खर्चों पर कंट्रोल करने के लिए जगह-जगह तहरीके चलाने और तन्ज़ीमे बनाने की जरूरत है चाहे वह अपनी अपनी बिरादरी की सतह पर ही काम किया जाए तो कोई हर्ज नहीं । भाइयों ! दौर काम करने का है सिर्फ बातें मिलाने या नारे लगाने और मुशायरे सुनने से कुछ हासिल ना होगा शादी ब्याह में कम से कम खर्च करने का माहौल बनाओ ताकि ज्यादा से ज्यादा मर्द और औरतें शादीशुदा रहे ।कुछ लोग आला तालीम हासिल कराने के लिए लड़कियों की उम्र ज्यादा कर देते हैं उन्हें वह गैर शादीशुदा रहने पर मजबूर कर देते हैं वह भी निरी हिमाकत और बेवकूफी है ।आजकल मुसलमानों में कुछ बदमज़हब और बातिल फिरके जवान लड़कियों की आला तालीम के लिए मदारिस और स्कूल खोलने में बहुत कोशिश कर रहे हैं । उनका मकसद अपने बातिल और मखसूस गैर-इस्लामी अक़ाइद मुसलमानों में फैलाने के अलावा और कुछ नहीं है और इधर लोगों में आजकल औलाद से मोहब्बत इस कदर बढ़ गई है कि हर शख्स कोशिश में है मेरी लड़की मेरा लड़का पता नहीं क्या-क्या बन जाए आला तालीम के नशे सवार है और बनता तो कोई कुछ नहीं लेकिन अक्सर बुरे दिन देखने को मिलते हैं लड़के ज्यादा पढ़ कर बाप बन रहे हैं लड़कियां माँ बन रही है।हो सकता है कि हमारी इन बातों से कुछ लोगों को इख्तिलाफ हो मगर हमारा मशवरा यही है लड़कियों को आला तालीम से बाज़ रखा जाये , खासकर जब कि यह तालीम शादी की राह में रुकावट हो और पढ़ने पढ़ाने के चक्कर में अधेड़ कर दिया जाता हो और खासकर गरीब तबके के लोगों में क्योंकि उनके लिए पढ़ी लिखी लड़कियां बोझ बन जाती है क्योंकि उनके लिए शौहर भी ए क्लास और आला घर के होना चाहिए और वह मिल नहीं पाते कोई मिलता भी है तो वह जहेज़ मे मारुती कार मोटरसाइकिल का तालिब है बल्कि बारात से पहले एक दो लाख रूपये का सवाल करता है ।हिंदुस्तान गवर्नमेंट जो बच्चों को ऊँची तालीम दिलाने पर ज़ोर दे रही है , उसके लिए मेरा मशवरा है कि वह तालीम याफ्ता बच्चों की नौकरी व मुलाज़िमत की ज़िम्मेदारी ले या उनके वज़ीफ़े मुतय्यन करे। खाली पढ़ा कर छोड़ देना ,न घर का रखा न बाहर का,न खेत का न दफ्तर का। यह गरीबों के साथ ज़ुल्म है और समाज की बर्बादी है।(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 83)

हदीस क्या हैं ?? हदीस किसे कहते है? हदीस की कितनी किसमे है ?? सबक 7 से 10

Sabaq 7

Sahih Leghairihi  . ٭صحیح لغیرہ٭

Puri Tareef Sahih Lezatihi Ki Hogi, Sirf Isme Rawioyn Ke Zabt Me Kami Hogi Yani Jis Riwayat Me Puri Shartein Sahih Lezatihi Ki Ho, Bas Rawi Ke Zabt Me Agar Kami Hai Magar Yeh Kami Dusri Sahih Sanad Ke Support Milne Se Puri Ho Jaaye To Wo Sahih Leghairihi Ke Category Me Aa Jayegi.

Hasan Hadees Ke Bhi 2 Iqsam Hain.

Hasan Lezatihi: .      ٭حسن لزاتہ٭

Yani Jis Riwayat Me Puri Shartein Sahih Lezatihi Ki Ho, Bas Rawi Ke Zabt Me Agar Kami Hai Ya Apni Haisiat Me Sahih Lezatihi Se Kamtar Hai. Magar Kisi Sahih Lezatihi Ki Sanad Ki Tadaad Badhane Ke Liye Isko Pesh Kiya Jaa Sakta Hai.

Hasan Legairihi: حسن لغیرہ
Jiski Sanad Me Koi Rawi Zaeef/Majhool/Mudallis Ho, Magar Dusri Sanad Se Us Rawi Ki Mutabeat Ho Jaaye.

Sabaq 8

Shaaz Wa Munkir Ki Ta’reef:

Shaaz: Koi Siqah Rawi Jab Apne Se Zyada Siqah Rawi Ki Mukhalifat Kare Tab Marjooh Hadees Shaaz Hogi Aur Raajeh Hadees Ko Mahfooz Kaha Jayega.

Hadees Munkir: Jab Koi Zaeef Rawi Kisi Dusre Siqah Rawi Ki Mukhalifat Kare Tab Marjooh Hadees Munkir Kehlayegi Aur Agli Hadees Ma’roof Hogi.

Shaaz Wa Munkir Me Ye Halka Sa Farq Hai Yaad Kar Len.

Ye Dono Zaeef Ki Qism Me Se Hain.

Sabaq 9

Shaaz Hadees Ki Misaal

Aksar Ghair Muqallideen (GM) Apne Baatil Aqeede Ko Sabit Karne Ke Liye Ye Hadees Pesh Karte Hain.

Sahih Muslim Me Maujud Riwayat ALLAH Kahan Hai Ki Sanad Is Tarah Hai:

33 – (537) حَدَّثَنَا أَبُو جَعْفَرٍ مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ، وَأَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، – وَتَقَارَبَا فِي لَفْظِ الْحَدِيثِ – قَالَا: حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، عَنْ حَجَّاجٍ الصَّوَّافِ، عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي كَثِيرٍ، عَنْ هِلَالِ بْنِ أَبِي مَيْمُونَةَ، عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَسَارٍ، عَنْ مُعَاوِيَةَ بْنِ الْحَكَمِ السُّلَمِيِّ، قَالَ: بَيْنَا أَنَا أُصَلِّي مَعَ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، إِذْ عَطَسَ رَجُلٌ مِنَ الْقَوْمِ، فَقُلْتُ: يَرْحَمُكَ اللهُ فَرَمَانِي الْقَوْمُ بِأَبْصَارِهِمْ، فَقُلْتُ: وَاثُكْلَ أُمِّيَاهْ، مَا شَأْنُكُمْ؟ تَنْظُرُونَ إِلَيَّ، فَجَعَلُوا يَضْرِبُونَ بِأَيْدِيهِمْ عَلَى أَفْخَاذِهِمْ، فَلَمَّا رَأَيْتُهُمْ يُصَمِّتُونَنِي لَكِنِّي سَكَتُّ، فَلَمَّا صَلَّى رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَبِأَبِي هُوَ وَأُمِّي، مَا رَأَيْتُ مُعَلِّمًا قَبْلَهُ وَلَا بَعْدَهُ أَحْسَنَ تَعْلِيمًا مِنْهُ، فَوَاللهِ، مَا كَهَرَنِي وَلَا ضَرَبَنِي وَلَا شَتَمَنِي، قَالَ: «إِنَّ هَذِهِ الصَّلَاةَ لَا يَصْلُحُ فِيهَا شَيْءٌ مِنْ كَلَامِ النَّاسِ، إِنَّمَا هُوَ التَّسْبِيحُ وَالتَّكْبِيرُ وَقِرَاءَةُ الْقُرْآنِ» أَوْ كَمَا قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قُلْتُ: يَا رَسُولَ اللهِ، إِنِّي حَدِيثُ عَهْدٍ بِجَاهِلِيَّةٍ، وَقَدْ جَاءَ اللهُ بِالْإِسْلَامِ، وَإِنَّ مِنَّا رِجَالًا يَأْتُونَ الْكُهَّانَ، قَالَ: «فَلَا تَأْتِهِمْ» قَالَ: وَمِنَّا رِجَالٌ يَتَطَيَّرُونَ، قَالَ: ” ذَاكَ شَيْءٌ يَجِدُونَهُ فِي صُدُورِهِمْ، فَلَا يَصُدَّنَّهُمْ – قَالَ ابْنُ الصَّبَّاحِ: فَلَا يَصُدَّنَّكُمْ – ” قَالَ قُلْتُ: وَمِنَّا رِجَالٌ يَخُطُّونَ، قَالَ: «كَانَ نَبِيٌّ مِنَ الْأَنْبِيَاءِ يَخُطُّ، فَمَنْ وَافَقَ خَطَّهُ فَذَاكَ» قَالَ: وَكَانَتْ لِي جَارِيَةٌ تَرْعَى غَنَمًا لِي قِبَلَ أُحُدٍ وَالْجَوَّانِيَّةِ، فَاطَّلَعْتُ ذَاتَ يَوْمٍ فَإِذَا الذِّيبُ قَدْ ذَهَبَ بِشَاةٍ مِنْ غَنَمِهَا، وَأَنَا رَجُلٌ مِنْ بَنِي آدَمَ، آسَفُ كَمَا يَأْسَفُونَ، لَكِنِّي صَكَكْتُهَا صَكَّةً، فَأَتَيْتُ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَعَظَّمَ ذَلِكَ عَلَيَّ، قُلْتُ: يَا رَسُولَ اللهِ أَفَلَا أُعْتِقُهَا؟ قَالَ: «ائْتِنِي بِهَا» فَأَتَيْتُهُ بِهَا، فَقَالَ لَهَا: «أَيْنَ اللهُ؟» قَالَتْ: فِي السَّمَاءِ، قَالَ: «مَنْ أَنَا؟» قَالَتْ: أَنْتَ رَسُولُ اللهِ، قَالَ: «أَعْتِقْهَا، فَإِنَّهَا مُؤْمِنَةٌ»

(Sahih Muslim Baab Tehreemul Kalaam Jild-1 Pg.381)

Pehle Aap Sab Isko Sanad Padh Len Fir Matan Bhi Dekh Le Mai Mukhtasar Iska Ikhtilafi Masla Bata Deta Hu.
Ye Sanad Hazrat Jaariyah Radialla Taalla Anhu Se Aayi Hai Aur Iska Matan Yun Hai Ki Nabi ﷺ Ne Ek Laundi Ka Eiman Parakhne Ke Liye Usse Sawal Kiya “ALLAH Kahan Hai?” To Usne Jawab Diya “Asman Me”Aur Nabi ﷺ Ne Sunkar Farmaya: “Ye Ladki Momina Hai”

Isse GM Ye Sabit Krna Chahte Hain Ki “ALLAH Asman Me Hai”

Halaki Ye Aqeeda Baatil Hai Ki Koi ALLAH Ko Asman Par Ya Kisi Jagah Makhsus Par Maane.

Ab Jawab Mulahiza Kare:
Ye Riwayat “Shaaz” Hai.
Yani Iske Rawi Is Matan Ke Mamle Me Apne Se Behtar Rawiyo Ki Mukhalifat Kar Rahe Hain.
Aur Un Rawiyo Ki Hadees Imam Abdur Razzaq Ne Apni Musannaf Me Darj Kiya Hai. Isliye Un Behtar Rawiyo Ke Muqable Sahih Muslim Ki Ye Hadees Shaaz Ho Gayi Yani Ab Isse Dalil Nahi Pakdi Jayegi.

Ye Shaaz Isliye Ho Gayi Kyunki Iske Rawiyo Ke Zariye Bayan Karda Ye Matan Dusre Behtarin Rawiyo Ki Jamat Ke Muqable Tanha Reh Gaya.

Aur Dusre Rawiyo Ne Isse Alag Masle Ko Bayan Kiya Hai.
“Un Behtar Rawiyo Ka Matan Ye Kehta Hai Ki Nabi ﷺ  Ne Sawal Ye Pucha Tha Ki
“Kya Tu Gawahi Deti Hai Ki ALLAH Ke Siwa Koi Mabood Nahi”?
Usne Jawab Diya: “Haan Deti Hu”
(Musannaf Abdur Razzaq Jild 9 Pg.174-175)

Aur Yehi Alfaz Dusri Bahot Sari Kutub Me Maujud Hain.

Isse Hame Pata Chalta Hy Ki Muslim Ki Hadees Shaaz Hai Aur Shaaz Hadees Zaeef Ki Ek Qism Hoti Hai Isliye Ye Zaeef Hai Aur Qabil-E-Qubul Nahi Hai Jabki Iski Mahfuz Riwayat Hamare Pas Maujud Ho.

Sabaq  10

Khabar Maqbul Ki Dusri Qism

Khabar Maqbul Ki Pehli Qism Ruwaat(Rawi/Riwayat) Ke Etbar Se Thi. Aur Dusri Qism Ma’mool Ba  (معمول بہ)  Aur Ghair Ma’mool Ba (غیر معمول بہ)   Ke Lehaz Se Hai.

Is Tarah Khabar Maqbul Ki 4 Qisme Hain:
1: Mohkam محکم
2: Mukhtaliful Hadees   مختلف الحدیث
3: Nasikh Wa Mansukh  ناسخ و منسوخ
4: Mutawquf Feeh متوقف فیہ

1: Mohkam:
Jis Khabar Maqbul Ke Ma’aariz Koi Dusri Khabar Ya Hadees Na Mile Usey Mohkam Kehte Hain.

2: Mukhtaliful Hadees:
Jis Khabar Maqbul Ke Ma’aariz Koi Dusri Khabar Maqbul Ho Aur Dono Riwayaton Me Ba-Tareeq Etidaal Tatbeeq Dena Mumkin Ho. Usey Mukhtaliful Hadees Kehte Hain.
(Ye Waqt Aur Halaat Badalne Ki Wajah Se Hota Hai. Maslan Kisi Surat Me Ek Hadees Bayan Farmayi. Baad Me Kisi Hikmat Ke Sabab Usi Masle Par Dusri Hadees Bayan Farmayi Jo Pehle Wali Se Alag Nazar Aaye.Kyunki Hadees Me Bayan Hone Wale Masle Ki Wajah Amuman Nahi Likhi Hoti Sirf Masla Likha Hota Hai Isliye Apas Me Ba-Zahir Ta’aaruz Nazar Aata Hai)

Iski Misal: Nabi ﷺ Ne Farmaya, Koi Shai Kisi Ko Bimari Nahi Pahucha Sakti.. (Yani Touchable Disease Ki Tardeed Farmayi) Ek Shaks Ne Nabi ﷺ Se Guazrish Kit Hi Ki Agar Kharish Wala Oont Tandrust Se Milta Hai To Tandurust Ko Bhi Kahrish Ho Jaati Hai. Ispar Aap ﷺ Ne Farmaya: Pehle Wale Ko Kisne Kharish Pahuchayi? Is Tarah Aapne Bimari Se Bhagne Ko Mana Farmaya Hai. Yani Ye Taqdir Ilaahi Se Hai. Jis Tarah Usne Pehle Ko Paida Kiya Us Tarah Dusre Ko Bhi Paida Kar Sakta Hai.
Magar Aap ﷺ Ne Juzaami Se Bhagne Ka Hukm Farmaya Iska Sabab Ye Hai Ki Agar Juzaami Ke Ikhtilat Ki Wajah Se Dusre Ko Bhi Ibtida-E-Juzam Ho Gaya To Usko Ye Wehem Ho Jayega Ki Ye Us Shaks Juzaami Ke Ikhtilat Ki Wajah Se Hua Hai. Aur Ye Wehem Faasida Hai. Isliye Aise Wehem Se Bachane Ke Liye Isse Bhagne Ka Hukm Farmaya Hai.

3: Naasikh Wa Mansukh:
Jab Khabar Maqbul Ki Ma’aariz Khabar Maqbul Ho Aur Dono Me Tatbeeq Mumkin Na Ho Magar Tarikh Ya Nass Se Ek Ka Dusre Se Mutakhir Hona Sabit Ho To Mutakhir Yani Jo Baad Me Farmayi Gayi Usko Nasikh Aur Mutaqadim Yani Jo Pehle Farmayi Gayi Thi, Usko Mansukh Kaha Jayega.

Nasakh Ki Tareef:
Kisi Hukm-E-Sharaii Ko Kisi Aisi Dalil Se Utha Dena Jo Pichli Ke Baad Farmayi Gayi Ho, Nasakh Kehlata Hai. Aur Jo Dalil Isko Mansukh Kare Usko Nasikh Kehte Hain.
Isko Nasikh Kehna Sirf Majaazan Hai. Haqiqat Me Nasikh ALLAH Hi Hai Iski Ek Misal Sihaah Sitta Me Kayi Jagah Hai.

Nabi ﷺ Ne Farmaya :
Maine Tumhe Qabron Ki Ziyarat Se Mana Kiya Tha, Ab Tum Inki Ziyarat Kiya Karo Ki Ye Akhirat Ki Yaad Dilane Wali Aur Dil O Narm Karne Wali Hain. (Ibn Majah, Tirmizi)

Is Hadees Se Pata Chala Ki Pehle Nabi ﷺ Ki Aur Bhi Hadees Yaqinan Hongi Jinme Aapne Qabron Ke Talluq Se Mumaniyat Farmayi Thi.

नाविल & क़िस़्स़ा + कहानी की किताबों 📚 से और मोबाइल में टाइम खराब करने से बेहतर है कि दीनी किताबों 📚 का मुत़ालअः कर के (पढ़ कर) अपने इ़ल्म में इज़़ाफ़ः करें ‼️

ख़ास़ कर : जाइज़ नाजाइज़, ह़लाल ह़राम के मसाइल सीखें, हमें क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये, यह सीखें, ताकि गुनाह के कामों से बच कर और अच्छे काम करके अल्लाह ﷻ और उस के रसूल ﷺ को राज़़ी करें ‼️

अल्लाह तआ़ला ﷻ अपने ह़बीब ﷺ के वसीले से तमाम सुन्नी मुसलमानों को इ़ल्मे दीन सीखने और सिखाने की तौफ़ीक़ अ़त़ा फ़रमाये, और अ़मल करने की भी तौफ़ीक़ अ़त़ा फ़रमाये, और ख़ातिमः ईमान पर फ़रमाये, आमीन ‼️
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हदीस क्या है ?? हदीस किसे कहते है?? हदीस की कितनी किस्म है?? सबक 4 से 6 तक

Sabaq  4

٥ – حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، قَالَ: حَدَّثَنَا ابْنُ عُلَيَّةَ، عَنْ عَبْدِ العَزِيزِ بْنِ صُهَيْبٍ، عَنْ أَنَسٍ، عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، ح وحَدَّثَنَا آدَمُ، قَالَ: حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَنَسٍ، قَالَ: قَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ «لاَ يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ، حَتَّى أَكُونَ أَحَبَّ إِلَيْهِ مِنْ وَالِدِهِ وَوَلَدِهِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ»

٤ – حَدَّثَنَا أَبُو اليَمَانِ، قَالَ: أَخْبَرَنَا شُعَيْبٌ، قَالَ: حَدَّثَنَا أَبُو الزِّنَادِ، عَنِ الأَعْرَجِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «فَوَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ، لاَ يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّى أَكُونَ أَحَبَّ إِلَيْهِ مِنْ وَالِدِهِ وَوَلَدِهِ»

Is Pehli Hadees Me Do Asnad Hain

حدثنا يعقوب … عن انس
حدثنا آدم …عن انس

Or Dosri Hadees Same Matan Me Ek Sanad

(حدثنا ابو اليمان … عن ابو هريره

Isme Total 3 Asnad Hain Yani Ye Ishqe Rasool Wali Hadees Bhi Ghareeb Nahi Hai
Pehli Sanad Hazrat Qatada Ne Hazrat Anas Se Liya

Dono Sahabi Hain. Lekin Hazrat Qatada Ko Hazrat Anas Se Isliye Lena Pada Kyunki Unhone Khud Ye Hadees Nabi ﷺ Se Nahi Suni Hogi.

Aur Aage Jo Hadees Hy Woh Hazrat Abu Hurairah Radialla Taala Anhu Ki Sanad Se Hai Uske Matan Me Halka Sa Farq Hai Yeh Farq Kyu Hota Hai Iska Jawab Deta Hu.

Nabi ﷺ Ne Jab Ye Alfaz Bayan Farmaye Tab Wahan 2 Sahabi Ka Sunna Sabit Hua.

1: Hazrat Anas
2: Hazrat Abu Hurairah

Jab Hazrat Anas Ne Ye Hadees Bayan Kiya To Aage Wale Sabhi Raawi Mukammal Alfaz Bayan Karne Par Qadir Rahe.
Aur
والناس اجمعين

Tak Bayan Kar Diya

Aur Mumkin Hai Jab Hazrat Abu Hurairah Radialla Taala Anhu Ne Bayan Kiya To Yeh Alfaz Aage Wale Rawiyo Me Se Kisi Ki Kami Ki Wajah Se Chhut Gaye.

Is Tarah Itna Farq Ho Gaya.

Lekin Kyunki Pehli Hadees Dusre Ke Matan Ki Taeed Karti Hai. Isliye Jo Mukammal Hai Wo Raajeh Hai. Halaki Sanad Dono Ki Sahi Hain.

Sabaq 5

Tadad E Sanad Ke Etbar Se Quwwat E Hadees:

Kisi Ek Hadees Ki Jitni Zyada Isnad Hongi Hadees Utni Mazboot Hogi
Mazbooti K Lihaz Se Ye Tarteeb Hogi
1: Mutawatir
2: Mashhur
3: Aziz
4: Ghareeb

Sanad Zyada Hone Se Hadees Ke Gawah (Bataur Rawi) Barh Jate Hain

Isliye Zyada Gawaho Ki Waja Se Mazbuti Ka Yaqin Zyada Barh Jata Hy.

Sabaq 6

Abhi Hamne Tadad E Sanad Ke Etbar Se Hadees K Iqsam Parhe

Ab Riwayat  Ko Sehat Ke Etbar Se Iqsam Padhenge

Kisi Riwayat Ke Sehat Ke Etbar Se 4 Iqsam Hote Hain.

1: Sahih
2: Hasan
3: Zaeef
4: Mauzu

Phir Inme Har Ek Ke Apne Kuch Iqsam Hote Hain Wo Aage Padhaya Jayega Apne Maqam Pe In Sha ALLAH

Sahih Hadees Ke 2 Iqsam Hain

1: Sahih Lezatihi
2: Sahih Leghairihi

Tareef Sahih Lezatihi:
Jis Riwayat Ke Sabhi Rawi Aadil, Zaabit Ho, Sanad Mutassil Ho Yani Musannif Se Lekar Nabi ﷺ Tak Sare Rawi Ek Dusre Se Jude Hue Ho, Koi Rawi Bich Se Saqit Na Ho Aur Hadees Ka Matan Ghair Shaaz Ho.

Yani Koi Rawi Kisi Dusri Hadees Ke Behtar Rawi Ki Mukhalifat Na Karta Ho.
Aisi Hadees Sahih Lezatihi Hogi

Aadil Rawi Kaun Hai?
Ans: Yani Nek Muttaqi Imaandar Ho. Kisi Fisq-O-Bidat Me Uska Naam Na Shamil Ho.

Zabit Rawi Kaun Hai?
Ans: Yani Hadeeso Ko Itne Aachhe Se Zabt Kiya Ho Ki Jab Chahe Bayan Kar De Bila Kisi Rukawat Ke.

Rawi Saqit Na Ho Matlab Sanad Me Jis Tarah Rawiyo Ke Naam Tarteeb Se Likhe Ho Unki Apas Me Mulaqat Sabit Honi Chahiye

Agar Mulaqat Sabit Nahi Hai To Woh Ek Dusre Se Usuli Taur Pe Sanad Me Jud Nahi Sakte

To Aise Me Jab Zaid Ne Amru Se Mulaqat Kiya Hi Nahi To Usse Hadees Zaid Ko Kaise Mili?

Aur Jab Zaid Ko Usse Milna Muhal Hua To Zarur Dono Ke Beech Koi Aur Rawi Hoga Jiska Naam Sanad Me Gayab Hai.

Apas Me Mulaqat Na Hone Ki Kayi Wajah Ho Sakti Hain:
1: Dono Rawi Alag Alag Mulk Ke Ho Aur Kabhi Ek Dusre Ke Mulk Jane Ka Ittefaq Nahi Hua.
2: Amru Ka Inteqal 50 Hijri Me Hua Aur Zaid Ki Paidaish Hi 51 Hijri Me Ho To Bhi Kaise Mulaqat Ho Sakti Hai?
Aisi Aur B Wujuhat Hain Jo Aage Behes Ke Stages Par Bataya Jayega.

Rawi Saqit Hai To Yani Sanad Tuti Hui Hai. Mutassil Nahi Hai Aur Gayab Rawi Kaun Hai Hame Nahi Pata To Yeh B Nahi Pata Ki Woh Sachha Hai Ya Jhuta, Aadil Zabit Hai Ya Kamzor

Is Bina Pe Wo Hadees Mashkuk Ho Gayi Jisme Koi Rawi Gayab Hai. So Wo Hadees Zaeef Kehlayegi.

Pichle Sabaq Me Hamne Sahih Lezatihi Ki Definition Padhi Thi.

नाविल & क़िस़्स़ा + कहानी की किताबों 📚 से बेहतर है और मोबाईल में इधर उधर की बाते करने से अच्छा है कि दीनी किताबों 📚 का मुत़ालअः कर के (पढ़ कर) अपने इ़ल्म में इज़़ाफ़ः करें ‼️

ख़ास़ कर : जाइज़ नाजाइज़, ह़लाल ह़राम के मसाइल सीखें, हमें क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये, यह सीखें, ताकि गुनाह के कामों से बच कर और अच्छे काम करके अल्लाह ﷻ और उस के रसूल ﷺ को राज़़ी करें ‼️

अल्लाह तआ़ला ﷻ अपने ह़बीब ﷺ के वसीले से तमाम सुन्नी मुसलमानों को इ़ल्मे दीन सीखने और सिखाने की तौफ़ीक़ अ़त़ा फ़रमाये, और अ़मल करने की भी तौफ़ीक़ अ़त़ा फ़रमाये, और ख़ातिमः ईमान पर फ़रमाये, आमीन ‼️
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हदीस क्या है? किसे कहते है ? और हदीस की कितनी किसमे है सबक 2 व 3

Sabaq  2

Sanad Aur Matan

Sanad Kisey Kahte Hain?

Kisi Hadees Ko Nabi Sallallahu Alaihe Wasallam Se Kis Sahabi Ne Suna Phr Unse Kisne Suna Phr Unse Kisne Suna Ye Silsila Barhte Hue Muhaddis/Musannif Tak Aajata Hai.

Is Tarah Muhaddis Tak Woh Hadees Jitne Logo Ke Zariye Hokar Pahuchi, Un Sare Logon Ki Ek Chain Banti Hai Us Chain Ko Hi Sanad Kehte Hain.

Maslan Imam Bukhari Ki Paidaish 194 Hijri Me Hui Aap Jab Bade Hue Phir Aapne Hadeesein Likhna Shuru Kiya

Zahir Baat Hai Ki Aapne Na To Hadees Us Daur Me Nabi ﷺ Se Suni Ho Sakti Hai Aur Na Kisi Sahabi Se Kyunki Sahaba Ka Zamana Bhi Riwayato Ke Mutabiq 109 Hijri Me Khatm Ho Gaya Tha.

Toh  Zarur Imam Bukhari Ko Ye Riwayat Jis Ustad Se Mili Us Ustad Ne Bhi Apne Ustad Se Suna Hoga Aur Phir Unhone Apne Ustad Phir Ye Silsila Tabaiee Phir Sahabi Tak Aayega Phir Nabi ﷺ Tak Mil Jayega.
Is Tarah Kisi Hadees Ko Likhne Ke Liye Ek Sanad Mutassil Hoti Hai.

Matan Kisey Kehte Hain

Kisi Sanad Ke Zariye Jo Baat Ham Tak Pahuchti Hai Wo Matan Kehlati Hai Yani Jo Masla Bayan Ho Rha Hai Woh Matan Hai Aur Jis Chain Ke Zariye Se Wo Ham Tak Pahucha Woh Chain Sanad Hai.

Sanad Wa Matan Ka Example

Imam Bukhari Ne Ek Hadees Likha

حَدَّثَنَا أَبُو اليَمَانِ، قَالَ: أَخْبَرَنَا شُعَيْبٌ، قَالَ: حَدَّثَنَا أَبُو الزِّنَادِ، عَنِ الأَعْرَجِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «فَوَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ، لاَ يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّى أَكُونَ أَحَبَّ إِلَيْهِ مِنْ وَالِدِهِ وَوَلَدِهِ»

Nabi ﷺ Ne Farmaya Qasam Bai Uski Jiske Qabza E Qudrat Me Meri Jaan Hai Tum Me Se Koi Shaks Us Waqt Momin Nahi Ho Sakta Jab Tak Woh Mujhe Apne Maa Baap Se Badhkar Na Chahe.

Is Hadees Ko Likhne K Liye Pehle Sanad Likha Ki Imam Bukhari Ko Yeh Hadees Kaise Mili Kiske Zariye Mili To Aapne Sabke Naam Likhe

Haddasana Abul Yaman
Yani Mujhse Abul Yamaan Ne Bayan Kiya Phir Unke Baad Ek Naam Likha Ki Unhone Abul Yamaan Se Bayan Kiya
Is Tarah Puri Sanad Nabi ﷺ Tak Pahuchayi

Toh Isme Haddasana Abul Yamaan Se Lekar Abu Hurairah Radialla Taala Anhu Tak Sanad Ka Hissa Hai Aur Aage Unhone Jo Nabi ﷺ Ke Hawale Se Bayan Kiya Usko Matan Kahenge..

Sabaq  3

Tadaad E Sanad Ke Etbar Se Iqsam E Hadees

Tadad E Sanad Ke Etbar Se Hadees Ke 4 Iqsam Hain

Ghareeb Hadees:


Jis Hadees Ki Hamare Paas Ek Sanad Hoti He Us Hadees Ko Usool E Hadees Me Ghareeb Hadees Kehte Hain.

Azeez Hadees:


Jis Hadees K Liye Hamare Paas Do Sanaden Hoti Hain Us Hadees Ko Usool E Hadees Me Azeez Hadees Kehte Hen.

Mashhur/Mustafiz Hadees:


Jis Hadees Ki Hamare Paas Do Se Zyada Sanadein Hoti Hain Yani 3, Us Hadees Ko Usool E Hadees Me Mashhur Ya Mustafeez Hadees Kehte Hen.

Mutawatir:


Jis Hadees K Hamare Paas Be Shumar Sanadein Hoti Hai Yani 4 Se 40 Tak, Usay Mutawatir Hadees Kehte Hain, Aur Isko Har Zamane Me Muhaddiseen Ne Riwayat Kiya Hota Hai Aur Kisi Hadees Ka Mutawatir Hona Hadees Ki Sehat Ka Sabse Aala Darja Hota Hy

Hadees Ghareeb Ki Wazahat

Jis Hadees Ko Riwayat Karne Me Koi Rawi Akela Hota Hai Aur Us Hadees Ka Dusra Koi Subut Nahi Milta Toh Woh Hadees Muhaddiseen Ki Istilah Me Gharib Kehlayegi
Jaise

حَدَّثَنَا أَبُو اليَمَانِ، قَالَ: أَخْبَرَنَا شُعَيْبٌ، قَالَ: حَدَّثَنَا أَبُو الزِّنَادِ، عَنِ الأَعْرَجِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «فَوَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ، لاَ يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّى أَكُونَ أَحَبَّ إِلَيْهِ مِنْ وَالِدِهِ وَوَلَدِهِ»

Ye Ek Hadees Bukhari Me Is Sanad Se Imam Bukhari Ne Naqal Kiya Phr

Yehi Mafhoom Ki Hadees Dusri Sanad Se Likha

حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، قَالَ: حَدَّثَنَا ابْنُ عُلَيَّةَ، عَنْ عَبْدِ العَزِيزِ بْنِ صُهَيْبٍ، عَنْ أَنَسٍ، عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، ح وحَدَّثَنَا آدَمُ، قَالَ: حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَنَسٍ، قَالَ: قَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ «لاَ يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ، حَتَّى أَكُونَ أَحَبَّ إِلَيْهِ مِنْ وَالِدِهِ وَوَلَدِهِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ

Ab Ba Zahir Samne Is Hadees Ki 2 Sanad Ho Gayin To Isey Azeez Kahenge.

Is Tarah Agar 1 Hadees Par 3 Sanad Hon To Mashhur Ya Mustafiz Kaha Jayega Phir Mazid Hon To Mutawatir Me Rakha Jayega.

۔ خبر واحد:
وہ حدیث ہے ’’جس کے راوی اس قدر کثیر نہ ہوں‘

Jo Hadees Mutawatir Na Ho Usko Khabar Wahid Me Shumar Kiyaa Jata Hai
Yani

Hadees Ghareeb
Hadees Aziz
Hadees Mustafiz

Ye Teeno Khabar Wahid Ki Iqsam Hain

Halaki Ye Sabhi Apni Jagah Par Khas Ahmiyat Rakhti Hain

नाविल & क़िस़्स़ा + कहानी की किताबों  से बेहतर है कि  दीनी किताबों  का मुत़ालअः कर के (पढ़ कर) अपने इ़ल्म में इज़़ाफ़ः करें  ‼️

ख़ास़ कर : जाइज़ नाजाइज़, ह़लाल ह़राम के मसाइल सीखें, हमें क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये, यह सीखें, ताकि  गुनाह के  कामों से  बच कर और अच्छे काम करके अल्लाह ﷻ और उस के  रसूल ﷺ को राज़़ी करें ‼️

अल्लाह तआ़ला ﷻ अपने ह़बीब ﷺ के वसीले से तमाम सुन्नी मुसलमानों को इ़ल्मे दीन सीखने और सिखाने की तौफ़ीक़ अ़त़ा फ़रमाये, और अ़मल करने की भी  तौफ़ीक़ अ़त़ा फ़रमाये, और ख़ातिमः ईमान पर फ़रमाये, पोस्ट को पढ़ कर दूसरे मुस्लिम तक शेयर जरूर करे

हदीस क्या है? किसे कहते ? और कितने तरह की होती है ।

*Ilm E Hadees*

*Sabaq 1*

*Hadees Ki Tareef*

*Hadees :*

*Lugvi Maani : “ Nayi Cheez” , Aur “Baat Karna”*

*Istelahi Maani : Huzur ﷺ K Qaul ,Fayl ,Taqreer Ya Sifat Wa Haal Ko Hadees Kehte Hai, Aur Kabhi Isko “Khabar” Bhi Kehte Hai.*

*Lekin Baaz Muhaddiseen Ne Hadees Aur Khabar Me Aam Aur Khaas Ka Farq Kiya Hai , Yaani Inke Nazdeek Har Hadees Khabar Hai Lekin Har Khabar Hadees Nahi Hai.*

*Tambhi : Khabar Aur Hadees , Umooman Huzur ﷺ K Qaul , Fayl Aur Taqreer Per Bola Jaata Hai, Aur Asr , Umooman Sahaba (رضی اللہ تعالیٰ علیہم اجمعین) K Qaul , Fayl Aur Taqreer Per Bola Jaata Hai.*

*इंशाअल्लाह हदीस की जानकारी के 40 सबक होंगे*

To be continue………..

इल्मे हदीस की जानकारी को समझने के लिए हमारी इस पोस्ट फॉलो करिये, इंशाअल्लाह इल्म में बेहतर इज़ाफ़ा होगा

बाद तौबा मुरतद और बदमज़हब से निकाह क्या हुकुम है ??जब कोई नाम निहाद सुन्नी किसी मुरतद के यहाँ रिश्ता करना चाहता है तो दुनियादार मौलवी शैतानी फरेब से काम लेता है यानी तौबा कर के निकाह पढ़ा देता है और पैसा लेकर अपना रास्ता पकड़ता है, और तौबा करने वाला मुरतद पहले की तरह ही अपने रास्ते पर रहता हैइस लिए शरीयत का यह हुकुम है कि तौबा के फौरन बाद उससे निकाह नही किया जायेगाबल्कि कुछ दिनों उसे देखा जाएगा कि अपनी तौबा पर क़ायम है या नही ??जैसे कि फ़ासीके मोअलिन तौबा के फौरन बाद इमाम नही बना दिया जाताफतावा रजविया जिल्द 3 सफह 213 में है कि फतावा काज़ी खां फिर फतावा आलमगीरी में है किफ़ासिक़ तौबा कर ले फिर भी उसकी गवाही ना मानी जाएगी जब तक की इतना वक़्त ना गुजर जाये की उसकी तौबा का असर जाहिर होऔर आला हजरत इमाम अहले सुन्नत फ़ाज़िले बरेलवी लिखते है की अमीरुल मोमिनिन हज़रत फारुके आज़म रज़ियल्लाहु अन्हु ने जब “सुबैग” से जिस पर से बवजहे बहस मुतशाबिहात बद मज़हबी का अंदेशा था बाद जरबे शदीद तौबा कर ली । हज़रत अबु मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु के पास फरमान भेजा कि “मुसलमान उसके पास ना बैठे” “उसके साथ खरीद व फरोख्त ना करे” ‘बीमार पड़े तो उसकी अयादत को ना जये’ “और मर जाये तो उसके जनाजे में हाज़िर ना हो”बतामिले हुक्मे अहकाम (इस बड़े हुकुम को मानने के साथ) एक मुद्दत तक यही हाल रहा की सौ आदमी बैठे होते और वह आता सब मुतफ़र्रिक ( तितर बितर) हो जातेजब हज़रत अबु मूसा अशअरी ने अर्ज़ी भेजी की अब उसका हाल अच्छा हो गया है तब इज़ाज़त फरमाई , फतावा रजविया जिल्द 3 सफह 213आला हजरत मुज़दिदे दिनों मिल्लत ने इस वाकिये के सबूत में 5 हदीसे को नकल फरमाया हैदेखिये सुबैग यानी आयते मुतशाबिहात के मिसल में बहस किया करता था जबकि वह मुरतद नही था बल्कि उसके बद मज़हब होने का डर था मगर उसके बावजूद हज़रत उमर फारूक रज़ियल्लाहु अन्हु ने तौबा के बाद भी सख्त बायकाट किया जब तक कि इत्मिनान नही हो गयालिहाज़ा मुरतद और बद मज़हब के तौबा करने के बाद बदर्जये औला (जरूर) कई बरस तक देखा जाएगा जब तक उसकी बात चीत और तौर तरीकों से खूब इत्मिनान ना हो जाये की वह अहले सुन्नत व जमात का हो गया तब उसके साथ निकाह किया जाएगा वरना नहीलिहाज़ा जो सख्स मुरतद या मुरतद्दह को तौबा करने के बाद फौरन उनके साथ अपने लड़के लड़की की शादी करे या जो मौलवी निकाह पढे मुसलमानो को चाहिए कि इनका मज़हबी बायकाट करे । ऐसे दुनियादार मौलवी के पीछे नमाज़ ना पढेबहवाला :- बद मजहबो से रिश्तेसफह :-19 व 20लेखक :- मुफ़्ती जलालुद्दीन अहमद अमज़दी

इस्लाही पोस्ट नमाज़ के अहम मसले

आओ मिलकर सवाब कमाये

📝सवाल अस्र या इशा के फ़र्ज़ों से पहले जो चार रक़अ्त सुन्नत गैर मुअक्क़दह पढ़ी जाती हैं उनके क़अदए ऊला में अत्तहिय्यात के बाद दुरूद शरीफ़ पढ़ना चाहिये या नहीं ? अकसर लोग अत्तहिय्यात पढ़ कर तीसरी रक़अ्त के लिये खड़े हो जाते हैं ?
✍🏻जवाब : सुन्नते गैर मुअक्क़दह और नवाफ़िल के क़दए ऊला में दुरूद शरीफ़ और तीसरी रक़अ्त में सना पढ़ना चाहिये, इस लिये कि सुन्नते गैर मुअक्क़दह और नवाफ़िल में हर दो रक़अ्त मुस्तक़िल नमाज़ है और दो रक़अ्त के बाद जो क़दा है वह क़दए अख़ीरा के हुक्म में है, कुतुबे फ़िक़ह में इस मस्अले की सराहत मौजूद है।

📝सवाल : अगर इमाम अत्तहिय्यात पूरी करके तीसरी रक़अ्त के लिए खड़ा हो जाए और मुक़्तदी अत्तहिय्यात पूरी न पढ़ सके तो उस सूरत में मुक़्तदी इमाम के साथ खड़ा हो जाए या अत्तहिय्यात पूरी करके खड़ा हो ?

✍🏻जवाब : मुक़्तदी अपना तशहुद यानी अत्तहिय्यात पूरी करके खड़ा हो।

👇🏻 फ़तावा आलमगीरी में है:
✍🏻 मुक़्तदी के तशहुद पूरा करने से पहले इमाम खड़ा हो जाए या नमाज़ के क़दए अख़ीरा में मुक़्तदी के तशहुद पूरा करने से पहले इमाम सलाम फेर दे तो मुख़्तार और सही यह है कि मुक़्तदी तशहुद पूरा करे।

📕 (इस्लाह़ुल‌ अवाम सफा, 24,24)

अल्लाह को हाज़िर नाज़िर कहना कैसा ??

इल्मे दिन सीखना फ़र्ज़ है

अल्लाह को हाज़िर नाज़िर नही कहना चाहिए

क्योंकि अल्लाह जगह और मकान से पाक है

हकीमुल उम्मत मुफ़्ती अहमदयार खान नईमी फरमाते है हर जगह हाज़िर नाज़िर होना खुद की सिफ़त हरगिज़ नही खुदा जगह और मकान से पाक है

हवाला :- जाअल हक

आप से पुरखुलुस गुजारिश

पोस्ट को पढ़ने के बाद दूसरे मुसलमान भाई बहनों को शेयर जरूर करे

औरत का किस किस से पर्दा है ??

औरत का हर अजनबी बालिग़ मर्द से पर्दा है,, जो महरम न हो, वो अजनबी होता है, महराम से मुराद वो मर्द है जिन से हमेशा के लिए निकाह हराम हो, (हुरमत नसब से हो या सबब से मसलन रज़ाअत (दूध का रिश्ता)या मूसा -हरत!

महारिम में तीन किस्म के अफराद दाखिल है :-
(1)नसब की बिना पर जिनसे हमेशा के लिए निकाह हराम हो

नसबी महारिम👇🏻
1)अपनी औलाद और अपनी औलाद की औलाद
2)अपने मा बाप और अपने मा बाप के मा बाप
3)👉🏻अपने मा बाप की औलाद (ख़्वाह सगे हो या सौतेले)

(2) 👉🏻रज़ाअत या’नी दूध के रिश्ते की बिना पर जिन से निकाह हराम हो

(3) 👉🏻 मूसा -हरत या’नी सुसराली रिश्ते की वजह से जिनसे निकाह हराम हो जैसे सुसर के लिए बहु,
औरत जिस मर्द से निकाह करती है तो उस मर्द के उसूल व फुरूअ (उसूल से मुराद बाप दादा परदादा ऊपर तक)
और
फुरूअ से मुराद औलाद दर औलाद नीचे तक है

हवाला📚
पर्दे के बारे में सुवाल जवाब

🌹🤲🏻 या अल्लाह ﷻ सरकार ए मदीना हुज़ूर ﷺ के वसीले से हम तमाम के इल्म व अमल में खूब खूब बरकते अता फरमा हमारी मग्फिरत फरमा हमें गुनाहो से बच कर नेक काम करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।..🤲🏻آمِــــــــــيْن اَللّٰهُمَ آمِيْن يَارَبَّ الْعَالَمِــــــــــيْنَ

⚘​🤲🏻 अपनी नेक दुआओं मे याद रखे

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