बारगाहे गौसे आज़म रदियल्लाहु अन्हु में हुज़ूर मुफ्तिए आज़म हिन्द रदियल्लाहु अन्हु की मक़बूलियत :- जनाब अब्दुल क़य्यूम साहब जो हुज़ूर मुफ्तिए आज़मे हिन्द के मुरीद थे एक मर्तबा अपने दोस्त जनाब आशिक़ अली साहब को लेकर हुज़ूर मुफ़्ती आज़म हिन्द की बारगाह में हाज़िर हुए ताके उनको मुरीद करवा दें हज़रत ने बैअत के कलिमात जनाब आशिक़ अली साहब को कहलवाना शुरू किया और जब आखिर में फ़रमाया के कहो के मेने अपना हाथ हुज़ूर गौसे आज़म के हाथ में दिया तो जनाब आशिक़ अली साहब बोले के मेने अपना हाथ मुफ्तिए आज़म के हाथ में दिया हज़रत ने फ़रमाया में जो कहता हूँ वो कहो के हुज़ूर गौसे आज़म के हाथ में दिया तो जनाब आशिक़ अली साहब बोले के अभी आपने मुझ से कहल वाया के झूठ नहीं बोलूंगा और आप कह रहे हो के हुज़ूर गौसे आज़म के हाथ में दिया? इस पर हज़रत ने फ़रमाया के हुज़ूर गौसे आज़म के सिलसिले में इसी तरह दाखिल करते हैं हमारे मशाइख का यही तरीक़ा है तुम्हे हुज़ूर गौसे आज़म तक पहुंचा दिया जाएगा | हज़रत ने फ़रमाया कहो के हुज़ूर गौसे आज़म के हाथ में दिया उन्होंने फिर भी नहीं कहा बस हुज़ूर मुफ़्ती आज़म हिन्द को जलाल आ गया आपने अपना अमामा उतर कर जनाब आशिक़ अली साहब के सर पर रख दिया और बुलंद आवाज़ में जलाल में फ़रमाया के कहता क्यों नहीं के मेने अपना हाथ हुज़ूर गौसे आज़म के हाथ में दिया? बस इतना सुन्ना था के जनाब आशिक़ अली बार बार कहने लगे के मेने अपना हाथ हुज़ूर गौसे आज़म के हाथ में दिया और बेहोश हो गए कुछ देर बाद होश आया तो जनाब अब्दुल क़य्यूम साहब ने अलग ले जा कर पूछा के क्या हुआ था कुछ तो बताओ तो जनाब आशिक़ अली साहब बोले के जैसे ही हज़रत ने अपना अमामा मेरे सर पर रखा मेने देखा के “गौसुसकलैन क़ुत्बुल कौनैन सरकार सय्यदना गौसे आज़म रदियल्लाहु अन्हु जलवा फरमा हैं और कह रहे हैं के “आशिक़ अली मुफ़्ती आज़म का हाथ मेरा हाथ है ये मेरे नायब और मज़हर हैं कहो के मेने अपना हाथ गौस आज़म के हाथ में दिया” बस मेरा हाथ सरकार गौस आज़म के हाथ में था और में बार बार कहते कहते बेहोश हो गया | फ़िदा तुम पे हो जाए नूरी ऐ मुज़्तर, ये है इस की ख्वाइश दिली गौसे आज़म |
