शहर की बुनिया उस वक्त पड़ी जबकि 14 हिजरी से 16 हिं 0 तक कादसिया वगैरा में फुतूहात के बाद मुसलमानों की फौज ने इराक में सुकूनत इख्तियार की और मदाइन की आबो – हवा उन के मुवाफिक न हुई तो सहाबिए रसूल हज़रत सअद बिन वकास रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के हुक्म से यह जगह तलाश की गई और मुसलमानों के लिये मकानात की तामीर हुई ।
फिर आप 17 हिजरी में अपनी फौज के साथ मदाइन से मुन्तकिल होकर यहां मुकीम हुए । इस तरह कूफा शहर वुजूद में आया । हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के ज़माना ही से कूफा आप के शियओं और महबूबों का मरकज़ था , वहां के लोग हज़रत अमीरे मुआविया के अहदे ख़िलाफत ही में हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की ख़िदमत में तशरीफ आवुरी की अरज़ियां भेज चुके थे मगर आप ने साफ इनकार कर दिया था । अब जबकि कूफा वालों को मालूम हुआ
कि अमीरे मुआविया का इन्तेकाल हो गया और इमामे आली मक़ाम ने यजीद की बैअत से इनकार कर दिया तो बरिवायत तारीख तबरी सुलैमान बिन सुरद के मकान में वहां के शिया जमा हुए , हज़रत अमीरे मुआविया के इन्तेकाल का ज़िक करके सब ने खुदा का शुक अदा किया , फिर सुलैमान ने सब से कहा कि मुआविया का इन्तेकाल हो गया है . और हज़रत इमाम हुसैन ने यज़ीद की बैअत से इनकार कर दिया है और मक्का चले गए हैं , आप लोग उनके और उनके बाप के शिया हैं , अगर उनके मददगार बन सकते हैं और उनके दुश्मनों से जंग कर सकते हैं तो उन को तशरीफ आवुरी के लिये ख़त लिखें और अगर कमज़ोरी या बुज़दिली का अंदेशा हो तो धोका देकर उन की जान को खतरे में न डालें । सब ने बयक ज़बान कहा कि हम – उन को धोका न देंगे बल्कि हम उनके दुश्मनों से लड़ेंगे और अपनी जानें उन पर कुर्बान कर देंगे । ( तबरी : 2/176 )
चुनांचे पहला ख़त जो उन लोगों की तरफ से लिखा गया उस में हज़रत अमीरे मुआविया के इन्तेकाल और यज़ीद की वली अहदी का ज़िक करने के बाद तहरीरं किया गया कि हमारे सर पर कोई इमाम नहीं है , आप तशरीफ लाइये , खुदाए तआला आप की बरकत से हमें हक़ की हिमायत नसीब फरमाए । दमिश्क का गवर्नर नोमान बिन बशीर यहां मौजूद है मगर हम उस के साथ नमाजे जुमा में शरीक नहीं होते और न उस के साथ ईदगाह जाते हैं । जब हमें मालूम हो जाएगा कि आप तशरीफ ला रहे हैं तो हम उस को यहां से निकाल कर मुल्के शाम जाने पर मजबूर कर देंगे । ( तबरी : 2/177 )
यह पहला ख़त अब्दुल्लाह बिन सुबैय हमदानी और अब्दुल्लाह बिन दाल के बदस्त रवाना किया गया जो , इमामे आली मक़ाम की खिदमत में 10 रमज़ान 60 हिजरी को मक्का मुअज्जमा पहुंचा । इस ख़त की रवांगी के बाद दो ही दिन के अरसे में 53 अरज़ियां और तैयार हो गई जो एक दो तीन और चार आदमियों के दस्तख़त से थीं , यह सारे खुतूत तीन आदमियों के हाथ इरसाल किये गए । इस के बाद फिर कुछ मख्सूस लोगों ने अरज़ियां भेजीं और यह सब यके बाद दीगर थोड़े वक्फे से हज़रत की ख़िदमत में पहुंच गई । ( तबरी : 2/177 )
हवाला ख़ुत्बाते मुहर्रम
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