माले जकात किन लोगों में सर्फ (तकसीम) की जाए ???

मसला : – ज़कात के मसारिफ सात हैं यअनी सात किस्म के लोगों को ज़कात दे सकते हैं 1. फकीर 2. मिस्कीन 3. आमिल 4. रिकाब 5. गारिम 6. फीसबीलिल्लाह 7. इनुस्सबील ।

मसला : – फकीर वह शख्स है जिस के पास कुछ हो मगर न इतना कि निसाब को पहुँच जाये या निसाब की कद्र हो तो उसकी हाजते अस्लिया में मुस्तगरक ( घिरा हुआ ) हो मसलन रहने का मकान पहनने के कपड़े खिदमत के लिये लौंडी , गुलाम । इल्मी शुग्ल रखने वाले को दीनी कितायें जो उसकी जरूरत से ज़्यादा न हो जिसका बयान गुज़रा यूँही अगर मदयून ( कर्जदार है और दैन निकालने के बद निसाब बाकी न रहे तो फकीर है अगर्चे उसके पास एक तो क्या कई निसाबें हो ।

मसाला : – फकीर अगर आलिम हो तो उसे देना जाहिल को देने से अफज़ल है । ( आलमगीरी ) मगर आलिम को दे तो इसका लिहाज़ रखे कि उसकी इज्जत मद्देनज़र हो अदब के साथ दे जैसे छोटे बड़ों को नज़र देते हैं । और मआजल्लाह आलिमे दीन की हिकारत ( जिल्लत ) अगर दिल में आई तो यह हलाकत और बहुत सख्त हलाकत है ।

मसला : – मिस्कीन वह है जिसके पास कुछ न हो यहाँ तक कि खाने और बदन छुपाने के लिये उसका मुहताज है कि लोगों से सवाल करे और उसे सवाल हलाल है फकीर को सवाल नाजाइज़ कि जिसके पास खाने और बदन छुपाने को हो उसे बगैर जरूरत व मजबूरी सवाल हराम है । आलमगीरी )

मसअला : – आमिल वह है जिसे बादशाहे इस्लाम ने ज़कात और उन दुसूल कर ने के लिए मुकर्रर किया उसे काम के लिहाज से इतना दिया जाये कि उसको और उसके मददगारों मुतवस्सित ( दरमियानी ) तौर पर काफी हो मगर इतना न दिया जाये कि जो वुसूल कर लाया है उस के निस्फ से ज्यादा हो जाये ।

मसला : -आमिल अगचे गनी हो अपने काम की उजरत ले सकता है और हाशिमी हो तो उसको जकात के माल में से देना भी नाजाइज और उसे लेना भी नाजाइज़ हाँ अगर किसी और मद से दें तो लेने में हरज नहीं । ( आलमगीरी )

मसला : – ज़कात का माल आमिल के पास से जाता रहा तो अब उसे कुछ न मिलेगा मगर देने वालों की ज़कातें अदा हो गयीं । र मुगार रहुल मुहतार ) मसअला : – कोई शख्स अपने माल की ज़कात खुद ले जाकर बैतुलमाल में दे आया तो उसका मुआवज़ा आमिल नहीं पायेगा । ( आलमगीरी )

मसअला : – वक्त से पहले मुआवज़ा ले लिया या काज़ी ने दे दिया यह जाइज़ है मगर बेहतर यह है कि पहले न दें और अगर पहले ले लिया और वुसूल किया हुआ माल हलाक हो गया तो ज़ाहिर यह कि वापस न लेंगे । हुल मुहवार ) मसअला : – रिकाब से मुराद मुकातिब गुलाम ( मुकातिब गुलाम वह कि मालिक ने उससे यह कह दिया हो कि रुपया दे दो तो तुम आजाद हो ) को देना कि उस ज़कात के माल से बदले किताबत यअनी वही रूपया जो आज़ाद होने के लिए मालिक को देना है , अदा करे और गुलामी से अपनी गर्दन रिहा करे ।

मसला : – ग़नी के मुकातिब को भी माले जकात दे सकते हैं अगर्चे मलूम है कि यह गनी का मुकातिब है । मुकातिब पूरा बुदले किताबत अदा करने से आजिज़ हो गया और फिर ब – दस्तूर गुलाम हो गया तो जो कुछ इसने माले ज़कात लिया है उसका मौला खर्च में ला सकता है अगर्चे गनी हो ।

मसला : – मुकातिब को जो ज़कात दी गयी वह गुलामी से रिहाई के लिये है मगर अब इसे इख्तियार है कि दूसरी जगह खर्च कर सकता है अगर मुकातिब के पास ब – कद्रे निसाब माल है और बदले किताबत से भी ज़्यादा है जब भी ज़कात दे सकते हैं मगर हाशिमी के मुकातिब को जकात नहीं दे सकते ( आलमगीरी )

मसला : – गारिम से मुराद मदयून है यअनी उस पर इतना दैन हो कि उसे निकालने के बअद निसाब बाकी न रहे अगर्चे उसका औरों पर बाकी हो मगर लेने पर कादिर न हो मगर शर्त यह है कि मदयून हाशिमी न हो ।

मसअला : – फीसबीलिल्लाह यअनी राहे खुदा में खर्च करना इसकी चन्द सूरतें हैं मसलन कोई शख्स मुहताज है कि जिहाद में जाना चाहता है सवारी और सफर का सामान उसके पास नहीं तो उसे माले जकात दे सकते हैं कि वह राहे खुदा में देना है अगर्चे वह कमाने पर कादिर हो या कोई हज को जाना चाहता है और उसके पास माल नहीं उस को ज़कात दे सकते हैं मगर उसे हज के लिये सवाल करना जाइज़ नहीं या तालिबे इल्म कि इल्मे दीन पढ़ता या पढ़ाना चाहता है उसे दे सकते हैं कि यह भी राहे खुदा में देना है बल्कि तालिबे इल्म सवाल करके भी माले जकात ले सकता है जबकि उसने अपने आप को इसी काम के लिये फारिग कर रखा हो अगचे कसब ( कमाने ) पर कादिर हो यूँही हर नेक बात में ज़कात सर्फ करना फीसबीलिल्लाह है जबकि ब – तौरे तमलीक ( मालिक बना देने के तौर ) हो कि बगैर तमलीक ज़कात अदा नहीं हो सकती ( )

हवाला :- बहारे शरीयत जिल्द 05

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Published by husainfoundation374

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