सोने ,चांदी व तिजारत के माल की जकात का बयान 03

मसला : – सोने की निसाब बीस मिस्काल है यअनी साढ़े सात तोले ( 87 ग्राम 480 मिलीग्राम ) और चाँदी को दो सौ दिरहम यअनी साढ़े बावन तोले ( -612 ग्राम 360 मिलीग्राम ) यानी वह तोला जिससे यह राइज रुपया सवा ग्यारह माशे है । सोने चाँदी की ज़कात में वज़न का एअतिबार है कीमत का लिहाज़ नहीं , मसलन सात तोले सोने या कम का ज़ेवर या बर्तन बना हो कि उसकी कारीगरी की वजह से दो सौ दिरहम से जाइद कीमत हो जाये या सोना गिरौं हो कि साढ़े सात तोले से कम की कीमत दो सौ दिरहम से बढ़ जाये जैसे आज कल कि साढ़े सात तोले सोने की कीमत चाँदी की कई निसाबें होंगी । गरज़ यह कि वजन में ब – कद्रे निसाब न हो तो . ज़कात वाजिब नहीं , कीमत जो कुछ भी हो । यूँही सोने की जकात में सोने और चाँदी की ज़कात में चाँदी की कोई चीज़ दी तो कादरी उसकी कीमत का एअतिबार न होगा बल्कि वज़न का अगर्चे उसमें बहुत कुछ सनअत ( कारीगरी ) हो जिस की वजह से कीमत बढ़ गयी या फर्ज करो दस आने भर चाँदी बिक रही है और ज़कात में एक रुपया दिया जो सोलह आने का करार दिया जाता है तो ज़कात अदा करने में वह यही समझा जायेगा कि सवा ग्यारह माशे चाँदी दी यह छह आने बल्कि कुछ ऊपर जो उसकी कीमत में जाइद हैं लाव ( बेकार ) हैं ।

मसला : – यह जो कहा गया कि अदाए जकात में कीमत का एअतिबार नहीं यह उसी सूरत में है कि उस जिन्स की जकात उसी जिन्स से अदा की जाये और अगर सोने की ज़कात चाँदी से या चाँदी की सोने से अदा की तो कीमत का एअतिबार होगा मसलन सोने की जकात में चाँदी की कोई चीज़ दी जिसकी कीमत एक अशर्फी है तो एक अशर्फी देना करार पायेगा अगचे वजन में इसकी चाँदी पन्द्रह रुपये भर भी न हो ।

मसअला : – सोना चाँदी जबकि ब – कद्रे निसाब हों तो इन की ज़कात चालीसवाँ हिस्सा है ख्वाह वह वैसे ही हों या इनके सिक्के जैसे रुपये अशर्फियाँ या इनकी कोई चीज़ बनी हुई हो ख्वाह उसका इस्तेमाल जाइज़ हो जैसे औरत के लिये जेवर मर्द के लिये चाँदी की एक नग की एक अँगूठी साढ़े चार माशे से कम की या सोने चाँदी के बिला जन्जीर के बटन , या इस्तेमाल नाजाइज हो जैसे चाँदी सोने के बर्तन , घड़ी , सुर्मे दानी , सलाई कि इनका इस्तेमाल मर्द औरत सब के लिये हराम है या मर्द के लिये सोने चाँदी का छल्ला या जेवर या सोने की अंगूठी या साढ़े चार माशे से ज़्यादा चाँदी की अंगूठी या बन्द अंगूठियाँ या कई नग की एक अँगूठी गरज जो कुछ हो जकात सब की वाजिब है मसलन सात तोला सोना है तो दो माशा ज़कात वाजिब है या बावन तोला छह माशा चाँदी है तो एक तोलो तीन माशा छह रत्ती जकात वाजिब है । )

मसला : – सोना चाँदी के अलावा तिजारत की कोई चीज़ हो जिसकी कीमत सोने चाँदी की निसाब को पहुँचे तो उस पर भी ज़कात वाजिब है यअनी कीमत का चालीसवाँ हिस्सा , और अगर असबाब की कीमत तो निसाब को नहीं पहुँचती मगर उसके पास इनके अलावा सोना चाँदी भी है तो इनकी कीमत सोने चाँदी के साथ मिला कर मजमूआ करें ( यअनी टोटल करें ) अगर मजमूआ निसाब को पहुँचा जकात वाजिब है और असबाबे तिजारत की कीमत उस सिक्के से लगायें जिसका रिवाज वहाँ ज्यादा हो जैसे , हिन्दुस्तान में रुपये का ज्यादा चलन है इसी से कीमत लगाई जाये और अगर कहीं सोने – चाँदी दोनों के सिक्कों का यकसौं चलन हो तो इख्तियार है जिससे चाहें कीमत लगायें मगर जबकि रुपये से कीमत लगायें तो निसाब नहीं होती और अशर्फी से हो जाती है या बिल अक्स ( यअनी इसका उल्टा ) तो उसी से कीमत लगाई जाये जिससे निसाब पूरी हो और अगर दोनों से निसाब पूरी होती है मगर एक से निसाब के अलावा निसाब का पाँचवा हिस्सा ज्यादा होता है दूसरे से नहीं तो उस से कीमत लगायें जिस से एक निसाब और निसाब का पाँचवाँ हिस्सा हो । दुई मुखशार वगैरा )

मसला – निसाब से ज्यादा माल है तो अगर यह ज्यादती निसाब का पाँचौं हिस्सा है तो इसकी जकात भी वाजिब है मसलन दो सौ चालीस दिरहम यअनी 63 तोला चाँदी हो तो ज़कात में छह दिरहम वाजिब यनी एक तोला छह माशा । रत्ती यानी बावन तोला छह माशा के बद हर 10 तोला माशा पर 3 माशा – रत्ती बढ़ायें और सोना नौ तोला हो तो 2 भाशा रत्ती यनी । तोला 6 माशा के बद हर एक तोला 6 माशा पर रत्ती बढ़ायें और पाँचवाँ हिस्सा न हो तो माफ यानी मसलन नौ तोला से एक रत्ती कम अगर सोना है तो ज़कात वही 7 तोला 6 माशा की वाजिब है यअनी दो माशा यूँही चाँदी अगर 63. तोला से एक रत्ती भी कम है तो जकात वही 52 तोला 6 माशा की एक तोला 3 माशा 6 रत्ती वाजिब यूँही पाँचवें हिस्से के बअद जो ज्यादती है अगर वह भी पाँचवाँ हिस्सा है तो उसका चालीसवाँ हिस्सा वाजिब वरना मुआफ और इसी तरह आगे समझ लें । माले तिजारत का भी यही हुक्म है ।

मसअला : – जो माल किसी पर दैन हो उसकी ज़कात कब वाजिब होती है और अदा कब वाजिब है इस में तीन सूरतें हैं अगर दैन कवी हो जैसे कर्ज जिसे उर्फ में दस्तगरदाँ ( कर्ज ही के मअना में आया है ) कहते हैं और माले तिजारत का समन मसलन कोई माल इसने ब – नियते तिजारत खरीदा उसे किसी के हाथ उधार बेच डाला या माले तिजारत का किराया मसलन कोई मकान या जमीन ब – नियते तिजारत खरीदी उसे किसी को सुकूनत या खेती के लिए किराये पर दे दिया यह किराया अगर उस पर दैन है तो देने कवी होगा और देने कवी की ज़कात ब – हालते दैन ही साल – ब – साल वाजिब होती रहेगी मगर वाजिबुल अदा उस वक्त है जब पाँचवाँ हिस्सा निसाब का उसूल हो जाये मगर जितना उसूल हुआ उतने ही की वाजिबुल अदा है यअनी चालीस दिरहम होने से एक दिरहम देना वाजिब होगा और अस्सी वुसूल हुए तो दो और इसी तरह आगे समझ लें दूसरे दैने मुतवस्सित कि किसी माले गैरे तिजारती का बदल हो मसलन घर का गल्ला या सवारी का घोड़ा या खिदमत का गुलाम या और कोई शय हाजते असलिया की बेच डाली और दाम खरीदार पर बाकी हैं इस सूरत में ज़कात देना उस वक़्त लाज़िम आयेगा कि दो सौ दिरहम पर कब्जा हो जाये । यूँही अगर मूरिस ( वह मरने वाला जो माल और वारिस छोड़ जाये ) का दैन इसे तर्के में मिला अगचे माले तिजारत का एवज़ ( बदल ) हो मगर वारिस को दो सौ दिरहम वुसूल होने और मूरिस की मौत को साल गुज़रने पर ज़कात देना लाज़िम आयेगा । तीसरे दैने जईफ जो गैरे माल का बदल हो जैसे महरे बदल , खुला ( तलाक पर मिला रुपया ) दियत ( कत्ल के बदले मिला जुर्माना ) बदले किताबत ( गुलामी से आजाद करने पर मिला रुपया ) या मकान या दुकान कि ब – नियते तिजारत खरीदी न थी उसका किराया किरायेदार पर चढ़ा इसमें ज़कात देना उस वक़्त वाजिब है कि निसाब पर कब्जा करने के बद साल गुजर जाये या इसके पास कोई निसाब उस जिन्स की है और उसका साल पूरा हो जाये तो ज़कात वाजिब है फिर अगर दैन या मुतवस्सित कई साल के बद वुसूल हो तो अगले साल की जकात जो इसके ज़िम्मे दैन होती रही वह पिछले साल के हिसाब में इसी रकम पर डाली जायेगी मसलन उम्र पर जैद के तीन सौ दिरहम दैने कवी थे पाँच बरस बद चालीस दिरहम से कम वुसूल हुए तो कुछ नहीं और चालीस वुसूल हुए तो एक दिरहम देना वाजिब हुआ अब उन्तालीस बाकी रहे कि निसाब के पाँचवें हिस्स से कम हैं लिहाजा बाकी बरसों की अभी वाजिब नहीं और अगर तीन सौ दिरहम देने मुतवस्सित थे तो जब तक दो सौ दिरहम तुसूल न हों कुछ नहीं और पाँच बरस बाद दो सौ वुसूल हुए तो इक्कीस वाजिब होंगे । साले अब्बल के पाँच अब साले दोम में एक सौ पचानवे रहे , इनमें से पैंतीस कि पाँचवें हिस्से से कम हैं माफ हो गये एक सौ साठ रहे.इसके चार दिरहम वाजिब । लिहाज़ा तीसरे साल । एक सौ इक्यानवे रहे इनमें भी चार दिरहम वाजिब चहारुम में एक सौ सतासी रहे पन्जुम में एक सौ तिरासी रहे इनमें भी चार – चार दिरहम वाजिब लिहाज़ा कुल इक्कीस दिरहम वाजिबुल अदा हुए ।

मसअला : – अगर दैन से पहले साले निसाब रवाँ था यअनी जारी था तो जो दैन अस्नाए साल में यअनी साल के बीच में किसी पर लाजिम आया इसका साल भी वही करार दिया जायेगा जो पहले से चल रहा है वक्ते दैन से नहीं और अगर दैन से पहले इस जिन्स की निसाब का साले रवी नहीं तो वक्त दैन से शुमार होगा ।

मसअला : – किसी पर दैन कवी या मुतवस्सित है और कर्ज ख्वाह का इन्तेकाल हो गया तो मरते वक़्त इस दैन की ज़कात की वसीयत ज़रूरी नहीं कि इसकी ज़कात वाजिबुल अदा थी ही नहीं और वारिस पर ज़कात उस वक्त होगी जब मूरिस की मौत को एक साल गुज़र जाये और चालीस दिरहम देने कवी में और दो सौ दिरहम देने मुतवस्सित में उसूल हो जायें ।

मसअला : – साल पूरा होने के बाद दाइन ( कर्ज देने वाले ) ने दैन माफ कर दिया या साल पूरा होने से पहले ज़कात का माल हिबा कर दिया तो ज़कात साकित हो गयी । दुई नुसार ) मसमला : – औरत ने महर का रुपया वुसूल कर लिया साल गुजरने के बाद शौहर ने कब्ले दुखूल ( जिमा से पहले ) तलाक दे दी तो निस्फ महर वापस करना होगा और ज़कात पूरे की वाजिब है और शौहर पर वापसी के बाद से साल का एअतिबार है ।

मसअला : – एक शख्स ने यह इकरार किया कि फलाँ का मुझ पर दैन है और उसे दे भी दिया फिर साल भर बाद दोनों ने कहा दैन न था तो किसी पर ज़कात वाजिब न हुई ( आलमगीरी ) मगर जाहिर यह है कि यह उस सूरत में है जबकि इसके ख्याल में दैन हो वरना अगर महज ज़कात साकित करने के लिये यह हीला ( बहाना किया तो इन्दल्लाह यअनी अल्लाह के नज़दीक मुआखज़ा ( पकड़ ) का मुस्तहक है । मसअला : – माले तिजारत में साल गुज़रने पर जो कीमत होगी उसका एअतिबार है मगर शर्त यह है कि शुरूअ साल में उसकी कीमत दो सौ दिरहम से कम न हो और अगर मुख़्तलिफ किस्म के असबाब हों तो सब की कीमतों का मजमूआ साढ़े बावन तोले चाँदी या साढ़े सात तोले सोने की कद्र हो । ( आलमगीरी ) यअनी जबकि उसके पास यही माल हो और अगर उसके पास सोने चाँदी इसके अलावा हो तो उसे मिला लेंगे । मसला : – गल्ला या कोई माले तिजारत साल पूरा होने पर दो सौ दिरहम का है फिर नर्ख ( भाव ) बढ़ – घट गया तो अगर इसी में से ज़कात देना चाहें तो जितना उस दिन यअनी घटने – बढ़ने के दिन था उसका चालीसवाँ हिस्सा दे दें और अगर इस कीमत की कोई और चीज़ देना चाहे तो वह कीमत ली जाये जो साल पूरा होने के दिन थी और अगर वह चीज़ साल पूरा होने के दिन तर यअनी गीली थी अब खुश्क हो गयी जब भी वही कीमत लगायें जो उस दिन थी यअनी साल पूरा होने के दिन और अगर उस रोज़ खुश्क थी अब भीग गयी तो आज की कीमत लगायें । ( आलमगीरी )

मसअला : -कीमत उस जगह की होनी चाहिये जहाँ माल है और अगर माल जंगल में हो तो उस के करीब जो आबादी है वहाँ जो कीमत हो उस का एअतिबार है । ( आलमगीरी ) जाहिर यह है कि यह उस माल में है जिस की जंगल में खरीदारी न होती हो और अगर जंगल में खरीदा जाता हो जैसे लकड़ी और वह चीजें जो वहाँ पैदा होती हैं तो जब तक माल वहाँ पड़ा है वहीं की कीमत लगाई जाये ।

मसअला : – मसाला : – किराये पर उठाने के लिए देते हों उनकी ज़कात नहीं । यूँही किराये के मकान की रक्षामनगौरी ) घोड़े की तिजारत करता है झूल और लगाम और रस्सियाँ वगैरा इसलिये ख़रीदीं कि घोड़ों की हिफाजत में काम आयेंगी तो इनकी जकात नहीं और अगर इसलिये खरीदीं कि घोड़े इनके समेत बेचे जायेंगे तो इनकी भी जकात दे । नानबाई ने रोटी पकाने के लिये लकड़ियाँ खरीदी या रोटी में डालने को नमक खरीदा तो इनकी जकात नहीं और रोटी पर छिड़कने को तिल खरीदे तो तिलों की जकात वाजिब है ।

मसला : – एक शख्स ने अपना मकान तीन साल के लिए तीन सौ दिरहम साल के किराये पर दिया और उसके पास कुछ नहीं है और जो किराये में आता है सब को महफूज रखता है तो आठ महीने गुजरने पर निसाब का मालिक हो गया कि आठ माह में दो सौ दिरहम किराये के हुए । लिहाज़ा आज से जकात का साल शुरू होगा और साल पूरा होने पर पाँच सौ दिरहम की ज़कात दे कि बीस माह का किराया पाँच सौ हुआ अब उसके बाद एक साल और गुजरा तो आठ सौ की जकात दे मगर पहले साल की ज़कात के साढ़े बारह दिरहम कम किये जायें ( आलमगीरी ) बल्कि आठ सौ में चालीस कम की ज़कात वाजिब होगी कि चालीस से कम की ज़कात नहीं बल्कि अफ्व ( माफ ) है ।

मसअला — एक शख्स के पास सिर्फ एक हजार दिरहम हैं और कुछ माल नहीं । उसने सौ दिरहम सालाना किराये पर दस साल के लिये मकान लिया और वह कुल रुपये मालिके मकान को दे दिए तो पहले साल में तो नौ सौ की ज़कात दे कि सौ किराये में गए । दूसरे साल आठ सौ की बल्कि पहले साल की जकात के साढ़े बाइस दिरहम आठ सौ में से कम कर के बाकी की ज़कात दे । इसी तरह हर साल में सौ रुपये और पिछले साल की ज़कात के रुपये कम कर के बाकी की जकात इसके ज़िम्मे है और . मालिके मकान के पास भी अगर इस किराये के हजार के सिवा कुछ न हो तो दो साल तक कुछ नहीं । दो साल गुज़रने पर अब दो सौ का मालिक हुआ । तीन बरस पर तीन सौ की ज़कात दे । यूँही हर साल सौ दिरहम की जकात बढ़ती जायेगी मगर अगली बरसों की ज़कात की मिकदार कम करने के बाद बाकी की ज़कात वाजिब होगी । सूरते मजकूरा में अगर उस कीमत की कनीज़ किराए में दी तो किरायेदार पर कुछ वाजिब नहीं और मालिके मकान पर उसी तरह वुजूब है जो दिरहम की सूरत में है । ( आलमगीरी )

मसअला : – तिजारत के लिए गुलाम कीमती दो सौ दिरहम का दो सौ में खरीदा और कीमत बेचने वाले को दे दी मगर गुलाम पर कब्जा न किया यहाँ तक कि एक साल गुज़र गया अब वह बेचने वाले के यहाँ मर गया तो बेचने वाले और खरीदार दोनों पर दो – दो सौ की ज़कात वाजिब है और अगर गुलाम दो सौ दिरहम से कम कीमत का था और खरीदार ने दो सौ पर लिया तो बेचने वाला दो सौ की ज़कात दे और खरीदार पर कुछ नहीं । ( आलमगीरी )

मसअला : – खिदमत का गुलाम हज़ार रुपये में बेचा और कीमत पर कब्जा कर लिया साल भर बअद वह गुलाम ऐबदार निकला इस बिना पर वापस हुआ काज़ी ने वापसी का हुक्म दिया हो या इसने खुद अपनी खुशी से वापस ले लिया हो हज़ार की ज़कात दे । ( आलमगीरी )

मसला : – रुपये के एवज़ खाना गल्ला कपड़ा वगैरा फकीर को देकर मालिक कर दिया तो जकात अदा हो जायेगी मगर उस चीज़ की कीमत जो बाजार भाव से होगी वह जकात में समझी जायेगी बाहरी खर्चे मसलन बाज़ार से लाने में जो मजदूर को दिया है या गाँव से मंगवाया तो किराया और चुंगी कम न करेंगे या पकवा कर दिया तो पकवाई या लकड़ियों की कीमत मुजरा न करें । बल्कि इस पकी हुई चीज की जो कीमत बाजार में हो उस का एअतिबार है । ( आलमगीरी )

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Published by husainfoundation374

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