हदीस न .1 : – सही बुख़ारी मुस्लिम में अबू हुरैरा रदियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं रोज़ादार ने भूलकर खाया या पिया वह अपने रोज़े को पूरा करे कि उसे अल्लाह ने खिलाया और पिलाया । हवाला बहारे शरीयत
तम्बीह : – इस बाब में उन चीजों का बयान है जिन से रोज़ा नहीं टूटता रहा यह अम्र ( बात ) कि उनसे रोज़ा मकरूह भी होता है या नहीं उससे इस बाब को तअल्लुक नहीं न यह कि फेल जाइज़ है या नाजाइज़ ।
मसअला : – भूलकर खाया या पिया या जिमा किया रोज़ा फासिद न हुआ ख़्वाह वह रोज़ा फ़र्ज़ हो या नफल और रोज़े की नियत से पहले यह चीजें पाई गयीं या बअद में मगर जब याद दिलाने पर भी याद न आया कि रोज़ादार है तो अब फासिद हो जायेगा ब – शर्ते कि याद दिलाने के बअद यह अफआल वाके हुए हों मगर इस सूरत में कफ्फारा लाज़िम नहीं । ( दुरै मुतार , रहुल मुहतार )
मसअला : – किसी रोज़ादार को इन अफआल में देखे तो याद दिलाना वाजिब है याद न दिलाया तो गुनाहगार होगा मगर जबकि वह रोज़ादार बहुत कमज़ोर हो कि याद दिलायेगा तो वह खाना छोड़ देगा और कमज़ोरी इतनी बढ़ जायेगी कि रोज़ा रखना दुश्वार होगा और खा लेगा तो रोज़ा भी अच्छी तरह पूरा कर लेगा और दीगर इबादतें भी ब – खूबी अदा कर लेगा तो इस सूरत में याद न दिलाना बेहतर है । बाज़ मशाइख ने कहा जवान को देखे तो याद दिला दे और बूढ़े को देखे तो याद न दिलाने में हरज नहीं मगर यह हुक्म अकसर के लिहाज़ से है कि जवान अकसर कवी होते हैं और बूढ़े अक्सर कमज़ोर और अस्ल हुक्म यह है कि जवानी और बुढ़ापे को कोई दखल नहीं बल्कि कुब्बत व जुअफ ( कमज़ोरी ) का लिहाज़ है । लिहाज़ा अपर जवान इस कद्र कमजोर हो तो याद न दिलाने में हुरज नहीं और बूढ़ा कवी हो तो याद दिलाना वाजिब । ( रदुल मुहतार )
मसअला : – मक्खी या धूल या गुबार हल्क में जाने से रोज़ा नहीं टूटता ख्वाह वह गुबार आटे का हो कि चक्की पीसने या आटा छानने में उड़ता है या गल्ले का गुबार हो या हवा से ख़ाक उड़ी या जानवरों के खुर या टाप से गुबार उड़ कर हल्क में पहुँचा अगर्चे रोज़ादार होना याद था और अगर खुद कस्दन धुआँ पहुँचाया तो फासिद हो गया जबकि रोज़ादार होना याद हो ख़्वाह वह किसी चीज़ का धुआँ हो और किसी तरह पहुँचाया हो यहाँ तक कि अगर की बत्ती वगैरा खुशबू सुलगती थी उसने मुँह करीब करके धुंए को नाक से खींचा रोज़ा जाता रहा । यूँही हुक्का पीने से भी रोज़ा टूट जाता है अगर रोज़ा याद हो और हुक्का पीने वाला अगर पीये तो कफ्फारा भी लाज़िम आयेगा ।
मसअला :- भरी सिंगी लगवायी या तेल या सुर्मा लगाया तो रोज़ा न गया अगर्चे तेल या सुमें का मज़ा हल्क में महसूस होता ‘ हो बल्कि थूक में सुर्मे का रंग भी दिखाई देता हो जब भी नहीं टूटा । मसला : – बोसा लिया मगर इन्जाल न हुआ तो रोज़ा नहीं । टूटा यूही औरत की तरफ बल्कि उसकी शर्मगाह की तरफ नज़र की मगर हाथ न लगाया और इन्जाल हो गया अगर्चे बार – बार नज़र करने या जिमा वगैरा के ख्याल करने से इन्जाल हुआ अगर्चे देर तक ख्याल जमाने से ऐसा हुआ हो उन सब सूरतों में रोज़ा नहीं टूटा । ( जौहरा , दुरै मुखार )
बहारे शरीयत जिल्द 5
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