बाद तौबा मुरतद और बदमज़हब से निकाह क्या हुकुम है ??जब कोई नाम निहाद सुन्नी किसी मुरतद के यहाँ रिश्ता करना चाहता है तो दुनियादार मौलवी शैतानी फरेब से काम लेता है यानी तौबा कर के निकाह पढ़ा देता है और पैसा लेकर अपना रास्ता पकड़ता है, और तौबा करने वाला मुरतद पहले की तरह ही अपने रास्ते पर रहता हैइस लिए शरीयत का यह हुकुम है कि तौबा के फौरन बाद उससे निकाह नही किया जायेगाबल्कि कुछ दिनों उसे देखा जाएगा कि अपनी तौबा पर क़ायम है या नही ??जैसे कि फ़ासीके मोअलिन तौबा के फौरन बाद इमाम नही बना दिया जाताफतावा रजविया जिल्द 3 सफह 213 में है कि फतावा काज़ी खां फिर फतावा आलमगीरी में है किफ़ासिक़ तौबा कर ले फिर भी उसकी गवाही ना मानी जाएगी जब तक की इतना वक़्त ना गुजर जाये की उसकी तौबा का असर जाहिर होऔर आला हजरत इमाम अहले सुन्नत फ़ाज़िले बरेलवी लिखते है की अमीरुल मोमिनिन हज़रत फारुके आज़म रज़ियल्लाहु अन्हु ने जब “सुबैग” से जिस पर से बवजहे बहस मुतशाबिहात बद मज़हबी का अंदेशा था बाद जरबे शदीद तौबा कर ली । हज़रत अबु मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु के पास फरमान भेजा कि “मुसलमान उसके पास ना बैठे” “उसके साथ खरीद व फरोख्त ना करे” ‘बीमार पड़े तो उसकी अयादत को ना जये’ “और मर जाये तो उसके जनाजे में हाज़िर ना हो”बतामिले हुक्मे अहकाम (इस बड़े हुकुम को मानने के साथ) एक मुद्दत तक यही हाल रहा की सौ आदमी बैठे होते और वह आता सब मुतफ़र्रिक ( तितर बितर) हो जातेजब हज़रत अबु मूसा अशअरी ने अर्ज़ी भेजी की अब उसका हाल अच्छा हो गया है तब इज़ाज़त फरमाई , फतावा रजविया जिल्द 3 सफह 213आला हजरत मुज़दिदे दिनों मिल्लत ने इस वाकिये के सबूत में 5 हदीसे को नकल फरमाया हैदेखिये सुबैग यानी आयते मुतशाबिहात के मिसल में बहस किया करता था जबकि वह मुरतद नही था बल्कि उसके बद मज़हब होने का डर था मगर उसके बावजूद हज़रत उमर फारूक रज़ियल्लाहु अन्हु ने तौबा के बाद भी सख्त बायकाट किया जब तक कि इत्मिनान नही हो गयालिहाज़ा मुरतद और बद मज़हब के तौबा करने के बाद बदर्जये औला (जरूर) कई बरस तक देखा जाएगा जब तक उसकी बात चीत और तौर तरीकों से खूब इत्मिनान ना हो जाये की वह अहले सुन्नत व जमात का हो गया तब उसके साथ निकाह किया जाएगा वरना नहीलिहाज़ा जो सख्स मुरतद या मुरतद्दह को तौबा करने के बाद फौरन उनके साथ अपने लड़के लड़की की शादी करे या जो मौलवी निकाह पढे मुसलमानो को चाहिए कि इनका मज़हबी बायकाट करे । ऐसे दुनियादार मौलवी के पीछे नमाज़ ना पढेबहवाला :- बद मजहबो से रिश्तेसफह :-19 व 20लेखक :- मुफ़्ती जलालुद्दीन अहमद अमज़दी

Published by husainfoundation374

सुन्नी हनफ़ी अहले सुन्नत वल जमात मसलके आला हजरत

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