मसाला : – शयए मरहून ( गिरवी रखी हुई चीज ) की ज़कात न मुरतहिन ( जिस के पास गिरवी रखी गयी ) पर है न राहिन ( गिरवी रखने वाले ) पर । मुरतहिन तो मालिक ही नहीं और राहिन की मिल्के ताम ( यानी पूरा कब्जा ) नहीं कि उसके कब्जे में नहीं और रहन छुड़ाने के बाद भी इन बरसों की जकात वाजिब नहीं । ( दुरै मुख्तार वगैरा )
मसअला :- जो माल तिजारत के लिए खरीदा और साल भर तक उस पर कब्ज़ा न किया तो कब्जे से पहले मुश्तरी ( खरीदार ) पर जकात वाजिब नहीं और कब्जे के बद उस साल की भी ज़कात वाजिब है । दुरै मुद्रतार रहुल मुहतार ) निसाब का दैन से फारिग होना ।
मसला : – निसाब का मालिक है मगर उस पर दैन है कि अदा करने के बाद निसाब नहीं रहती तो ज़कात वाजिब नहीं वाह वह दैन बन्दे का हो जैसे कर्ज ज़रे समन ( कीमत में देने वाला रुपया या सामान ) किसी चीज़ का तावान या अल्लाह तआला का दैन हो जैसे ज़काते खिराज मसलन कोई शख्स सिर्फ एक निसाब का मालिक है और दो साल गुज़र गये कि ज़कात नहीं दी तो सिर्फ पहले साल की ज़कात वाजिब है दूसरे साल की नहीं कि पहले साल की ज़कात इस पर दैन है इसके निकालने के बअद निसाब बाकी नहीं रहती , लिहाज़ा दूसरे साल की ज़कात वाजिब नहीं । यूँ ही अगर तीन साल गुज़र गये मगर तीसरे में एक साल की बाकी थी कि पाँच दिरहम और हासिल हुये जब भी पहले ही साल की ज़कात वाजिब है कि दूसरे और तीसरे साल में ज़कात निकालने के बअद निसाब बाकी नहीं , हाँ जिस दिन कि वह पाँच दिरहम हासिल हुए उस दिन से एक साल तक अगर निसाब बाकी रह जाये तो अब इस साल के पूरे होने पर ज़कात न दी फिर सारे माल को हलाक कर दिया फिर और माल . हासिल किया कि यह बकद्रे निसाब है मगर साले अब्बल की ज़कात जो इसके ज़िम्मे दैन है उसमें से निकालें तो निसाब बाकी नहीं रहती तो इस नये साल की जकात वाजिब नहीं और अगर उस पहले माल को इसने कस्दन ( जानबुझ कर ) हलाक न किया बल्कि बिला कस्द हलाक हो गया तो उसकी ज़कात जाती रही । लिहाज़ा उसकी ज़कात दैन नहीं तो उस सूरत में इस नये साल की ज़कात वाजिब है । ( आलमगीरी , दुल मुहतार )
मसअला : – अगर खुद मदयून ( कर्जदार ) नहीं मगर मदयून का कफील ( ज़मानती ) है और कफालत यानी अगर ज़ैद रुपया नहीं देगा तो मैं ज़िम्मेदार हूँ जिसे जमानत में लेना कहते हैं तो ज़मानत के रुपये निकालने के बाद निसाब बाकी नहीं रहती ज़कात वाजिब नहीं मसलन जैद के पास हज़ार रुयये हैं और अम्र ने किसी से हज़ार कर्ज लिये और ज़ैद ने उसकी कफालत की तो जैद पर इस सूरत में ज़कात वाजिब नहीं कि जैद के पास अगर्चे रुपये हैं मगर अम्र के कर्ज में मुस्तगरक ( घिरे हुए ) हैं कि कर्जख्वाह को इख्तियार है ज़ैद से मुतालबा करे और रुपये न मिलने पर यह इख़्तियार है कि ज़ैद को कैद करा दे तो यह रुपये दैन में मुसतगरक हैं । लिहाज़ा ज़कात वाजिब नहीं और अगर अम्र की दस शख्सों ने कफालत की और सब के पास हज़ार – हज़ार रुएये हैं जब भी उनमें से किसी पर ज़कात वाजिब नहीं कि कर्जख्वाह हर एक से मुतालबा कर सकता है और न मिलने की सूरत में जिस को चाहे कैद करा I ( दुल मुहतार )
मसअला : जो दैन मिआदी हो वह मज़हबे सही में वुजूबे ज़कात का माने नहीं यअनी ऐसा दैन होने पर ज़कात वाजिब रहती है ( रहुल मुहतार ) चूँकि आदतन दैन महर का मुतालबा नहीं होता
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