रोज़ा के अहम मसाइल #5??

ऐ मुसलमानों अल्लाह और रसूल के लिए अपने आप को अपने खानदान और मालोज़र को कुर्बान करने हमेशा तैयार रहो

मसअला :- गुस्ल किया और पानी की खुनकी अन्दर महसूस हुई या कुल्ली की और पानी बिल्कुल फेंक दिया सिर्फ कुछ तरी मुँह में बाकी रह गयी थी थूक के साथ उसे निगल गया या दवा कूटी और हल्क में उसका मज़ा महसूस हुआ या हड़ चूसी और थूक निगल गया मगर थूक के साथ हड़ का कोई जुज़ हल्क में न पहुँचा या कान में पानी चला गया या तिनके से कान खुजाया और उस पर कान का मैल लग गया फिर वही मैल लगा हुआ तिनका कान में डाला अगषे चन्द बार किया कादरी दारुल इशाबत

मक्खी हल्क वहारे शरीअत पाँचवा हिस्सा हो या दाँत या मुँह में खफीफ ( बहुत थोड़ी ) चीज़ मअमूली सी रह गई कि लुआब के साथ खुद ही उतर जायेगी और वह उतर गई या दाँतों में खून निकलकर हल्क तक पहुँचा मगर हल्क से नीचे न उतरा तो उन सब सूरतों में रोज़ा न गया । ( दुरै मुखतार फतहुल कदीर )

मसमला : रोज़ादार के पेट में किसी ने नेज़ा या तीर भोंक दिया अगर्चे उसकी भाल या पैकान ( फल ) पेट के अन्दर रह गई , या उसके पेट में झिल्ली तक ज़ख़्म था किसी ने कंकरी मारी कि अन्दर चली गयी तो रोज़ा नहीं टूटा और अगर खुद उसने यह सब किया और भाल या पैकान या कंकरी अन्दर रह गयी तो जाता रहा । ( दुरै मुख्तर रहुल मुहतार )

मसला : – बात करने में थूक से होंट तर हो गये और उसे पी गया , मुँह से राल टपकी मगर तार टूटा न था उसे चढ़ा कर पी गया नाक में रेठ आ गयी बल्कि नाक से बाहर हो गई मगर मुनकता ( अलग ) न हुई थी कि उसे चढ़ा कर निगल गया या खंकार मुँह में आया और खा गया अगर्चे कितना ही हो रोज़ा न जायेगा मगर इन बातों से एहतियात चाहिये । ( आलमगीरी , दुरै मुरार रहुल मुहतार )

मसअला चली गयी रोजा न गया और कस्दन निगली तो जाता रहा । ( आलमगीरी ) मसअला :- गैरे सबीलैन में जिमा किया ( शर्म गाहों के अलावा मज़ा हासिल किया ) तो जब तक इन्जाल न हो रोज़ा न टूटेगा । यूँही हाथ से मनी निकालने में अगर्चे यह सख्त हराम हैं कि हदीस में उसे मलऊन फ़रमाया । ( दुर मख्तार )

मसअला : चौपाया या मुर्दा से जिमा किया और इन्जाल न हुआ तो रोज़ा न गया और इन्जाल हुआ तो जाता रहा मादा जानवर का बोसा लिया या उसकी फर्ज ( फर्ज पेशाब की जगह ) को छुआ तो रोज़ा न गया अगर्चे इन्ज़ाल हो गया । ( दुरे मुख़्तार ) ( अगर्चे यह काम गैर इस्लामी व नाजाइज़ हैं ( कादरी )

मसला : – एहातेलाम हुआ या गीबत की तो रोज़ा न गया अगर्चे गीबत बहुत सख्त कबीरा गुनाह है कुआन मजीद में गीबत करने की निस्बत ग़ीबत ज़िना से भी सख्त तर है अगर्चे गीबत की वजह से रोज़े की नूरानियत जाती रहती है । ( दुरै मुख्तार वगैरा )

मसअला : – जनाबत की हालत में सुबह की बल्कि अगर्चे सारे दिन जुनुब रहा रोज़ा न गया मगर इतनी देर तक कस्दन ( जान बूझ कर ) गुस्ल न करना कि नमाज़ कज़ा हो जाये गुनाह व हराम है । हदीस में फरमाया कि जुनुब ( वे – गुस्ला ) जिस घर में होता है उसमें रहमत के फ़रिश्ते नहीं आते । ( दुरै मुखवार ) मसला : – जिन्न यअनी परी से जिमा किया तो जब तक इन्जाल न हो रोज़ा न टूटेगा । ( रडुल मुहतार ) यअनी जबकि इन्सानी शक्ल में न हो और इन्सानी शक्ल में हो तो वही हुक्म है जो इन्सान से जिमा करने का है ।

मसला : – तिल या तिल के बराबर कोई चीज़ चबाई और थूक के साथ हल्क से उतर गई तो रोजा न गया मगर जबकि उसका मज़ा हल्क में महसूस होता हो तो रोज़ा जाता रहा ! ( फतहुल कदीर )

हवाला बहारे शरीयत जिल्द 5

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Published by husainfoundation374

सुन्नी हनफ़ी अहले सुन्नत वल जमात मसलके आला हजरत

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