उन सूरतों का बयान जिन में कफ्फारा भी लाज़िम है
मसाला : – रमज़ान में रोज़ादार मुकल्लफ मुकीम ने कि अदाए रमज़ान के रोजे की नियत से रोज़ा रखा और किसी आदमी के साथ जो काबिले शहवत है उसके आगे – पीछे के मकाम में जिमा किया इन्जाल हुआ हो या नहीं या उस रोज़ादार के साथ जिमा किया गया या कोई गिजा या दवा खाई या पानी पिया या कोई चीज लज्जत के लिए खाई या पी या कोई ऐसा फेल ( काम ) किया जिससे इफ्तार का गुमान न होता हो और उसने गुमान कर लिया कि रोज़ा जाता रहा फिर जानबूझ कर खा पी लिया मसलन फस्द या पछना लिया या सुर्मा लगाया या . जानवर से वती की या औरत को छुआ या बोसा लिया या साथ लिटाया या मुबाशरते फाहिशा की मगर इन सब सूरतों में इन्जाल न हुआ या पाखाने के मकाम मे अन्दर खुश्क उंगली रखी अब इन अफआल ( कामों ) के बाद कस्दन खा लिया तो इन सब सूरतों में रोजे की कजा और कफ्फारा दोनों लाज़िम है और अगर उन सूरतों में कि इफ्तार का गुमान न था और उसने गुमान कर लिया अगर किसी मुफ्ती ने फतवा दे दिया था कि रोज़ा जाता रहा और मुफ्ती ऐसा हो कि अहले शहर का उस पर एअतिमाद हो उसके फतवा देने पर उसने कस्दन खा लिया या उसने कोई हदीस सुनी थी जिसके सही मना न समझ सका और उस गलत मना के लिहाज से जान लिया कि रोज़ा जाता रहा और कस्दन खा लिया तो अब कफ्फारा लाजिम नहीं अगर्चे मुफ्ती ने गलत फतवा दिया या जो हदीस उसने सुनी साबित न हो । ( दुई मुगार मगरा )
मसाला : – जिस जगह रोजा तोड़ने से कफ्फारा लाज़िम आता है उसमें शर्त यह है कि रात ही से रमज़ान के रोजे की नियत की हो अगर दिन में नियत की और तोड़ दिया तो कफ्फारा लाज़िम नहीं ।
मसअला : – मुसाफिर सुबहे सादिक के बद जहवए कुबरा से पहले वतन को आया और रोजे की नियत कर ली फिर तोड़ दिया या मजनून इस वक़्त होश में आया और रोजे की नियत कर के फिर तोड़ दिया तो कफ्फारा नहीं । ( आलमगीरी )
मसअला : – कफ्फारा लाज़िम होने के लिए यह भी ज़रूरी है कि रोज़ा तोड़ने के बाद कोई ऐसा काम न हुआ हो जो रोजे के मुनाफी खिलाफ हो या बगैर इख्तियार ऐसा काम न पाया गया हो जिसकी वजह से रोजा इफ्तार करने ( तोड़न ) की रुखसत होती मसलन औरत को उसी दिन हैज़ या निफास आ गया या रोजा तोड़ने के बअद उसी दिन ऐसा बीमार हो गया जिसमें रोजा न रखने की इजाज़त है तो कफ्फारा साकित है और सफर से साकित न होगा कि यह इख्तियारी अम्र ( काम ) है यअनी अगर कोई जानबूझ कर रमज़ान शरीफ का रोज़ा रख कर बिला वजहे शरई तोड़ दे फिर ख्याल करके मुझ पर कफ्फारा फर्ज़ न हो शरई सफर में चला जाये मसलन बरेली शरीफ से मारहरा शरीफ सफर करे बीच में कहीं न रुके जब भी कफ्फारा फर्ज़ है इसलिए कि उस शख्स ने यह सफर खुद से इख्तियार किया ताकि अपनी . हरामकारी पर सज़ा पाने से बच जाये मगर बचेगा हरगिज़ नहीं । यूँही अगर अपने को ज़ख्मी कर लिया और हालत यह हो गई कि रोज़ा नहीं रख सकता कपफारा साकित न होगा । ( जौहरा )
मसला : – वह काम किया जिससे कफ्फारा वाजिब होता है फिर बादशाह ने उसे सफर पर मजबूर किया कफ्फारा न होगा । ( आलमगीरी ) मसला : – मर्द को मजबूर करके जिमा कराया या औरत को मर्द ने मजबूर किया फिर जिमा ही के दरमियान में अपनी खुशी से मशगूल रहा या रही तो कफ्फारा लाज़िम नहीं कि रोज़ा तो पहले ही – टूट चुका है । ( जौहरा ) मजबूरी से मुराद इकराहे शरई है जिसमें कत्ल या उज्व काट डालने या ज़र्वे शदीद ( बहुत सख्त मार ) की सही धमकी दी जाये और रोज़ादार भी समझे कि अगर मैं इस का कहना न मानूँगा तो जो कहता है कर गुजरेगा ।
मसअला : -कफ्फारा लाज़िम होने के लिए भर पेट खाना ज़रूरी नहीं थोड़ा सा खाने से भी वाजिब हो जायेगा । ( जौहरा )
मसअला : – तेल लगाया या गीबत की फिर यह गुमान कर लिया कि रोज़ा जाता रहा या किसी आलिम ही ने रोज़ा जाने का फतवा दे दिया अब उसने खा पी लिया जब भी कफ्फारा लाज़िम है । दुरै मुखतार ) मसला : – ” के ” आयी या भूलकर खाया पिया या जिमा किया और इन सब सूरतों में उसे मलूम था कि रोजा न गया फिर उसके बाद खा लिया तो कफ्फारा लाज़िम नहीं और अगर एहतिलाम हुआ और उसे मलूम था कि रोज़ा न गया फिर उसके बाद खा लिया तो कफ्फारा लाज़िम है । ( हुल मुहतार )
मसला : – जिन सूरतों में रोज़ा तोड़ने पर कफ्फारा लाज़िम नहीं उनमें शर्त है कि एक ही बार ऐसा हुआ हो और मअसीयत ( गुनाह ) का इरादा न किया हो वरना उनमें कफ्फारा देना होगा ( दुरै मुरार )
मसला : – कच्चा गोश्त खाया अगर्चे मुदीर का हो तो कफ्फारा लाज़िम है मगर जबकि सड़ा हो या उसमें कीड़े पड़ गये हों , तो कफ्फारा नहीं । ( हुल मुहतार )
हवाला :- बहारे शरीयत जिल्द 05
