हदीस :- इने माजा हज़रते अनस रदियल्लाहु तआला अन्हु से रावी कहते हैं रमज़ान आया तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया यह महीना आया इसमें एक रात हज़ार महीनों से बेहतर है जो इससे महरूम रहा हर चीज़ से महरूम रहा और उसकी खैर से वही महरूम होगा जो पूरा महरूम है ।
मसअला : – दिन में नियत करे तो यह ज़रूर है क यह नियत करे कि मैं सुबहे सादिक से रोज़ादार हूँ और अगर यह नियत है कि अब से रोज़ादार हूँ सुबह से नहीं तो रोज़ा न हुआ । ( जौहरा , रदुल मुहतार )
मसअला :- अगर्चे उन तीन किस्म के रोज़े की नियत दिन में भी हो सकती है मगर रात में नियत कर लेना मुसतहब है । ( जौहरा ) यूँ नियत की कि कल कहीं दवत हुई तो रोज़ा नहीं और न हुई तो रोज़ा है यह नियत सही नहीं बहरहाल वह रोज़ादार नहीं । ( आलमगीरी )
मसला : — रमज़ान के दिन में न रोजे की नियत है न यह कि रोज़ा नहीं अगर्चे मालूम है कि यह महीना रमज़ान का है तो रोज़ा न हुआ । ( आलमगीरी )
मसअला : – रात में नियत की और फिर उसके बअद रात ही में खाया पिया तो नियत जाती न रही वही पहली काफ़ी है फिर से नियत करना ज़रूरी नहीं । ( जौहरा ) मसअला : – हैज व निफास वाली थी उसने रात में कल रोज़ा रखने की नियत की और सुबहे सादिक से पहले हैजे व निफास से पाक हो गई तो रोज़ा सही हो गया । ( जौहरा )
मसअला :- दिन में वह नियत काम की . है कि सुबहे सादिक से नियत करते वक़्त तक रोज़े के खिलाफ कोई अम्र ( काम ) न पाया गया हो । लिहाज़ा अगर सुबहे सादिक़ के बअद भूलकर पी लिया हो या जिमा ( हमबिस्तरी ) कर लिया तो अब नियत नहीं हो सकती । ( जौहरा ) मगर मोअतमद . यह है कि भूलने की हालत में अब भी नीयत सही है । ( रदुल मुहतार )
मसअला : – जिस तरह नमाज़ में कलाम की नियत की मगर बात न की तो नमाज़ फ़ासिद न होगी यूँही रोज़ा में तोड़ने की नियत से रोज़ा नहीं टूटेगा जब तक तोड़ने वाली चीज़ न करे । ( जौहरा )
मसअला : – अगर रात में रोज़े की नियत की फिर पक्का इरादा कर लिया कि नहीं रखेगा तो वह नियत जाती रही अगर नई नियत न की और दिन भर भूका प्यासा रहा और जिमा ( हमबिस्तरी ) से बचा तो रोज़ा न हुआ । ( दुरै मुखयार रहुल मुहतार )
मसअला :- सहरी खाना भी नियत है ख्वाह रमज़ान के रोज़े के लिए हो या किसी और रोजे के लिए मगर जब सहरी खाते वक़्त यह इरादा है कि सुबह को रोज़ा न होगा तो सहरी खाना नियत नहीं । ( जौहरा रहुलमुहतार )
मसअला : – रमज़ान के हर रोज़े के लिए नई नियत की ज़रूरत है पहली या किसी तारीख में पूरे रमज़ान के रोजे की नियत कर ली तो यह नियत सिर्फ उसी एक दिन के हक में है बाकी दिनों के लिए नहीं । ( जौहरा )
मसअला : – यह तीनों यअनी रमज़ान के अदा और नफ्ल व नज़रे मुअय्यन मुतलकन रोजे की नियत से हो जाते हैं खास इन्हीं की नियत ज़रूरी नहीं । यूँही नफ़्ल की नियत से भी अदा हो जाते हैं बल्कि गैरे मरीज़ व गैरे मुसाफ़िर ने रमज़ान में किसी और वाजिब की नियत की जब भी उसी रमज़ान का होगा । ( दुरै मुख्तार वगैरा )
हवाला बहारे शरीयत हिंदी जिल्द 05 पेज 74
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