यूं तो अल्लाह के तमाम ही नामों को जब भी मखलूक (इंसानों) के लिए इस्तेमाल करें तो “”अब्द”” के साथ ही इस्तेमाल करना चाहिए बिना लफ्ज़ “”अब्द”” लगाए पुकारना मना है
लेकिन अल्लाह के 5 सिफ़ाती नाम ऐसे हैं जिन के बारे में ये जानते हुवे के ये नाम बिना “अब्द” के किसी बन्दे को कहना कुफ्र है ,ये जानते हुवे किसी ने इस्तेमाल किया तो वो काफिर हो जायेगा वो 5 नाम ये हैं
खालिक, कुद्दुस, रहमान, रज़्ज़ाक,कय्यूम,
इन नामों को बिना अब्द लगाए पुकारना कुफ्र है मिसाल के तौर पर किसी का नाम “अब्दुल कय्यूम है” तो उसे कय्यूम कह कर पुकारना कुफ्र है
हां अगर किसी को ये मसला मालूम नहीं और उस ने बिना “”अब्द”” के इन नामों को किसी मखलूक के लिए पुकारा तो अब हराम होगा
समीअ (सुनने वाला) बसीर (देखने वाला) अल्लाह तआला की भी सिफत है और ये ही सिफत बंदों में भी पाई जाती है ,,
अल्लाह की सिफत और बन्दे की सिफत में फ़र्क है
❤👉 अल्लाह तआला की तमाम सिफत उस की ज़ाती (यानी खुद की) हैं उसे किसी ने दिया नहीं,,,, जब की बन्दों की सिफत अताई (यानी अल्लाह की दी हुई ) हैं ,। बन्दे अपनी सिफत में अल्लाह के मोहताज है और अल्लाह अपनी सिफत में किसी का मोहताज नहीं,
📓👉 बन्दे की सिफत महदुद (यानी उस की एक हद,सीमा,रेखा,लिमिट ) है,,,, जबकि अल्लाह की सिफत ला महदुद है यानी उस की कोई हद लिमिट नहीं
💚 👉 अल्लाह की सिफत हमेशा से है,जब की बन्दे की सिफत हमेशा से नहीं,
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अबु दाऊद की हदीस में है प्यारे आका صلی اللہ علیہ وسلم ने इरशाद फ़रमाया अपने मरने वालों पर सुरए यासीन पढ़ो इस लिए मौत के वक़्त सकरात की हालत में यासीन शरीफ पढ़ी जाती है इस से मौत की सख़्ती कम होती है
❤👉 सुरए यासीन शरीफ मक्का में उतरी इस में 5 रुकु 83 आयतें 729 कलिमे और 3000 हर्फ हैं, तिरमिज़ी की हदीस में है प्यारे आका ने इरशाद फ़रमाया हर चीज के लिए दिल है और क़ुरआन का दिल यासीन है और जिस ने यासीन पढ़ी अल्लाह तअाला उस के लिए 10 बार क़ुरआन पढ़ने का सवाल लिखता है
यासीन शरीफ की फजीलत 👉 जो शख्स हर जुमा को अप ने वालिदैन (मां बाप) या दोनों में से एक की जियारत के लिए उन की क़ब्र पर जाए और सुरए यासीन पढ़े तो उन के इतने गुनाह बख़्श दिए जाएंगे जितने हर्फ इस आयत में है
हज़रत अली फरमाते हैं यासीन शरीफ को बीमार पढ़े तो शिफा पाए यासीन शरीफ को जिस की कोई चीज गुम जाए वो पढ़े तो वो चीज़ मिल जाए
इस की एक आयत سلم قول من رب الرحیم۔ 1469 मर्तबा पढ़ो ,इंशाअल्लाह जिस मकसद से पढ़ा जाएगा मुराद पूरी होगी,
👉 अगर कोई मुसलमान कुछ गुनाह के काम करता था अब उस ने अपने गुनाह से तौबा कर ली और उस काम को छोड़ दिया, तो उस मुसलमान को उस पिछले गुनाह की वजह से शर्मिंदा करना और ताना देना और बदनाम करना सख़्त हराम और बहुत बड़ा गुनाह है
🔴👉 हज़रत मआज़ बिन जबल رضی اللہ عنہٗ से रिवायत प्यारे आका ने इरशाद फ़रमाया जो अपने मुसलमान भाई को किसी ऐसे गुनाह पर शमिंदा करे जिस गुनाह से उस ने तौबा करली है तो वो मरेगा नहीं जब तक के खुद उस गुनाह में मुब्तला ना हो जाए
(फ़तावा रज़विया जिल्द 10/599)
अल्लाहु अकबर , इस हदीस से वो लोग सबक लें और खौफ करें जो उन मुसलमान भाई या बेहन को जिन्होंने अपने गुनाहों से तौबा करली है उन्हें उस पहले किए हुवे गुनाह के लिए ताना देते है और बदनाम करते हैं याद रखो मेरे प्यारे आका के फरमान के मुताबिक मरने से पहले आप खुद वो गुनाह करने लगोगे ये दुनिया में सज़ा है और मरने के बाद अल्लाह का जो सख़्त अज़ाब होगा वो अलग है
और फिर जो भाई और बहन गुनाह से तौबा कर लेते है उन के लिए क़ुरआन में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त इरशाद फ़रमाया ” ان للہ يغفر الذنوب جمیعا “ बेशक अल्लाह तआला तौबा के बाद तमाम गुनाह बख़्श देता है,,
और हदीसे पाक में है
التائب من الذنب کم لا ذنب لہ गुनाह से तौबा करने वाला ऐसा है जैसे उस ने गुनाह किया ही नहीं,
🌹👉 तो जब अल्लाह तौबा करने वालों के गुनाहों को माफ़ फरमा देता है और वो गुनाहों से पाक और साफ हो जाता है तो बन्दों को क्या हक के वो उसे ताना दें या शर्मिंदा करें
तौबा का मतलब भी समझ लो 👉👉तौबा का मतलब है सच्चे दिल से अपने गुनाहों पर शर्मिंदा होना और आइंदा कभी भी उस गुनाह को ना करने का अहद (पक्का इरादा) करना और उस गुनाह को छोड़ना ,,
note इस पोस्ट में दूसरे के पुराने गुनाह जिसकी तौबा वह शख्स कर चुका है के मुत्तालिक जानकारी है पढ़े जरूर । पोस्ट को पढ़ने के बाद दूसरे मुस्लिम भाइयो और बहनों तक जरूर शेयर करे , शेयर करने से ज्यादा से ज्यादा लोगों के इल्मे दिन में इज़ाफ़ा होगा अल्लाह आप को इसकी बेहतर जज़ा देगा इंशाअल्लाह
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गवर्नमेंट इदारे (Office) में अफसर (Officer) और आम मुलाज़िम (Workers) सबका मख़सूस (खास) वक़्त का इजारा (काम, एकाधिकार) होता हैं और हर एक को पूरी ड्यूटी देना ज़रूरी होता हैं, कई बार अफ़सर वक़्त से पहले चला जाता हैं और अपने मातहत (उसके निचे) काम करने वाले मुलाज़िम से भी कहता हैं तुम भी जाओ तो जल्दी चले जाने की वजह से अफसर गुनहगार होगा और अगर मुलज़िम भी चले गए तो वो भी गुनाहगार होंगे लिहाज़ा वाजिब हैं की काम हो याना हो इजारा का वक़्त पुरा करे
नोट:- जो भी इस तरह जल्दी जाएगा उसे तनख़्वाह (Salary) से कटौती करानी होगी
तनख़्वाह (Salary) ज़ियादा कराने और ओहदे वग़ैरह में तरक्की करवाने (Promotion) के लिए जाली (नक़्ली) सनद (जैसे दस्तावेज़, डिग्री आदि) काम में लेना नाजाइज़ व गुनाह है क्योंकि ये झूट और धोके पर मब्नी हैं (झूट बोलना और धोखा देना हैं)
इसका एक और नुकसान ये हैं की जब हक़ीक़त सामने आएगी तो हो सकता हैं आप अपनी नौकरी से हाथ धो बैठें, आपको जेल तक हो जाए और हो सकता हैं आपकी वजह से इस्लाम और मुस्लिम्स बदनाम हों
पता ये चला की इससे दोनों जहाँ में हमारा ही नुकसान हैं
अल्लाह तआला रहमान और रहीम है और सब से बढ़कर रहम करने वाला है और उस के प्यारे रसूल صلی اللہ علیہ وسلم तमाम आलम के लिए रहमत हैं इस लिए इस्लाम जो अल्लाह का भेजा हुआ और रसूल का लाया हुए दीन (मजहब) है वो रहमत वाला दीन है ,इस लिए इस्लाम में जानवरों के भी कुछ हक हैं जिन का अदा करना हर मुसलमान पर ज़रूरी है
🌹 (1) 👉 जो पाल्तू जानवर काम करते हैं उन को घास और चारा और पानी देना “फ़र्ज़” है और उन की ताकत से ज़्यादा काम उन से काम लेना या भूूका प्यासा रखना और बिना वजह ख़ासकर उन के चेहरे पर मारना गुनाह और नाजाइज है
🌹 (2) 👉 परिंदों के बच्चों को घोंसलों से निकाल लेना या परिंदों (चिड़िया वगैरा) को पिंजरे में कैद कर लेना और बिना ज़रूरत उन परिंदों के मां बाप और जोड़ें को दुख पहुंचाना बहुत बड़ी बे रहमी और ज़ुल्म है जो हर मुसलमान के लिए जाइज नहीं
🌹👉 कुछ लोग किसी जानदार को बांध कर लटका देते हैं और उस पर गुलेल या बन्दूक से निशाना लगाने की प्रैक्टिस करते हैं ये भी बहुत बड़ी बेरहमी और ज़ुल्म है और मुसलमान के लिए हराम है
🌹👉 जिन जानवरों का गोश्त खाना हराम है ,जब तक वो जानवर तकलीफ़ ना पहुंचाए बिना ज़रूरत उन को क़त्ल करना मना है🌹
👉 जिन जानवरों का गोश्त खाना जाइज है ,,, उन को भी सिर्फ खाने या फायदा उठाने के लिए क़त्ल कर सकते हैं,, सिर्फ खेल कूद के लिए बिना ज़रूरत किसी जानवर को क़त्ल करना मुसलमान के लिए जाइज नहीं
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📗 सवाल / Question (1) नमाज़े जुमा की कितनी शर्त है(यानी नमाज़े जुमा कायम करने की शर्त)
सवाल (2) नमाज़े जुमा की फ़र्ज़ होने कितनी शर्त है(यानी नमाज़े जुमा पढ़ने की शर्त)
हदीस मुबारक तिर्मिज़ी रावी है कि यज़ीद इब्ने अबी मरियम कहते है कि मैं जुमे को जाता था उबाया इब्ने रिफाआ इब्ने राफेआ मिले उन्होंने कहा कि तुम्हें बशारत { खुशखबरी } हो तुम्हारे यह कदम अल्लाह की राह में है । मैने अबु अब्स को कहते सुना की रसूलल्लाह सल्लाहु ताअला अलैहि व सल्लम ने फरमाया जिसके कदम अल्लाह की राह में गर्द आलूद हो वह आग पर हराम है और बुखारी शरीफ की रिवायत मे यु है कि अबु उबाया यह कहते है मैं जुमे को जा रहा था अबु अब्स रदियल्लाहु ताअला अन्हु मिले और हुजूर सल्लाहु ताअला अलैहि व सल्लम का इरशाद सुनाया
हवाला 👉 बाहरे शरीयत हिंदी जिल्द 4 सफ 74 हदीस न 23
नोट:- यहाँ से मालूम हुआ की जुमे की नमाज़ के किस कद्र फ़ज़ाएल है
तफसीलीजवाब। ( सवाल 1 )
1⃣👉 जुमा कायम करने की 6 शर्त है उनमे एक भी शर्त मफकुद हो यानी ना पायी जाये तो होगी ही नही
1⃣👉 मिस्र ( शहर ) की ताअरीफ व अहकाम 2⃣👉 सुल्ताने इस्लाम या उसका नाइब 3⃣👉 वक्ते जोहर 4⃣ 👉 खुतबा 5⃣👉 जमाअत 6⃣👉 इज़्ने आम
हवाला :- (1) , बाहरे शरीयत हिंदी सफ 78 से 82 हवाला (2) निजामे शरीअत सफ 190 से 193
तफसीली जवाब (सवाल 2)
👉 नमाज़े जुमा फ़र्ज़ होने के लिए 1⃣1⃣शर्ते है इनमें से एक भी ना पायी जाए तो फ़र्ज़ नही फिर भी अगर पढ़ेगा तो हो जाएगी बल्कि मर्द ,आकिल, बालिग के लिए जुमा पढ़ना अफ़ज़ल है और औरत के लिए जोहर पढ़ना अफ़ज़ल है हा औरत का मकान मस्ज़िद से बिल्कुल मिला हुआ है की घर मे इमामे मस्ज़िद की इक्तिदा कर सके तो उस के लिये भी जुमा पढ़ना अफ़ज़ल है और नाबालिग ने जुमा पढ़ा तो नफ़्ल है उस पे जुमा फ़र्ज़ नही है शर्ते यह है कि 👇
1⃣👉 शहर में मुक़ीम होना
2⃣👉 सेहत यानी मरीज पर जुमा फ़र्ज़ नही
3⃣👉 आज़ाद होना
4⃣👉 मर्द होना
5⃣👉 बालिग होना
6⃣👉 आक़िल होना
(शर्त 5 व 6 खास जुमे के लिए नही बल्कि हर इबादत के वुज़ूब में जरूरी है)
7⃣👉 अखियारा होना
(एक चश्म यानी काना और जिसकी निगाह कमज़ोर हो उस पर जुमा फ़र्ज़ है यु ही जो अंधा मस्ज़िद में आज़ान के वक्त बा वजू हो उस पर भी जुमा फ़र्ज़ है । और वह नाबीना जो खुद मस्ज़िद बिना तकल्लुफ़ ना जा सकता हो । अगरचे मस्ज़िद ले जाने वाले हो उजरते मिस्ल यानी इस काम के लिए मुनासिब उज़रत हो उस उजरत पे ले जाइए बिला उजरत के ले जाये उस पर जुमा फ़र्ज़ नही)
8⃣👉 चलने पर कादिर होना
(अपाहिज पर जुमे फ़र्ज़ नही : अगरचे कोई ऐसा हो की उसे उठा कर मस्ज़िद में रख आएगा)
9⃣👉 कैद में ना होना
1⃣0⃣👉 बादशाह या चोर वगैरा किसी जालिम का ख़ौफ़ ना होना
1⃣1⃣ 👉 मेह ( बारिश ) या आंधी या तूफान या सर्दी या ओला का ना होना यानी इन से नुक़सानात का ख़ौफ़े सही होना
हवाला :- (1) बाहरे शरीयत हिंदी जिल्द 4 सफ 82 से 84 हवाला :- (2) निजामे शरीयत सफ 193 व 194
*note इस पोस्ट में नमाज़े जुमा की अहमियत के मुत्तालिक जानकारी है पढ़े जरूर । पोस्ट को पढ़ने के बाद दूसरे मुस्लिम भाइयो और बहनों तक जरूर शेयर करे , शेयर करने से ज्यादा से ज्यादा लोगों के इल्मे दिन में इज़ाफ़ा होगा अल्लाह आप को इसकी बेहतर जज़ा देगा इंशाअल्लाह
🔮 हकिमुल उम्मत मुफ्ती अहमद यार खां नईमी फरमाते हैं 👉 सदकए वाजिब करने की दो हिकमतें है (1) रोजेदार की रोज़े की कोताहियों की माफ़ी (2) मसाकीन (गरीबों) की रोज़ी का इंतेज़ाम
🌹 कोशिश किया करें के गरीब ज़रूरत मंद को ढूंढ कर दें,और बेहतर है के अनाज की जगह रुपया दें
📚 सवाल /1/ 👉 सदकए फित्र वाजिब है या फर्ज या नफ्ल?
🔮 जवाब 👉 सदकए फित्र वाजिब है
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📚 सवाल /2/ 👉 सदक़ए फ़ित्र कब वाजिब होता है
💚जवाब 👉ईद के दिन सुबह सादिक तुलुअ होते ही (यानी फज्र का वक़्त होते ही) सदकए फित्र वाजिब हो जाता है, लिहाज़ा अगर बच्चा इस वक़्त से पहले पैदा हुआ तो उस की जानिब से भी सदकए फित्र निकालना वाजिब है (फतावा फैजुररसुल 1/507 । बहारे शरीअत 5/55)
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📚 सवाल /3/ 👉 सदकए फित्र किस पर वाजिब है
🔮 जवाब 👉 सदकए फित्र हर मुसलमान आज़ाद साहिबे नीसाब पर वाजिब है जिस की निसाब हाजते अस्लिया से फ़ारिग हो 🔴 सदकए फित्र और ज़कात के वाजिब होने में फ़र्क है 👉 सदकए फित्र वाजिब होने के लिए माल का नामी होना ज़रूरी नहीं यानी अगर किसी के पास सोना चांदी या माले तिजारत नहीं है लेकिन इस के सिवा हाजते अस्लिया से ज़्यादा कोई माल या सामान है मिसाल के तौर पर तांबा पीतल के बर्तन वगैरा और उन की कीमत सोना चांदी के निसाब के बराबर हो तो इन की वजह से सदकए फितर वाजिब हो जाएगा मगर ज़कात वाजिब नहीं होगी।(फतावा फैजूर्रसुल 1/506 बहारे शरीयत 5/55
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📚 सवाल /4/ 👉 सदकए फित्र की मिकदार कितनी है
💚 जवाब 👉 आला तहकीक ये है के 2 किलो करीब 47 ग्राम गेहूं है (कहीं 45 ग्राम भी आया है) फ़तावा फैजुरसुल 1/510
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📚 सवाल /5/ 👉क्या मर्द मालिके निसाब पर अपने नाबालिग छोटे बच्चे की तरफ से सदकए फित्र देना वाजिब है
🔮 जवाब 👉जी हां मर्द मालीके निसाब पर अपनी तरफ से और अपने छोटे बच्चे की तरफ से वाजिब है
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📚 सवाल /6/ 👉 सदकए फित्र ईद के दिन अदा नहीं कर पाए तो क्या बाद में अदा कर सकते हैं
🔮 जवाब 👉 सदकए फित्र का वक़्त उम्र भर है अगर अदा नहीं किया हो तो अब अदा करे और जब भी अदा करेगा अदा ही है कज़ा नहीं है ,, “हां ईद की नमाज़ से पहले अदा करना सुन्नत है” फैजुररसुल 1/510 बहारे शरीयत 5/55
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जवाब ::- माँ बाप के साथ हुस्ने सुलूक से पेश आना वाज़िब है
📚 क़ुरआन शरीफ़ में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने इरशाद फ़रमाया👉 “मां बाप के साथ अच्छा सुलूक करो.तेरे सामने उन में से एक या दोनों बुढ़ापे को पहुंचे तो उन से “उफ़” ना कहना ना झिड़कना और उन से ताज़ीम से बात करना, और उन के लिए आजिज़ी करना ,और अर्ज़ करना ए मेरे रब तू इन दोनों पर रहम कर जैसे इन दोनों ने मुझे बचपन में पाला
🌹👉 हदीस शरीफ़ में है के एक शख्स ने अर्ज़ किया या रसुलल्लाह अलैहिस्सलाम मेरे सिलए रहम और अच्छे अख्लाक का सब से ज़्यादा हकदार कौन है ,उस शख्स ने तीन बार सवाल दोहराया और प्यारे आका ने हर बार फ़रमाया “तेरी मां” चौथी बार पूछने पर फ़रमाया तेरा बाप (मिश्कात शरीफ)
💐👉 एक शख्स ने अर्ज़ की मेरे ऊपर मां बाप का क्या हक है प्यारे आका ने पूछने वाले से फ़रमाया :- वो तेरी जन्नत हैं या दोज़ख़ यानी तू उन के साथ अच्छा सुलूक करेगा तो जन्नत पाएगा और बुरा सुलूक करेगा तो जन्नम में जाएगा
note:- तो देखा आप ने माँ बाप की क्या अहमियत है इस लिए हम सब को चाहिए कि माँ बाप से अच्छे से पेश आये । पोस्ट को पढ़ने के बाद दूसरे मुस्लिम भाइयो और बहनों तक जरूर शेयर करे , शेयर करने से ज्यादा से ज्यादा लोगों के इल्मे दिन में इज़ाफ़ा होगाअल्लाह आप को इसकी बेहतर जज़ा देगा इंशाअल्लाह
🌹जवाब 👉 किसी चीज़ में ऐब हो तो बेचते वक़्त खरीदने वाले को आगाह कर देना ज़रूरी है ,ऐब को छुपाकर चीज़ को बेचना ये ग्राहक को धोका देना है
और हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने ऐसे कारोबार करने वालों के लिए वईद बयान फरमाई है
हज़रत वायेला रदियाल्लहो अनहो फरमाते हैं के मैंने हुज़ूर अलैहिस्सलाम को इरशाद फ़रमाया हुवे सुना के जिस ने कोई ऐब वाली चीज़ बेची और ऐब को ज़ाहिर नहीं किया वो हमेशा अल्लाह के ग़ज़ब में रहेगा और फरिश्ते उस पर लअनत करते हैं (इब्ने माजा जिल्द 2 पेज 262)
🌹👉 हुज़ूर सदरूअश्शरीआ बहारे शरिअत में फरमाते हैं, माल में ऐब हो तो उस का ज़ाहिर कर देना वाजिब है छुपाना हराम और गुनाहे कबीरा है (बहारे शरिअत हिस्सा 11,, फतावा मुशाहिदी पेज 78)
note:-पोस्ट को पढ़ने के बाद दूसरे मुस्लिम भाइयो और बहनों तक जरूर शेयर करे , शेयर करने से ज्यादा से ज्यादा लोगों के इल्मे दिन में इज़ाफ़ा होगा अल्लाह आप को इसकी बेहतर जज़ा देगा इंशाअल्लाह
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✍🏻जवाब 👉🏻हाथों में डोरे (लाल पीले धागे) जो मज़ारों के ख़ादिम और मुजाविर हमको पहनाया करते हैं इनको नही पहनना चाहिए ऐसा काम गैर मुस्लिमों के बाबा संत साधु लोग करते थे वो तीर्थ यात्रियों के हाथ में डोरे बांधा करते है हमें काफिर, दीग़र ग़ैर मुस्लिमों के तरीक़े को अपनना नहीं चाहिए और ऐसे कामों से बचना चाहिए
हाथों में ना डोरे बांधे ना कड़े पहने और नाहि किसी मुस्लिम को पहनाए
ध्यान दें:- 👇👇👇
हम जिस दीन दिल से ये मान ले की ख़ुदा ने और रसूल ने जो हुक्म हमको दिए हैं उसमें हमारा बाल की नोक बराबर भी नुकसान नहीं हैं और शरीअत पे अमल करना शुरू करदे तो कसम हैं उस ख़ालिक़े कायनात की, वो दीन दूर नहीं हैं की पूरी दुनियाँ पे मुसलमानों की हुकूमत होगी और ग़ैर मुस्लिम हमारे बताए तरीके पे चलते दिखाई देंगे
“आज भी हो जो इब्राहिम सा ईमाँ पैदा,आग पैदा कर सकती हैं अंदाज़े गुलिस्तां पैदा”
note:- पोस्ट को पढ़ने के बाद दूसरे मुस्लिम भाइयो और बहनों तक जरूर शेयर करे , शेयर करने से ज्यादा से ज्यादा लोगों के इल्मे दिन में इज़ाफ़ा होगा अल्लाह आप को इसकी बेहतर जज़ा देगा इंशाअल्लाह
मज़ारों पे ताजीमी सजदा करना नाजाइज़ (हराम) है और उनको छूना चूमना मुनासिब (सही) नही ) है । औऱ ईबादती सज्दा करना कुफ्र है
ध्यान दें 👇👇👇👇 1) ख़ुदा के आलावा किसी को भी सजदा करना नाजाइज़ हैं
*2) मज़ारों में औरतों को जाने की इजाज़त नहीं हैं और ये क़ानून आपकी (औरतों) की सेफ्टी (हिफाज़त) के लिए बनाया गया हैं * 3) मर्द अगर मज़ारों पे जाए तो क़ब्र से कम से कम 4 हाथ के फासले जितनी दुरी पर खड़े हो
4) मज़ार का तवाफ़ (चक्कर) लगाना भी नाजाइज़ हैं
5) मज़ारों पे जाकर रुकू की हद तक झुकना मना हैं
6) अगर चादर चढ़ानी ही हो तो फूल की चादर पेश करें कभी कभी ऐसा भी होता हैं की किसी मज़ार पे जाओ तो वहाँ पहले से ही बहुत सी फूल और कपड़े की चादरें मौजूद होती हैं तो अब हमको चाहिए के जितनी भी क़ीमत की हम चादर पेश करना चाहते हैं उतनी रकम हम किसी ग़रीब को दे दें उन वली के नाम से और उनके (वली) इसाले सवाब के लिए, यही तालीम हमारी शरीअत हमको देती हैं
*🌹بسم الله الرحمن الرحيم 🌹** `*``🌹🌹الصــلوة والسلام عليك يارسول اللهﷺ🌹*🌹 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
इन सब को ध्यान से गौरो फिक्र से पढ़े । इंशाअल्लाह हम सब की इस्लाह होगी ।
मय्यत के दसवा, बिस्वा,चालीसवाँ वग़ैरह के मौके पर दावत करके खाना खिलाने का जो रिवाज हैं यह भी महज़ गलत और ख़िलाफ़े शरअ हैं, हाँ ग़रीबों और फकीरों को बुलाकर खिलाने में हर्ज नहीं
“आला हज़रत” फरमाते हैं मुर्दे का खाना सिर्फ़ फकीरों के लिए हैं आम दावत के तौर पर जो करते हैं यह मना हैं, ग़नी (मालदार, अमीर) ना खाए
Note :- दसवा, बिस्वा, चालीसवाँ का मकसद मरहूम के लिए सवाब पहुचना व मगफिरत के लिए दुआ करना होना चाहिए
note:- पोस्ट को पढ़ने के बाद दूसरे मुस्लिम भाइयो और बहनों तक जरूर शेयर करे , शेयर करने से ज्यादा से ज्यादा लोगों के इल्मे दिन में इज़ाफ़ा होगा अल्लाह आप को इसकी बेहतर जज़ा देगा इंशाअल्लाह
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👉🏻ये बच्चे नमाज़ को भी खेल समझते हैं और मस्जिद को अपना घर या आम जगह समझते हैं और मस्जिद में शोर करते हैं भागते हैं चिल्लाते हैं कभी कभी नमाज़ियों के सामने भी आ जाते हैं या इनके आगे से गुज़र जाते हैं, इनके (नासमझ बच्चों) आने से बाकि इबादत करने वालों को परेशानी होती हैं
👉🏻समझदार बच्चों के नमाज़ सिखने के लिए मस्जिद हैं और नासमझ के लिए घर और मदरसे हैं
नोट:-👇🏻👇🏻👇🏻 👉🏻जो बच्चें समझदार हों नमाज़ और मस्जिद के अादाब और तरीके, पाकी नापाकी जानते हो और जिनसे इबादत करने वालों को परेशानी ना हो ऐसे बच्चों को आना चाहिए क्योंकि ये भविष्य के नमाज़ी हैं
👉🏻कुछ लोग कहते है बच्चे मस्जिद में नहीं आयंगे तो नमाज़ कैसे सीखेंगे समझदार (सब समझते हो )बच्चो के लिए मस्जिद में आना मना नहीं…और नासमझ छोटे बच्चों के लिए घर और मदरसे है !!!
*हदीस में *रसूल अल्लाह ﷺने* फ़रमाया “” अपनी मस्जिदों को बचाओ बच्चो से, पागलो से, खरीदने और बेचने से और झगड़े करने से और ज़ोर ज़ोर से बोलने से””!!*
इब्ने माज़ा बाब माँ यकरहु फिल मस्जिद सफहno.55
👉🏻सदरुशशरीआ हज़रत मौलाना अमजद अली साहब आज़मी रहमतुल्लाहि तआला अलैह लिखते है …”बच्चे और पागल जिन से नजासत का गुमान हो मस्जिद में ले जाना हराम है वरना मकरूह!!””
बहारे शरीअत 📚 हिस्सा सोम सफहno.182
हवाला 📚 ग़लत फ़हमी और उनकी इस्लाह
वजु के अहम मसायल 1
✍🏻वजु ऊँघने और बैठे बैठे झोंके लेने से वुज़ू नहीं टूटता हैं इसी तरह पाँव फ़ैला कर बैठे बैठे सोने से वुज़ू नहीं टूटता चाहे टेक लगाए बैठा हो
वुज़ू कब टूटेगा👇👇👇👇 1) चित या पट या करवट से लेट कर सोने से वुज़ू टूट जाता हैं 2) उकड़ू बैठा हो और सो गए तो भी वुज़ू टूट जाता हैं
मसला:-👇🏻 👉🏻अगर नमाज़ में सो गए और और नींद की वजह से ज़मीन पर गिर पड़े और गिरते ही फ़ौरन आँख खुल गई तो वुज़ू नहीं टूटेगा
📝)जिस पर ज़कात फ़र्ज़ है…उस के बदले उस ने मोहताजों को ज़कात की नीयत से खाना खिला दिया, या कपड़ा बना दिया…..तो ज़कात अदा न होगी…
👉🏻इसलिए के यह मालिक कर देना न हुआ हाँ अगर खाना दे दे की चाहे खाये या ले जाये तो अदा हो जायगी .नीयत से कपड़ा दे दिया तो ज़कात अदा हो जायगी !!!
हवाला 📚 क़ानूने शरीअत सफह no.192
📝👉🏻ज़कात किस किस को नहीं दे सकते …👇🏻
👉🏻अपनी अस्ल यानी (माँ ,बाप,दादा ,दादी ,नाना ,नानी वगैरह जिनकी औलाद में यह है )और अपनी औलाद (यानी पोता ,पोती ,नवासा , नवासी वगैरा ) को ज़कात नहीं दे सकते !!!
👉🏻औरत शौहर को और शौहर औरत को ज़कात नहीं दे सकते …तलाक़ हो चूका हो इद्दत पूरी हो चुकी हो तो दे सकता है!!
👉🏻ग़नी मर्द के नाबालिग बच्चे को ज़कात नहीं दे सकते और ग़नी की बालिग़ औलाद को दे सकते है जबकि यह फ़क़ीर हो !!
👉🏻बनी हाशिम को ज़कात नहीं दे सकते …बनी हाशिम से यहा मुराद हज़रत अली व हज़रत जाफ़र व हज़रत अब्बास व हारिस इब्ने मुत्तलिब की औलादे है !!
👉🏻ज़िम्मी काफ़िर को न ज़कात दे सकते है न कोई सदक़ा वाजिबा(जैसे नज़र ,कफ़्फ़ारा ,सदक़ए फ़ित्र)
👉🏻बद मज़हब को ज़कात देना जाइज़ नहीं और इसी तरह उन मुरतदीन को भी देने से अदा न होगी जो ज़बान से तो इस्लाम का दावा करते है लेकिन खुदा व रसूल की शान घटाते है या किसी और दीनी का इंकार करते है !
जो इस्लामी बातों की जानकारी ना होने की वजह से अमल नहीं करते उनकी पकड़ क़यामत में होगी
इल्म हासिल ना करने वाले की दूगनी पकड़ होगी, पहला इल्म हासिल ना करने की वजह से और दूसरी पकड़ अमल ना करने या गलत अमल करने की वजह से
इल्म हासिल करना फ़र्ज़ हैं फिर उसपे अमल करना ज़रुरी हैं
हवाला ग़लत फ़हमी और उनकी इस्लाह
इस लिए आप सभी हज़रात ,भाइयो ,बहनों से पुरखुलूस गुजारिश है कि इल्मे दिन सीखने में अपनी जहनियत लगाए ।
जरूरी ये नही की आप दिनी तालीम सीखने जानने के लिए हमारी ही साइट पर आए । जरूरी ये है कि आप जिस जरिये से आप को सहुलियत हो व्हाट्सएप फेसबुक टेलीग्राम की किसी भी सुन्नी हनफ़ी मसलके आला हजरत की तहरीक से जुड़ कर भी हासिल कर सकते है
इंशाअल्लाह आप को कामयाबी मिलेगी दिन और दुनिया मे भी । दुनयावी तालीम के साथ साथ दिनी तालीम अपने बच्चों को बचपन से ही दे इसे हमारी नस्लें मज़बूत होगी
हमारी पोस्ट अच्छी लगे तो इसे ज्यादा से ज्यादा इस्लामी भाई और बहनों को शेयर जरूर करे । अल्लाह आप को इसकी बेहतर जज़ा अता करे आमीन
بسم اللہ الرحمن الرحیم الصلوۃ والسلام علیک یا رسول اللہ ﷺ
✍🏻ज़कात की फ़रज़ियत में साल के शुरू और आखिर का ऐतबार होता है ,लेहाज़ा अगर निसाब शुरू में मुक्कमल है और साल मुक़्क़मल होने पर निसाब पूरा है ,तो दौराने साल निसाब में होने वाली कमी का कोई नुकसान नहीं ,मौजूदा माल की ज़कात दी जायगी !!!
हवाला 📚 फ़ैज़ाने फ़र्ज़उलुम 1/318 बहारे शरीअत 5/17 Is ✍🏻
साल गुजरने में क़मरी (यानि चाँद के) महीने का ऐतिबार होगा, शमसी महीनों का ऐतिबार हराम होगा* मतलब ज़कात के लिए उर्दू (इस्लामी) महीनें देखे जाएँगे हवाला 📚 फ़ैज़ाने फ़र्ज़उलुम
🎍 الصــلوة والسلام عليك يارسول الله ﷺ 🎍 *آج کا جواب*🎍
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🌲 सवाल,, दौराने गुस्ल जिस्म पर पानी डालते वक़्त इस्तेमाल किए हुवे पानी के कतरात टप या बाल्टी में गिरते हैं ,,,तो बाल्टी वगैरा का पानी वूज़ू और गूस्ल के काबिल रहता है या नहीं
🌻 जवाब,, दौराने गुस्ल जिस्म पर पानी डालते वक़्त इस्तेमाल किए हुवे पानी के कतरात टप या बाल्टी में गिरते हैं तो वो पानी पाक रहता है और उस से गुस्ल करना दुरुस्त है ,,इस लिए के अगर अच्छा पानी ज़्यादा हो तो ये वूज़ू और गुस्ल के काबिल है
नोट और अगर अच्छा पानी कम है तो सब पानी बेकार हो गया ,,
अगर मुअतकिफ़ (एअतिकाफ़ में बैठने वाला) का रोज़ा किसी भी वजह से टूटा तो उसका एअतिकाफ़ भी टूट जाएगा फिर चाहे रोज़ा तोड़ा गया हो या गलती से टूटा हो क्योंकि एअतिकाफ़ के लिए रोज़ा शर्त है (ज़रूरी है) |
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एहतिकाफ के दौरान मस्ज़िद से बाहर निकलने का बयान
अगर कोई शख्स खाना खाने या पानी पीने के लिए या उसका वुज़ू था फिर भी वुज़ू करने निकला या ग़ुस्ले जुमआ (जुमआ का ग़ुस्ल) के लिए मस्जिद से बहार निकला तो उसका एअतिकाफ़ टूट गया | Note:- मुअतकिफ़ को सिर्फ़ एहतिलाम (स्वप्नदोष, Nightfall) हो जाने की सूरत में ग़ुस्ल के लिए मस्जिद से बाहर जाना जाइज़ है |
💎 सवाल,,, दोनों रकअतों में एक ही सूरत की तकरार (जब की कोई मजबूरी ना हो) क्या है
💫 जवाब,, दोनों रकअतों में एक ही सूरत की तकरार मकरूहे तनज़ीही है जब की कोई मजबूरी ना हो,, और अगर मजबूरी हो तो बिल्कुल कराहत नहीं
👆👆 ये हुक्म फ़र्ज़ का है
👉👉👉👉 नफ्ल की दोनों रकअतों में एक ही सूरत को मुकर्रर पढ़ना बिला कराहत जाइज़ है,, बहारे शरियत जिल्द 1 हिस्सा 3 पेज 82 💫💫💫💫💫💫
💫 सवाल,, सूरत मिलाना भूल गया, रुकुअ में याद आया ,,,,,,तो क्या करे
💎 जवाब,, सूरत मिलाना भूल गया , रुकुअ में याद आया तो ,, “खड़ा हो जाए और सूरत मिलाए फिर रुकुअ करे और अखीर में सजद ए सहव करे,,,,,,, और अगर दोबारा रुकुअ नहीं करेगा तो नमाज़ नहीं होगी