नमाज़े जुमा का अहम बयान व शर्त

📗 सवाल / Question (1) नमाज़े जुमा की कितनी शर्त है(यानी नमाज़े जुमा कायम करने की शर्त)

सवाल (2) नमाज़े जुमा की फ़र्ज़ होने कितनी शर्त है(यानी नमाज़े जुमा पढ़ने की शर्त)

हदीस मुबारक तिर्मिज़ी रावी है कि यज़ीद इब्ने अबी मरियम कहते है कि मैं जुमे को जाता था उबाया इब्ने रिफाआ इब्ने राफेआ मिले उन्होंने कहा कि तुम्हें बशारत { खुशखबरी } हो तुम्हारे यह कदम अल्लाह की राह में है । मैने अबु अब्स को कहते सुना की रसूलल्लाह सल्लाहु ताअला अलैहि व सल्लम ने फरमाया जिसके कदम अल्लाह की राह में गर्द आलूद हो वह आग पर हराम है और बुखारी शरीफ की रिवायत मे यु है कि अबु उबाया यह कहते है मैं जुमे को जा रहा था अबु अब्स रदियल्लाहु ताअला अन्हु मिले और हुजूर सल्लाहु ताअला अलैहि व सल्लम का इरशाद सुनाया

हवाला 👉 बाहरे शरीयत हिंदी जिल्द 4 सफ 74 हदीस न 23

नोट:- यहाँ से मालूम हुआ की जुमे की नमाज़ के किस कद्र फ़ज़ाएल है

तफसीली जवाब। ( सवाल 1 )

1⃣👉 जुमा कायम करने की 6 शर्त है उनमे एक भी शर्त मफकुद हो यानी ना पायी जाये तो होगी ही नही

1⃣👉 मिस्र ( शहर ) की ताअरीफ व अहकाम
2⃣👉 सुल्ताने इस्लाम या उसका नाइब 3⃣👉 वक्ते जोहर
4⃣ 👉 खुतबा
5⃣👉 जमाअत
6⃣👉 इज़्ने आम

हवाला :- (1) , बाहरे शरीयत हिंदी सफ 78 से 82 हवाला (2) निजामे शरीअत सफ 190 से 193

तफसीली जवाब (सवाल 2)

👉 नमाज़े जुमा फ़र्ज़ होने के लिए 1⃣1⃣शर्ते है इनमें से एक भी ना पायी जाए तो फ़र्ज़ नही फिर भी अगर पढ़ेगा तो हो जाएगी बल्कि मर्द ,आकिल, बालिग के लिए जुमा पढ़ना अफ़ज़ल है और औरत के लिए जोहर पढ़ना अफ़ज़ल है हा औरत का मकान मस्ज़िद से बिल्कुल मिला हुआ है की घर मे इमामे मस्ज़िद की इक्तिदा कर सके तो उस के लिये भी जुमा पढ़ना अफ़ज़ल है और नाबालिग ने जुमा पढ़ा तो नफ़्ल है उस पे जुमा फ़र्ज़ नही है शर्ते यह है कि 👇

1⃣👉 शहर में मुक़ीम होना

2⃣👉 सेहत यानी मरीज पर जुमा फ़र्ज़ नही

3⃣👉 आज़ाद होना

4⃣👉 मर्द होना

5⃣👉 बालिग होना

6⃣👉 आक़िल होना

(शर्त 5 व 6 खास जुमे के लिए नही बल्कि हर इबादत के वुज़ूब में जरूरी है)

7⃣👉 अखियारा होना

(एक चश्म यानी काना और जिसकी निगाह कमज़ोर हो उस पर जुमा फ़र्ज़ है यु ही जो अंधा मस्ज़िद में आज़ान के वक्त बा वजू हो उस पर भी जुमा फ़र्ज़ है । और वह नाबीना जो खुद मस्ज़िद बिना तकल्लुफ़ ना जा सकता हो । अगरचे मस्ज़िद ले जाने वाले हो उजरते मिस्ल यानी इस काम के लिए मुनासिब उज़रत हो उस उजरत पे ले जाइए बिला उजरत के ले जाये उस पर जुमा फ़र्ज़ नही)

8⃣👉 चलने पर कादिर होना

(अपाहिज पर जुमे फ़र्ज़ नही : अगरचे कोई ऐसा हो की उसे उठा कर मस्ज़िद में रख आएगा)

9⃣👉 कैद में ना होना

1⃣0⃣👉 बादशाह या चोर वगैरा किसी जालिम का ख़ौफ़ ना होना

1⃣1⃣ 👉 मेह ( बारिश ) या आंधी या तूफान या सर्दी या ओला का ना होना यानी इन से नुक़सानात का ख़ौफ़े सही होना

हवाला :- (1) बाहरे शरीयत हिंदी जिल्द 4 सफ 82 से 84
हवाला :- (2) निजामे शरीयत सफ 193 व 194

*note इस पोस्ट में नमाज़े जुमा की अहमियत के मुत्तालिक जानकारी है पढ़े जरूर  । पोस्ट को पढ़ने के बाद दूसरे मुस्लिम भाइयो और बहनों तक जरूर शेयर करे , शेयर करने से ज्यादा से ज्यादा लोगों के इल्मे दिन में इज़ाफ़ा होगा अल्लाह आप को इसकी बेहतर जज़ा देगा इंशाअल्लाह

Published by husainfoundation374

सुन्नी हनफ़ी अहले सुन्नत वल जमात मसलके आला हजरत

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