मसअला : – ज़कात का रुपया मुर्दे की तजहीज़ व तकफीन यअनी कफन – दफन या मस्जिद की तामीर में नहीं सर्फ ( खच ) कर सकते कि तमलीके फकीर नहीं पायी गई यशुनी यहाँ पर फकीर को मालिक बनाना न पाया गया और इन कामों में सर्फ करना चाहें तो उसका तरीका यह है कि फकीर को मालिक कर दें और वह सर्फ करे सवाब दोनों को होगा बल्कि हदीस में आया अगर सौ हाथों में सदका गुज़रा तो सब को वैसा ही सवाब मिलेगा जैसा देने वाले के लिए और उसके अन्ज में कुछ कमी न होगी । दुल मुहतार )
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मसअला : – ज़कात अलानिया और जाहिर तौर पर देना अफज़ल है और नपल सदका छिपा कर देना अफज़ल है । ( आलमगीरी ) ज़कात में ऐलान . इस वजह से है कि छिपा कर देने में लोगों को तोहमत और बदगुमानी का मौका मिलेगा और एलान करने से लोगों को तरगीद होगी कि उसको देख कर और लोग भी देंगे मगर यह ज़रूर है कि रिया न आने पाये यअनी दिखावा न हो सवाब जाता रहेगा बल्कि गुनाह व अज़ाब का मुस्तहक होगा ।
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मसला : – ज़कात देने में इसकी ज़रूरत नहीं कि फकीर को ज़कात कह कर दे बल्कि सिर्फ ज़कात की नियत कर लेना काफी है यहाँ तक कि अगर हिबा या . कर्ज कह कर दे और नियत ज़कात की हो अदा हो गई । ( आलमगीरी ) यूँही नज़र या हदया या पान खाने या बच्चों के मिठाई खाने या ईदी के नाम से दी अदा हो गयी । बाज़ मुहताज़ जरूरतमन्द ज़कात का रुपया नहीं लेना चाहते उन्हें ज़कात का कह कर दिया जायेगा तो नहीं लेंगे लिहाज़ा जकात का लफ्ज़ न कहें ।
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मसाला – जकात अदा नहीं की थी और अब बीमार है तो अब वारिसों से छुपा कर दे और अगर न दी थी और अब देना चाहता है मगर माल नहीं जिससे अदा करे और यह चाहता है कि कर्ज लेकर अदा करे तो अगर गालिब गुमान कर्ज़ अदा हो जाने का है तो बेहतर यह है कि कर्ज लेकर अदा करे वरना नहीं कि हुकूकुल इबाद हुकूकुल्लाह से बहुत सख्त हैं । ( हुल नुकतार )
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मसअला : – मालिके निसाब साल पूरा होने से भी पहले अदा कर सकता है ब – शर्ते कि साल पूरा होने पर भी उस निसाब का मालिक रहे और अगर साल खत्म होने पर एक निसाब न रहा या साल के दरमियान में वह माले निसाब बिल्कुल हलाक हो गया तो जो कुछ दिया नफ्ल है और जो शख्स निसाब का मालिक न हो वह जकात नहीं दे सकता यअनी अगर आइन्दा निसाब का मालिक हो गया तो जो कुछ पहले दिया है वह उसकी ज़कात में शुमार न होगा । ( आलमगीरी )
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मसला : – मालिके निसाब अगर पहले से चन्द निसाबों की ज़कात देना चाहता है तो दे सकता है यअनी शुरू साल में एक निसाब का मालिक है और दो या तीन निसाबों की ज़कात- दे दी और साल खत्म होने तक एक ही निसाब का मालिक रहा साल के बाद और हासिल किया तो जकात उसमें शुमार न होगी । ( आलमगीरी ) मसअला : – मालिके निसाब पहले से चन्द साल की भी जकात दे सकता है । ( आलमगीरी ) लिहाजा मुनासिब है कि थोड़ा – थोड़ा ज़कात में देता रहे और साल खत्म होने पर हिसाब करे और अगर जकात पूरी हो गयी तो बहुत अच्छा और कुछ कमी है तो अब वह फौरन दे दे , देर करना जाइज़ नहीं न इसकी इजाज़त है कि अब थोड़ा – थोड़ा कर के अदा करे बल्कि जो कुछ बाकी है कुल फौरन अदा कर दे और ज्यादती को जकात में जोड़ ले ।
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मसअला : – एक हजार का मालिक है और दो हज़ार की ज़कात दी और नियत यह है कि साल खत्म होने पर अगर एक हज़ार और हो , गये तो यह उसकी है वरना आइन्दा साल में शुमार होगी यह जाइज़ है । ( आलमगीरी )
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मसअला : – यह गुमान करके कि पाँच सौ रुपये हैं पाँच सौ की जकात दी फिर मझुलूम हुआ कि चार ही सौ थे तो जो ज़्यादा दिया है आइन्दा साल में शुमार कर सकता है । ( जानिया )
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मसअला : – किसी के पास सोना चाँदी दोनों हैं और साल खत्म होने से पहले एक की ज़कात दे दी तो वह दोनों की ज़कात है यअनी दरमियाने साल में उनमें से एक हलाक हो गया अगर्चे वही जिसकी नियत से ज़कात दी है तो जो रह गया है उसकी ज़कात यह हो गई और अगर उसके पास गाय , बकरी ऊँट सब ब – कद्रे निसाब हैं और पहले से उनमें एक की ज़कात दी तो जिसकी जकात दी उसी की है दूसरे की नहीं यअनी जिसकी ज़कात दी है अगर दरमियाने साल में उसकी निसाब जाती रही तो वह बाकियों की ज़कात नहीं करार दी जायेगी । ( आलमगीरी )
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मसअला : – साल के दरमियान जिस फकीर को ज़कात दी थी साल खत्म होने पर वह मालदार हो गया या मर गया या मआजल्लाह मुरतद हो गया तो ज़कात पर उस का कुछ असर नहीं वह अदा हो गई , जिस शख्स पर ज़कात वाजिब है अगर वह मर गया तो साकित हो गयी यअनी उसके माल से ज़कात देना जरूर नहीं , हाँ अगर वसीयत कर गया तो तिहाई माल तक वसीयत नाफिज़ ( जारी ) है और अगर आकिल बालिग दुरसा इजाज़त दे दें तो कुल माल से जकात अदा की जाये । ( दुरै मुरझार )
